शहर के सबसे रसूखदार उद्योगपति, विक्रम सिंह शेखावत की आलीशान कोठी 'इंपीरिया' में दुनिया की ऐसी कोई सुख-सुविधा नहीं थी जो मौजूद न हो। इटैलियन मार्बल से सजे चमकते फर्श, छत से लटकते बेशकीमती क्रिस्टल के झूमर, और पोर्टिको में खड़ी लग्जरी गाड़ियों की कतार... बाहर से देखने पर यह किसी जन्नत से कम नहीं लगता था। लेकिन इस जन्नत के भीतर एक ऐसा इंसान था, जिसकी आत्मा रोज घुटती थी। वह था विक्रम और सुहासिनी देवी का इकलौता बेटा, समर।
समर अपने विशाल बेडरूम में, जिसे उसने एक आर्ट स्टूडियो में तब्दील कर रखा था, कैनवास पर रंगों को उकेर रहा था। उसके हाथ पेंटिंग ब्रश के साथ ऐसे थिरक रहे थे जैसे वह कोई जादुई धुन बना रहा हो। रंगों से खेलना, अपनी गहरी और अनकही भावनाओं को कैनवास पर उतारना ही उसकी जिंदगी का एकमात्र सुकून था। तभी उसके कमरे का भारी लकड़ी का दरवाजा बिना किसी दस्तक के खुला। दरवाजे पर उसकी माँ, सुहासिनी देवी खड़ी थीं। उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक सख्त, संभ्रांत और असंतुष्ट भाव था। उनका ध्यान समर की उस खूबसूरत पेंटिंग पर नहीं, बल्कि उसके कपड़ों और फर्श पर गिरे पेंट के दागों पर था।
सुहासिनी ने कमरे में कदम रखते ही एक गहरी, सर्द सांस ली और तीखे स्वर में कहा, "समर, तुम फिर इन रंगों के साथ अपना कीमती समय बर्बाद कर रहे हो? तुम्हें पता है तुम्हारे पापा को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं है। उनके हिसाब से यह सब फालतू के शौक हैं जो उन लोगों को शोभा देते हैं जिन्हें जीवन में कुछ हासिल नहीं करना होता। तुम्हारे पापा कल से एक नया प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं, और वो चाहते हैं कि तुम कल सुबह ठीक नौ बजे उनके साथ बोर्ड मीटिंग में बैठो।"
समर के हाथ अचानक रुक गए। उसने धीरे से अपना ब्रश नीचे रखा और एक ठंडी आह भरते हुए अपनी माँ की तरफ पलटा। उसकी आँखों में एक अजीब सी उदासी, हताशा और बरसों की थकावट थी। "माँ, फिर से वही बात? क्या आप कभी पापा के दायरे और इस बिजनेस एम्पायर से बाहर निकल कर सोच सकती हैं? जब भी आप मेरे पास आती हैं, बस यही रट लगाए रखती हैं कि पापा को यह पसंद है, पापा को वो पसंद है। क्या आपने कभी एक पल के लिए भी यह सोचने की कोशिश की है कि मुझे क्या पसंद है? मेरे इस दिल में क्या चल रहा है? क्या आपने कभी शाम को मेरे पास तसल्ली से बैठकर मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए यह पूछा है कि 'बेटा, आज का दिन कैसा रहा? क्या तुम खुश हो?'"
सुहासिनी देवी के चेहरे पर इन भावनात्मक बातों से कोई शिकन नहीं आई। उनके लिए समर की ये बातें सिर्फ एक अमीर, बिगड़ैल लड़के की बेतुकी शिकायतें थीं जिसे दुनिया की कोई समझ नहीं थी। उन्होंने अपने महंगे सिल्क की साड़ी के पल्लू को झटकते हुए उसी कठोर लहजे में जवाब दिया, "शिकायत तो वो लोग करते हैं समर, जिन्हें जिंदगी में कुछ नसीब न हुआ हो। तुम किस दुख और किस दिल की बात कर रहे हो? इतने आलीशान महल में रहते हो, जो मांगते हो वो अगले ही पल तुम्हारे कदमों में हाजिर हो जाता है। तुम्हारे पापा और मैंने तुम्हारे ऐशो-आराम में कभी कोई कमी आने दी है क्या? सोने का चम्मच मुंह में लेकर पैदा हुए हो, तुम्हें तो हमारा शुक्रगुजार होना चाहिए।"
