शहर के कोलाहल से दूर बसे एक शांत गाँव में पंडित हरिशंकर का परिवार रहता था। हरिशंकर जी गाँव के एक सम्मानित और ज्ञानी व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम पड़ाव पर जब उन्हें लगा कि अब उनका समय निकट है, तो उन्होंने अपने दोनों बेटों—बड़े बेटे समर और छोटे बेटे कुणाल—को अपने पास बुलाया। हरिशंकर जी के पास कोई बहुत बड़ी पुश्तैनी जायदाद नहीं थी। संपत्ति के नाम पर गाँव के बाहर एक पथरीली और बंजर ज़मीन का टुकड़ा था और रहने के लिए एक पुराना घर। पिता के देहांत के बाद दोनों भाइयों ने संपत्ति का बंटवारा कर लिया। घर और उस बंजर ज़मीन के दो बराबर हिस्से हो गए। यहीं से दोनों भाइयों के जीवन की असली परीक्षा और उनके भाग्य के निर्माण का सफर शुरू हुआ।
समर बचपन से ही बहुत महत्वाकांक्षी था, लेकिन उसकी सोच में हमेशा एक नकारात्मकता घुली रहती थी। वह अक्सर अपनी किस्मत को कोसता रहता था। जब उसके हिस्से में वह पथरीली ज़मीन आई, तो उसने आसमान की तरफ देखकर ईश्वर को गालियां दीं और कहा कि उसकी तो किस्मत ही फूटी है जो उसे जीवन में सिर्फ संघर्ष और पत्थर ही मिले हैं। समर की वाणी में बहुत कड़वाहट थी। वह गाँव के लोगों से भी सीधे मुँह बात नहीं करता था। अगर कोई उसे उस ज़मीन पर खेती करने की सलाह देता, तो वह झिड़क कर कहता, "इस बंजर ज़मीन में तो कांटे भी नहीं उगेंगे, तुम लोग मुझे बेवकूफ समझते हो क्या?" समर ने उस ज़मीन पर कोई मेहनत नहीं की। उसका मानना था कि जब किस्मत ही खराब है, तो मेहनत करने से क्या हासिल होगा। उसने जल्दी पैसा कमाने के लालच में गाँव के कुछ गलत लोगों की संगत पकड़ ली। वह हर दिन जुए और सट्टे में अपनी किस्मत आजमाने लगा। उसके बुरे बोल और कड़वे व्यवहार के कारण गाँव के अच्छे लोगों ने उससे दूरी बना ली।
दूसरी ओर, छोटा भाई कुणाल स्वभाव से बहुत ही शांत, परिश्रमी और सकारात्मक था। जब उसे वह बंजर ज़मीन मिली, तो उसने उसे अपने पिता का आशीर्वाद समझा। कुणाल की सोच यह थी कि ईश्वर ने अगर उसे यह पथरीली ज़मीन दी है, तो शायद इसके पीछे भी कोई बहुत बड़ी परीक्षा और कोई शुभ फल छिपा है। उसने किसी से कोई शिकायत नहीं की। कुणाल ने सुबह-सुबह उठकर ज़मीन से पत्थर हटाने का काम शुरू कर दिया। उसके हाथ छिल जाते, खून रिसने लगता, लेकिन उसके होंठों पर हमेशा एक प्रार्थना और धन्यवाद के शब्द होते। वह गाँव के बुजुर्गों और अनुभवी किसानों से बड़ी ही नम्रता से मिलता। उसकी मीठी वाणी और सम्मान देने की आदत की वजह से हर कोई उसकी मदद करने को तैयार रहता था। गाँव के लोगों ने उसे मिट्टी को उपजाऊ बनाने के तरीके सिखाए और बीज उपलब्ध कराए।
कुणाल ने उस ज़मीन पर पपीते और अमरूद के पेड़ लगाए। उसकी सकारात्मक सोच, उसकी मीठी बोली और उसके अथक कर्म का ही नतीजा था कि तीन साल के भीतर वह पथरीली और बंजर ज़मीन एक लहलहाते हुए फलों के बाग में बदल गई। कुणाल के बाग के फल शहर की मंडियों में ऊंचे दामों पर बिकने लगे। वह एक संपन्न और सम्मानित व्यक्ति बन गया, लेकिन उसके अंदर कभी अहंकार नहीं आया। वह हमेशा कहता था कि मनुष्य का हर एक अच्छा विचार और हर एक नेक काम ईश्वर के बैंक में जमा होता है।
