बेगानी चौखट: एक बेटी की 'अपने घर' की तलाश

 जब मैं सिद्धार्थ भैया और निवेदिता के पास पहुँचा, तब तक माहौल की सारी कड़वाहट और चीख-पुकार एक अजीब से सन्नाटे में बदल चुकी थी। निवेदिता की माँ, सुप्रिया आंटी, अपने दूसरे पति रमेश अंकल के साथ अपनी गाड़ी में बैठकर जा चुकी थीं। सुप्रिया आंटी की ननद, जो उन्हें समझाने आई थीं, वे भी उनके साथ ही लौट गई थीं। अब उस पुराने, जर्जर हो चुके पुश्तैनी घर के दालान में सिर्फ निवेदिता और सिद्धार्थ भैया बचे थे। निवेदिता ज़मीन पर घुटनों में सिर दिए बुरी तरह सुबक रही थी और सिद्धार्थ भैया बेबसी से उसके सिर पर हाथ फेर रहे थे।


मैं कुछ बोल पाता, उससे पहले ही निवेदिता ने रोते हुए अपना सिर उठाया। उसकी आँखें सूज कर लाल हो चुकी थीं और चेहरे पर एक ऐसा दर्द था जो उसकी उम्र से बहुत बड़ा था। वह सिद्धार्थ भैया के हाथ को कसकर पकड़ते हुए बोली, "वह घर मेरा नहीं है सिद्धार्थ भैया... आपने देखा न, मेरी माँ उस आदमी के साथ कितनी आसानी से अपनी गाड़ी में बैठकर चली गईं। एक बार भी पलट कर नहीं देखा कि उनकी बेटी पीछे रो रही है। उन्हें मेरी कोई चिंता नहीं है। उन्हें सिर्फ अपना नया परिवार, अपना नया घर और उस आदमी का बेटा साहिल दिखाई देता है।"


निवेदिता के ये शब्द उस पुराने घर की खामोश दीवारों से टकराकर और भी भारी हो गए थे। उसने एक गहरी और ठंडी साँस ली और अपने आँसू पोंछते हुए आगे कहा, "साहिल की माँ तो बेचारी उसे मर कर छोड़ गई थीं, इसलिए पूरी दुनिया को उस पर तरस आता है। मेरी माँ भी दिन-रात बस उसी की कमियों को पूरा करने में लगी रहती हैं। लेकिन मेरा क्या? मेरी माँ तो मुझे ज़िंदा ही अनाथ कर गईं। वो अब मुझे प्यार नहीं करतीं। साहिल अगर स्कूल से घर देर से आता है, तो माँ की जान निकल जाती है, लेकिन मैं अगर रात-रात भर अपने कमरे में रोती रहूँ, तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।"


निवेदिता के दिल का वह गुबार फूट रहा था, जिसे वह पिछले दो सालों से अपने सीने में दबाए बैठी थी। सुप्रिया आंटी ने अपने पहले पति (निवेदिता के पिता) के गुज़र जाने के बाद रमेश अंकल से दूसरी शादी कर ली थी। शुरुआत में सबको लगा था कि इस फैसले से निवेदिता को एक नया पिता और एक मुकम्मल परिवार मिल जाएगा। लेकिन सच तो यह था कि उस बड़े से आलीशान बंगले में निवेदिता महज़ एक अनचाही मेहमान बनकर रह गई थी।


वह अपनी शिकायतें सिद्धार्थ भैया के सामने रखती जा रही थी, "अगर साहिल मेरे पास नहीं आता या मुझसे बात नहीं करता, तो उसमें मेरा क्या दोष है? लेकिन माँ हर बात पर मुझे ही डाँटती हैं। 'उसके कमरे में मत जाओ', 'उसकी चीज़ों को मत छेड़ो', 'उसे पढ़ने दो', 'टीवी की आवाज़ कम रखो साहिल सो रहा है'... यही सब सुनते-सुनते मेरे कान पक गए हैं। ऐसा लगता है जैसे मैं उस घर में कोई अजनबी हूँ जो बस किसी की दया पर जी रही है।"


