हौसले की कीमत

 शहर के उस पुराने कैफे के कोने वाली मेज पर आज एक अजीब सी बेचैनी छाई हुई थी। बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, लेकिन मीरा के दिल में जैसे कोई भारी तूफान उठा हुआ था। उसकी आँखों से लगातार बहते आँसू उसकी ठंडी हो चुकी कॉफी के प्याले के पास गिर रहे थे। उसके ठीक सामने बैठा कबीर अपनी नजरें मेज पर गड़ाए हुए था। उसके हाथों की उंगलियां आपस में उलझी हुई थीं, जो उसकी अंदरूनी घबराहट को साफ बयां कर रही थीं।


"कबीर, मेरी खामोशी को मेरी रजामंदी मत समझो," मीरा ने रुंधे हुए गले से कहा। "अगर तुम सच में मुझसे प्यार करते हो, तो कल शाम मेरे घर आओ और मेरे पिताजी से मेरे लिए बात करो।"


कबीर ने अपनी भारी पलकें उठाईं और मीरा की लाल हो चुकी आँखों में देखा। "मीरा, तुम जानती हो कि मेरे हालात अभी क्या हैं। मेरी छोटी सी ग्राफिक डिजाइनिंग की एजेंसी अभी बस संघर्ष कर रही है। पिछले दो महीनों से मेरे पास कोई बड़ा प्रोजेक्ट नहीं है। मैं खुद को साबित करने की जद्दोजहद में हूँ। ऐसे में तुम्हारे पिताजी, जो शहर के इतने प्रतिष्ठित वकील हैं, वो मुझ जैसे बेरोजगार और संघर्षरत इंसान के हाथ में अपनी इकलौती बेटी का हाथ कैसे दे देंगे? मुझे थोड़ा वक्त और दे दो मीरा। मैं सब ठीक कर दूंगा।"


मीरा ने एक गहरी, लेकिन हताश सांस ली। "वक्त ही तो नहीं है मेरे पास कबीर। पिताजी ने कल शाम को एक बहुत बड़े परिवार को घर बुलाया है। लड़का अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और वो लोग कल ही मुझे देखने आ रहे हैं। पिताजी को वो रिश्ता बहुत पसंद है और अगर कल बात पक्की हो गई, तो अगले हफ्ते मेरी सगाई तय कर दी जाएगी। तुम अपनी आँखों के सामने मुझे किसी और का होते हुए देख पाओगे?"


"ऐसा मत कहो मीरा!" कबीर की आवाज में एक तड़प थी। उसने आगे बढ़कर मीरा का हाथ पकड़ लिया। "मैं तुम्हारे बिना अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन मैं तुम्हारे पिताजी के सामने किस हैसियत से खड़ा होऊं? मेरे पास उन्हें देने के लिए कोई झूठा आश्वासन नहीं है।"


मीरा ने अपना हाथ कबीर की पकड़ से धीरे से छुड़ा लिया। उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बल्कि एक अंतिम फैसला था। "मुझे तुम्हारा बैंक बैलेंस नहीं, तुम्हारा हौसला चाहिए कबीर। अगर तुममें इतनी हिम्मत नहीं है कि तुम मेरे लिए मेरे पिता की आँखों में आँखें डालकर बात कर सको, तो शायद तुम मेरे प्यार के काबिल ही नहीं हो। कल शाम को मेरे घर वो लोग आ रहे हैं। मैं शाम सात बजे तक तुम्हारा इंतजार करूंगी। अगर तुम आए और मेरे लिए खड़े हुए, तो मैं सारी दुनिया से लड़ जाऊंगी। लेकिन अगर तुम नहीं आए, तो समझ लेना कि हमारा सफर यहीं तक था। फिर मुझे हमेशा के लिए भूल जाना।"


मीरा अपना बैग उठाकर कैफे से बाहर निकल गई। कबीर वहीं बैठा, बारिश की बूंदों को कांच पर फिसलते हुए देखता रहा। उसे अपनी नाकामियों पर गुस्सा आ रहा था, लेकिन मीरा को खोने का डर उस गुस्से से कहीं ज्यादा बड़ा था।


अगली शाम, मीरा का घर मेहमानों की हंसी-मजाक से गूंज रहा था। ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठे लड़के वाले मीरा के पिता, रामनाथ जी के साथ व्यापार और विदेश की बातें कर रहे थे। लड़का, सुयश, बहुत ही आत्मविश्वास के साथ अपने पैकेज और अमेरिका के अपने शानदार घर का बखान कर रहा था। मीरा एक कोने में चुपचाप बैठी थी। उसकी नजरें बार-बार दीवार पर टंगी घड़ी और घर के मुख्य दरवाजे के बीच भटक रही थीं। पौने सात बज चुके थे। मीरा के दिल की धड़कनें किसी तेज दौड़ते घोड़े की तरह बेकाबू थीं। क्या कबीर हार मान गया? क्या वह सच में नहीं आएगा?


तभी दरवाजे की घंटी बजी। नौकर ने दरवाजा खोला और कबीर अंदर दाखिल हुआ। वह बारिश में हल्का सा भीगा हुआ था, लेकिन उसने एक साफ-सुथरी शर्ट पहन रखी थी और उसके चेहरे पर कल वाली कोई घबराहट नहीं थी। कबीर को देखकर मीरा की बुझती हुई आँखों में अचानक एक नई चमक आ गई।


रामनाथ जी ने अपनी त्योरियां चढ़ा लीं। "तुम यहाँ क्या कर रहे हो कबीर? तुम्हें पता है ना कि आज हमारे घर में मेहमान आए हैं?"