सुहासिनी अपनी बात को वजन देने के लिए कुछ पल रुकीं और फिर एक गहरी चोट करते हुए बोलीं, "अपनी बड़ी बहन शिखा को देखो। वो तुमसे सिर्फ तीन साल बड़ी है, लेकिन उसने पापा के बिजनेस को कितनी अच्छी तरह से अपने कंधों पर उठा लिया है। आज ही उसने लंदन की उस मल्टीनेशनल कंपनी के साथ करोड़ों की डील फाइनल की है। पूरे कॉर्पोरेट जगत में उसकी तारीफ होती है। उसे अपनी जिम्मेदारियों का पूरा अहसास है। वो हमारे परिवार का नाम रोशन कर रही है। और एक तुम हो, जो दिन भर इन बेजान कैनवास पर रंग पोतते रहते हो। मैं चाहती हूँ कि अब तुम यह सब बचपना बंद करो, कल से ऑफिस जॉइन करो और अपने पापा के इस एम्पायर को और आगे बढ़ाओ। समाज में हमारी एक इज्जत है, और तुम ऐसे सड़क छाप पेंटर बनकर हमारी नाक नहीं कटवा सकते।"
समर की आँखें भर आईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को बाहर नहीं छलकने दिया। वह आज पूरी तरह समझ चुका था कि इस घर में भावनाओं की, सपनों की कोई कीमत नहीं है। यहाँ हर रिश्ते को बैलेंस शीट के मुनाफे और नुकसान, और समाज के रुतबे से तौला जाता है।
उसने अपनी माँ की आँखों में सीधा देखते हुए एक ठंडी लेकिन चुभती हुई आवाज में कहा, "माँ, आप बिल्कुल सही कह रही हैं। आपने और पापा ने मुझे दुनिया की हर महंगी चीज दी है, लेकिन आपने मुझसे मेरा वजूद ही छीन लिया। शिखा दीदी बिजनेस में बहुत अच्छी हैं, क्योंकि उन्हें वो काम पसंद है। वो पापा की परछाई हैं, और मुझे उनकी कामयाबी पर बहुत गर्व है। लेकिन मैं शिखा दीदी नहीं हूँ। मैं एक अलग इंसान हूँ। मेरे लिए सफलता का मतलब करोड़ों की डील क्रैक करना या अखबारों के बिजनेस पेज पर छपना नहीं है, बल्कि अपनी कला के जरिए लोगों की रूह तक पहुंचना है। आप लोगों ने मुझे एक सोने के पिंजरे में कैद कर दिया है, जहाँ मुझे हर भौतिक सुख मिलता है, सिवाय उस खुली हवा के, जिसमें मैं अपनी मर्जी से सांस ले सकूं।"
समर के ये स्पष्ट शब्द सुहासिनी देवी के लिए किसी खुली बगावत से कम नहीं थे। उन्होंने अपना आपा खोते हुए गुस्से में कहा, "तो क्या तुम इस शेखावत खानदान की इज्जत को मिट्टी में मिला दोगे? क्या तुम सड़कों पर बैठकर अपनी ये बेसिर-पैर की पेंटिंग बेचोगे और दुनिया हंसेगी कि विक्रम शेखावत का बेटा क्या कर रहा है?"
"अगर अपनी एक अलग पहचान बनाने के लिए मुझे सड़कों की धूल भी फांकनी पड़े माँ, तो वो भी मुझे दिल से मंजूर है," समर ने बहुत ही शांत लेकिन अटल स्वर में कहा। "मुझे आपकी यह दौलत, यह रुतबा नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ वो मानसिक सुकून चाहिए जो मुझे मेरे इन रंगों में मिलता है। आप शिखा दीदी को ही अपना इकलौता वारिस मान लीजिए। वे इस विरासत को बहुत अच्छी तरह और शान से संभालेंगी। लेकिन मुझे अब इस घुटन भरे महल में एक पल भी नहीं जीना। मैं आज ही यह घर छोड़ रहा हूँ, ताकि आप और पापा को मेरी वजह से समाज में कोई शर्मिंदगी न उठानी पड़े।"
सुहासिनी देवी सन्न रह गईं। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि उनका बेटा, जिसे उन्होंने दुनिया की हर खुशी खरीद कर दी थी, वो आज अपनी भावनाओं और अपने जुनूनी शौक के लिए उस विशाल साम्राज्य को ठोकर मार रहा था। समर ने खामोशी से अपना बैकपैक उठाया, उसमें अपने कुछ जरूरी कपड़े और अपने सबसे प्यारे रंग और ब्रश रखे, और बिना एक बार भी पीछे मुड़े उस आलीशान कमरे से बाहर निकल गया।
सुहासिनी देवी उसी जगह बुत बनी खड़ी रह गईं। उनके पास दौलत, रुतबा, महल सब कुछ था, लेकिन आज उन्होंने अपने ही अहंकार और नासमझी के कारण अपना बेटा हमेशा के लिए खो दिया था। उन्हें शायद पहली बार यह एहसास हो रहा था कि बच्चों को सिर्फ पैसे और सुख-सुविधाओं की नहीं, बल्कि प्यार, समझ और उनके व्यक्तिगत सपनों को स्वीकार करने की जरूरत होती है। समर ने आज उस सोने के पिंजरे को हमेशा के लिए तोड़ दिया था और अपनी एक नई दुनिया बसाने निकल पड़ा था, जहाँ सिर्फ उसके रंगों की कीमत थी, दौलत की नहीं।
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