सिद्धार्थ भैया, जो निवेदिता के ताऊ जी के बेटे थे, उसकी इन बातों को सुनकर अंदर तक हिल गए थे। उन्होंने निवेदिता को अपने सीने से लगा लिया। 


"मेरा घर कहाँ है, सिद्धार्थ भैया?" निवेदिता अब दहाड़ें मार कर रो रही थी। "वो बड़ा सा बंगला और वो सारी सुख-सुविधाएँ तो मेरी माँ को मिली हैं, मुझे नहीं। उन्होंने तो अपना घर बसा लिया। लेकिन मैं कहाँ जाऊँ? ये पुराना घर, जहाँ हम खड़े हैं, ये मेरे अपने पापा की निशानी है ना? उनके खून-पसीने की कमाई है ना? मैं अब यहीं रहूँगी अपने असली घर में। चाहे यहाँ मुझे रूखी-सूखी खानी पड़े, लेकिन मैं उस बेगाने और ठंडे घर में वापस कभी नहीं जाऊँगी।"


मैं चुपचाप दरवाजे के पास खड़ा ये सब देख रहा था। मुझे याद आ गया वो समय जब निवेदिता के पिता ज़िंदा थे। निवेदिता उस समय पूरे घर में किसी चिड़िया की तरह चहकती रहती थी। उसका पिता उसे अपनी पलकों पर बिठा कर रखता था। लेकिन उनके जाने के बाद सुप्रिया आंटी ने अपनी असुरक्षा और अकेलेपन से बचने के लिए दूसरी शादी तो कर ली, पर उस शादी को निभाने के चक्कर में वे यह भूल गईं कि उनकी एक अपनी बेटी भी है, जो अंदर ही अंदर घुट रही है। सौतेले बेटे की अच्छी माँ बनने की होड़ में, उन्होंने अनजाने में अपनी ही सगी बेटी के सिर से ममता का आँचल खींच लिया था।


सिद्धार्थ भैया ने निवेदिता के आँसू पोंछे और बहुत ही प्यार लेकिन दृढ़ता से कहा, "तुझे कहीं और जाने की कोई ज़रूरत नहीं है, गुड़िया। यह घर जितना मेरा है, उतना ही तेरा भी है। तेरे पिता ने इस घर की हर ईंट में अपना प्यार पिरोया है। अगर उस नए घर में तुझे घुटन होती है, तो तू आज से यहीं रहेगी। तेरी पढ़ाई, तेरी ज़रूरतें और तेरी हर ज़िम्मेदारी आज से मेरी है। जब तक तेरा ये भाई ज़िंदा है, तू खुद को कभी बेघर या अनाथ मत समझना।"


सिद्धार्थ भैया के इन शब्दों ने निवेदिता के टूटते हुए वजूद को एक नया सहारा दे दिया था। उसने सिद्धार्थ भैया को कसकर पकड़ लिया, जैसे कोई डूबता हुआ इंसान किसी तिनके को पकड़ लेता है। उस दिन सुप्रिया आंटी भले ही अपनी बेटी को उसी पुराने घर में छोड़कर अपनी नई दुनिया में लौट गई थीं, लेकिन निवेदिता ने अपने पिता की उसी पुरानी चौखट पर अपना खोया हुआ वजूद और अपना 'असली घर' वापस पा लिया था। उसे समझ आ गया था कि घर ईंट-पत्थर या महलों से नहीं बनता, बल्कि घर वहाँ होता है जहाँ इंसान को बिना किसी शर्त के अपनाया जाए। 


आज निवेदिता के पास अपनी माँ नहीं थी, लेकिन उसके पास उसका स्वाभिमान और एक ऐसा भाई था, जिसने उसे पराया होने के उस भयंकर दर्द से हमेशा के लिए आज़ाद कर दिया था। रिश्तों की इस भीड़ में उसने अपनी जड़ों को पहचान लिया था।


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