शाम के सात बज रहे थे। घर के दालान में बैठी निर्मला देवी के हाथों में रामचरितमानस की गुटका थी, लेकिन उनका ध्यान रसोई से आ रही छौंक की महक पर था। तभी उनकी बहू, अवनि ने अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए बाहर आकर कहा, "मां जी, चलिए हाथ-मुंह धो लीजिए। मैंने गरमागरम खाना टेबल पर लगा दिया है।" अवनि के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान और दिन भर की थकान के बावजूद एक सुकून था। लेकिन ये चंद शब्द निर्मला देवी के कानों में किसी अजीब सी चेतावनी की तरह गूंजे। उनकी भौंहें तन गईं। उन्होंने अपनी किताब बंद की और बिना कुछ कहे डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ गईं।
टेबल पर जाकर उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। कांसे की थाली में कटहल की सूखी सब्जी, अरहर की दाल, गर्मागर्म रोटियां और आम का अचार परोसा गया था। यह सब निर्मला देवी का सबसे पसंदीदा भोजन था। लेकिन उस स्वादिष्ट खाने की महक से ज्यादा, निर्मला देवी के मन में उबल रही कड़वाहट हावी हो रही थी। उन्होंने मन ही मन सोचा, "इसने तो आज हद ही कर दी। बिना मुझसे पूछे, बिना मेरी राय लिए सीधा खाना बनाकर टेबल पर रख दिया? अब तक तो हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए पूछने आती थी कि मां जी दाल में कौन सा तड़का लगाऊं, या सब्जी में कितना नमक डालूं। आज अचानक इसे पर लग गए? क्या अब इस घर में मेरी इतनी भी अहमियत नहीं रही कि रसोई में क्या बनेगा, ये मुझसे पूछा जाए?" खाना खाते वक्त भी उनके गले से निवाले बड़ी मुश्किल से उतर रहे थे। उन्हें लग रहा था जैसे अवनि ने सिर्फ खाना नहीं बनाया है, बल्कि घर की सत्ता पर अघोषित कब्जा कर लिया है।
रात का सन्नाटा छा चुका था। कमरे में निर्मला देवी के पति, दीनदयाल जी, अपने चश्मे को साफ करके सिरहाने रख रहे थे। निर्मला देवी से रहा नहीं गया। वह बिस्तर पर लेटते हुए एक अनमने और चिढ़े हुए स्वर में बोलीं, "देख रहे हैं आप अपनी लाडली बहू के रंग? आज मोहतरमा ने मुझसे बिना पूछे ही रात का खाना बना डाला। अब तो मेरी अहमियत ही खत्म कर दी है इसने इस घर से। आज बिना पूछे रसोई चलाई है, कल को बिना पूछे घर के बड़े फैसले भी लेने लगेगी। मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे अब इस घर में मेरा हुक्म नहीं, बल्कि उसका राज चलेगा।"
दीनदयाल जी ने करवट बदली और एक गहरी, शांत नज़र से अपनी पत्नी को देखा। उन्होंने एक हल्की सी आह भरी और बोले, "निर्मला, तुम भी ना, अपनी उम्र के साथ समझदारी बढ़ाने के बजाय अपनी असुरक्षा को बढ़ा रही हो। जरा शांत दिमाग से सोचो। शादी को सात साल हो गए हैं अवनि के। इन सात सालों में ऐसा कौन सा दिन था जब उसने रसोई में कदम रखने से पहले तुमसे नहीं पूछा? और जब वो पूछती थी, तब तुम क्या करती थीं? तुम हर दिन उसे ताने मारती थीं। 'इतने साल हो गए, अब तक खुद से सोचना नहीं आया?', 'कब तक मुझे हर चीज़ सिखानी पड़ेगी?', 'मायके से क्या सीख कर आई हो?'... यही सब कहती थीं ना तुम?"