कबीर ने बहुत ही शालीनता से सभी मेहमानों को हाथ जोड़कर नमस्ते किया और फिर रामनाथ जी की आँखों में सीधा देखते हुए बोला, "मुझे माफ कीजिएगा अंकल कि मैं बिना बुलाए और गलत वक्त पर आया हूँ। लेकिन अगर मैं आज नहीं आता, तो शायद जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाता।"


सुयश के पिता ने अजीब सी नजरों से कबीर को देखा। "ये कौन है रामनाथ जी?"


रामनाथ जी कुछ कहते, उससे पहले ही कबीर बोल पड़ा, "मैं कबीर हूँ। और मैं यहाँ मीरा का हाथ मांगने आया हूँ।"


पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सुयश ने एक व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए कहा, "मीरा का हाथ? मैंने सुना है तुम फ्रीलांस काम करते हो और फिलहाल तुम्हारे पास कोई ढंग की नौकरी भी नहीं है। तुम मीरा को क्या भविष्य दोगे? मेरी तरह अमेरिका की सैर कराओगे या उसे इस शहर की धूल फांकने पर मजबूर करोगे?"


कबीर ने सुयश की बातों का बुरा नहीं माना। वह रामनाथ जी की तरफ मुड़ा। "अंकल, ये सच है कि आज मेरे बैंक खाते में इतने पैसे नहीं हैं कि मैं मीरा को कोई महल दे सकूं। मेरे पास कोई सुरक्षित नौकरी का टैग भी नहीं है। लेकिन मेरे पास जो है, वो शायद कोई और नहीं दे सकता। मेरे पास मीरा के लिए बेइंतहा प्यार, एक अटूट सम्मान और दिन-रात एक करके मेहनत करने का जज़्बा है। मैं मीरा को सोने के पिंजरे में नहीं रखूंगा, बल्कि उसे उसके सपनों की उड़ान भरने में हमेशा उसका आसमान बनूंगा। आज सुबह ही मैंने अपने अहंकार को किनारे रखकर एक छोटी सी कंपनी में नौकरी स्वीकार कर ली है, ताकि हमारी जिंदगी की एक स्थिर शुरुआत हो सके। मैं धीरे-धीरे अपना व्यवसाय भी खड़ा करूंगा। मैं सिर्फ आपका आशीर्वाद चाहता हूँ।"


सुयश के पिता आगबबूला हो गए। "रामनाथ जी, ये क्या तमाशा है? अगर आपको अपनी बेटी एक भिखमंगे को ही देनी थी, तो हमें यहाँ अपमानित करने के लिए क्यों बुलाया?"


रामनाथ जी ने हाथ उठाकर सुयश के पिता को शांत रहने का इशारा किया। वे अपनी जगह से उठे और धीरे-धीरे चलकर कबीर के सामने आकर खड़े हो गए। उनकी अनुभवी आँखों ने कबीर के चेहरे को बारीकी से पढ़ा। 


"कबीर," रामनाथ जी की आवाज भारी थी। "एक पिता होने के नाते मैं अपनी बेटी के लिए सुरक्षा चाहता हूँ। दौलत कमाई जा सकती है, लेकिन जब एक भरी महफिल में, जहाँ तुम्हारे पास खुद को साबित करने के लिए कोई बैंक बैलेंस न हो, फिर भी तुम एक लड़की के लिए इस तरह दुनिया से टकराने आ जाओ... तो वो हौसला किसी करोड़पति के गुरूर से बहुत बड़ा होता है। मुझे अपनी बेटी के लिए पैसे वाला दामाद नहीं, बल्कि ऐसा जीवनसाथी चाहिए था जो उसके लिए किसी भी हद तक जा सके।"


रामनाथ जी ने मीरा की तरफ देखा। "मीरा, क्या तुम इस लड़के के साथ संघर्ष करने को तैयार हो?"


मीरा की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने मजबूती से सिर हिलाया। "हाँ पिताजी, कबीर के साथ मैं हर संघर्ष के लिए तैयार हूँ।"


रामनाथ जी ने मुस्कुराते हुए मेहमानों से हाथ जोड़कर माफी मांगी। सुयश और उसका परिवार बड़बड़ाते हुए घर से बाहर निकल गए। रामनाथ जी ने कबीर के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "मुझे तुम्हारा हौसला पसंद आया लड़के। मैं तुम्हें खुद को साबित करने के लिए एक साल का वक्त देता हूँ। तब तक सगाई नहीं होगी, लेकिन हाँ, मेरी बेटी तुम्हारी ही अमानत है।"


मीरा और कबीर ने एक-दूसरे की तरफ देखा। बिना कुछ कहे ही उन दोनों की आँखों ने एक-दूसरे से पूरी जिंदगी का वादा कर लिया था। कबीर को समझ आ गया था कि रिश्ते दौलत से नहीं, बल्कि उस हिम्मत से खरीदे जाते हैं, जो अपनों के लिए खड़े होने से आती है।


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