वक्त का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। पाँच साल बाद एक ऐसा दिन आया जब समर पूरी तरह से बर्बाद हो गया। जुए और गलत संगत की वजह से उस पर शहर के सूदखोरों का भारी कर्ज़ा हो गया था। जब वह पैसे नहीं चुका पाया, तो कर्जदारों ने उसका घर और ज़मीन छीन ली। दर-दर की ठोकरें खाने के बाद, भूख और बीमारी से टूट चुका समर एक रात गाँव के मंदिर की सीढ़ियों पर लावारिसों की तरह पड़ा था। उसके पास ना तो एक वक्त की रोटी थी और ना ही कोई ऐसा दोस्त जो उसकी मदद कर सके। जिन लोगों पर वह अपनी कड़वी बातों से रौब झाड़ता था, आज उन्होंने भी उसकी तरफ से मुँह फेर लिया था।
जब कुणाल को इस बात का पता चला, तो वह नंगे पैर दौड़ता हुआ मंदिर पहुँचा। अपने बड़े भाई की यह दुर्दशा देखकर कुणाल की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने समर को अपने सीने से लगा लिया और उसे सम्मान के साथ अपने उस बड़े से घर में ले आया, जो उसने अपनी मेहनत से बनाया था। कुणाल ने कर्जदारों का सारा पैसा चुका दिया और सबसे अच्छे डॉक्टरों से अपने भाई का इलाज करवाया।
कुछ दिनों बाद जब समर की तबीयत में सुधार हुआ, तो वह कुणाल के सामने फूट-फूट कर रोने लगा। उसने रुंधे हुए गले से कहा, "कुणाल, पिताजी ने हम दोनों को एक जैसी ही चीज़ें दी थीं। फिर ईश्वर ने मेरे साथ इतना अन्याय क्यों किया? मेरी किस्मत में सिर्फ कांटे और बर्बादी क्यों लिखी, और तेरी किस्मत में इतनी सफलता कैसे आ गई?"
कुणाल ने मुस्कुराते हुए अपने भाई का हाथ थाम लिया और बहुत ही गहराई से बोला, "भैया, ईश्वर किसी की किस्मत में कांटे या फूल नहीं लिखता। पिता जी के जाने के बाद जो ज़मीन हमें मिली, वह सिर्फ एक कोरा कागज़ थी। उस कागज़ पर तकदीर की इबारत हमने खुद लिखी है। जब तुम सुबह उठकर अपनी किस्मत को कोसते थे, तो तुम्हारी नकारात्मक 'सोच' ने तुम्हारे लिए बंद दरवाज़े चुन लिए। जब तुम लोगों से कड़वा बोलते थे, तो तुम्हारे 'बोल' ने तुम्हारे सारे अच्छे रिश्ते खत्म कर दिए। और जब तुमने शॉर्टकट के चक्कर में गलत रास्ते पकड़े, तो तुम्हारे 'कर्मों' ने तुम्हारी बर्बादी तय कर दी।"
कुणाल ने आगे कहा, "मैंने बस अपनी 'सोच' में पिता जी का आशीर्वाद रखा, अपने 'बोल' में लोगों के लिए सम्मान रखा और अपने 'कर्म' में उस बंजर ज़मीन पर पसीना बहाया। जीवन के हर कदम पर, हमारी सोच, हमारे बोल और हमारे कर्म ही हमारा भाग्य लिखते हैं भैया। मैंने जो बोया, वह मेरा बाग बन गया, और आपने जो बोया, वह आपकी आज की स्थिति है। लेकिन आप अब भी अपने विचार और कर्म बदलकर अपना कल बदल सकते हैं।"
समर को आज जीवन का सबसे बड़ा और कड़वा सच समझ आ गया था। उसे एहसास हो गया था कि इंसान की किस्मत उसके हाथों की लकीरों में नहीं, बल्कि उसके रोज़मर्रा के विचारों, उसकी ज़ुबान से निकले शब्दों और उसके द्वारा किए गए कर्मों में छिपी होती है। उस दिन के बाद समर ने अपने अंदर की सारी कड़वाहट त्याग दी और कुणाल के साथ मिलकर बाग में मेहनत करने लगा। उसने अपने कर्मों से अपना भाग्य फिर से लिखना शुरू कर दिया था।
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