दीनदयाल जी की बातें निर्मला देवी को चुभ रही थीं, लेकिन वो चुप रहीं। दीनदयाल जी ने अपनी बात जारी रखी, "अरे भगवान का शुक्र मनाओ कि उस बच्ची ने तुम्हारी इस ढलती उम्र और तुम्हारे घुटनों के दर्द को समझा। आज जब उसने खुद से जिम्मेदारी उठाई, ताकि तुम्हें आराम मिल सके, तो तुम उसमें अपनी अहमियत कम होने का डर खोज रही हो? क्या तुम्हारा वजूद सिर्फ उस रसोई के चूल्हे और नमक-दानी तक सीमित है? अवनि ने आज तुम्हारी पसंद का खाना बनाया, इसका मतलब है कि वो तुम्हारी पसंद-नापसंद को इतने सालों में अपने दिल में उतार चुकी है। वो तुम्हारी सत्ता नहीं छीन रही निर्मला, वो तुम्हारे हिस्से की थकान छीनने की कोशिश कर रही है। अब उसे बच्ची से एक जिम्मेदार औरत बनने दो, और खुद एक सास से उठकर एक असली माँ बन जाओ। अब मुझे शांति से सोने दो, और तुम भी अपने इस बेकार के शक को दिमाग से निकाल दो।"
कमरे में अब सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक गूंज रही थी। दीनदयाल जी तो आँखें बंद करके सो गए, लेकिन निर्मला देवी की आँखों से नींद कोसों दूर थी। उनके पति के कहे हुए एक-एक शब्द उनके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे। उन्होंने अतीत के पन्नों को पलटना शुरू किया। उन्हें याद आया कि जब वह खुद नई-नई बहू बनकर इस घर में आई थीं, तो उनकी सास भी रसोई की चाबियां अपने पल्लू से बांध कर रखती थीं। जब निर्मला ने पहली बार बिना पूछे खीर बनाई थी, तो उनकी सास ने भी ठीक ऐसा ही बर्ताव किया था। उस दिन निर्मला कितना रोई थी। और आज, अंजाने में ही सही, वह खुद भी उसी पुरानी, संकीर्ण सोच का शिकार हो रही थीं।
अवनि ने तो आज कटहल की सब्जी बनाते वक्त यही सोचा होगा कि 'मां जी को पसंद है, वो खुश हो जाएंगी।' लेकिन निर्मला देवी ने उसकी उस मासूम सी खुशी और परवाह को अपने अहंकार के चश्मे से देखा। उन्हें एहसास हुआ कि घर की मालकिन होना दूसरों को हमेशा अपने अधीन रखने में नहीं है, बल्कि सही वक्त पर नई पीढ़ी को प्यार से जिम्मेदारी सौंपने में है। रिश्तों में जब अहमियत साबित करने की होड़ लग जाती है, तो प्यार की जगह घुटन ले लेती है।
अगली सुबह जब अवनि उठी और रसोई की तरफ गई, तो उसने देखा कि निर्मला देवी वहां पहले से मौजूद थीं। अवनि थोड़ी सहम गई। उसे लगा शायद कल रात बिना पूछे खाना बनाने पर आज उसे डांट पड़ने वाली है। लेकिन निर्मला देवी ने मुस्कुराते हुए अवनि के सिर पर हाथ रखा और प्यार से कहा, "अवनि, कल तेरी बनाई कटहल की सब्जी में बिल्कुल तेरे मायके वाला स्वाद था। आज से ये रसोई तेरी जिम्मेदारी है। अब तू जो भी बनाएगी, मुझे सब पसंद आएगा।" अवनि की आँखें खुशी और सम्मान से भर आईं। उस दिन रसोई में सिर्फ खाना नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों के बीच एक अटूट विश्वास पक रहा था।
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क्या घर के बुजुर्गों को समय के साथ अपनी जिम्मेदारियों को नई पीढ़ी को सौंपकर सुकून की जिंदगी नहीं जीनी चाहिए? क्यों अक्सर अधिकारों और सत्ता के डर में हम अपनों का प्यार और उनकी परवाह देखना भूल जाते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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