काव्या अपने शहर की सबसे प्रतिष्ठित और आधुनिक महिलाओं में गिनी जाती थी। उसके पति, समीर का एक बहुत बड़ा व्यापार था और उनका घर किसी महल से कम नहीं लगता था। काव्या को अपने रूप-रंग, अपने स्टेटस और अपनी शानो-शौकत पर बहुत घमंड था। वह हमेशा ब्रांडेड कपड़े पहनती, किटी पार्टियों में जाती और अपने इर्द-गिर्द सिर्फ उन्हीं लोगों को रखना पसंद करती जो उसकी तरह 'हाई क्लास' के हों। लेकिन इस चमचमाते महल में एक कोना ऐसा भी था, जो काव्या की आँखों में हमेशा खटकता रहता था। वह कोना था उसके ससुर, नारायण जी का।
नारायण जी की उम्र पचहत्तर के पार हो चुकी थी। उम्र के साथ उनका शरीर ढल चुका था, चेहरे पर गहरी झुर्रियां आ गई थीं और हाथों में एक हल्का सा कंपन रहता था। काव्या को उनका यह बुढ़ापा और उनकी सादगी अपने 'स्टेटस' पर एक धब्बे की तरह लगती थी। जब भी घर में काव्या के हाई-सोसाइटी दोस्त आते, तो वह नारायण जी को उनके कमरे से बाहर निकलने के लिए मना कर देती। "पिताजी, आपके हाथ कांपते हैं, आप चाय भी ठीक से नहीं पकड़ पाते। मेरे मेहमानों के सामने आप आ जाते हैं तो मुझे शर्मिंदगी होती है," काव्या अक्सर उन्हें बहुत कड़वे शब्दों में ताने मारती थी। समीर सब कुछ देखता था, लेकिन पत्नी के सामने उसकी एक नहीं चलती थी।
नारायण जी कभी इन बातों का बुरा नहीं मानते थे। वह बस अपनी शांत और थकी हुई आँखों से काव्या को देखते, एक हल्की सी मुस्कान उनके होठों पर आ जाती और वह चुपचाप अपने कमरे में चले जाते। उनका व्यवहार इतना मधुर और लगाव से भरा था कि वे काव्या के तानों का जवाब कभी गुस्से से नहीं देते थे। वे जानते थे कि समय का पहिया बहुत बलवान होता है और इंसान को उसकी असलियत का आईना ज़रूर दिखाता है।
समय अपनी गति से चलता रहा। एक दिन अचानक काव्या की तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई। शुरुआत एक हल्के बुखार से हुई, लेकिन दो दिन के भीतर ही उसके पूरे शरीर और चेहरे पर चिकनपॉक्स (माता) के बड़े-बड़े और दर्दनाक दाने निकल आए। काव्या की वह बेदाग और खूबसूरत त्वचा, जिस पर उसे इतना गुमान था, वह पूरी तरह से लाल और भद्दी दिखने लगी। डॉक्टर ने उसे पूरी तरह से आइसोलेशन (एकांत) में रहने की सख्त हिदायत दी ताकि इन्फेक्शन किसी और को न फैले।
दुर्भाग्यवश, उसी समय समीर को अपने व्यापार के सिलसिले में एक बेहद ज़रूरी मीटिंग के लिए पंद्रह दिनों के लिए विदेश जाना पड़ा। समीर ने घर में दो नर्सों का इंतज़ाम कर दिया और भारी मन से चला गया। अब घर में सिर्फ काव्या, नारायण जी और वे दो नर्सें थीं।
शुरुआत के दो दिन तो ठीक रहे, लेकिन जैसे-जैसे बीमारी का रूप भयंकर होता गया, काव्या की हालत बिगड़ने लगी। उसके चेहरे पर भयानक जलन होती थी। सबसे बड़ी चोट उसे तब लगी, जब उसके उन 'हाई-क्लास' दोस्तों ने फोन करना भी बंद कर दिया। जिन सहेलियों के साथ वह रोज़ घंटों शॉपिंग करती थी, उन्होंने इन्फेक्शन के डर से काव्या से दूरी बना ली। किसी ने एक बार भी घर आकर उसका हालचाल पूछने की ज़हमत नहीं उठाई। काव्या पहली बार अपनी ज़िंदगी में खुद को इतना अकेला, बदसूरत और लाचार महसूस कर रही थी। आईने में अपनी शक्ल देखकर उसे खुद से घिन आने लगी थी।
एक रात, दोनों नर्सें अपने कमरे में गहरी नींद में सो रही थीं। काव्या के शरीर में तेज़ दर्द हो रहा था और उसका गला प्यास से सूख रहा था। उसने कई बार बेल बजाई, लेकिन कोई नहीं आया। काव्या दर्द और बेबसी से रोने लगी। तभी उसके कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। नारायण जी अपने कांपते हाथों में पानी का गिलास और एक कटोरी में गर्म सूप लिए अंदर आ रहे थे।
काव्या उन्हें देखकर सन्न रह गई। उसने घबराकर कहा, "पिताजी! आप यहाँ क्यों आ गए? मेरे करीब मत आइए, आपको भी इन्फेक्शन हो जाएगा। आप तो वैसे ही इतने कमज़ोर हैं।"
नारायण जी के चेहरे पर वही पुरानी, शांत मुस्कान थी। उन्होंने धीरे से काव्या के माथे पर हाथ रखा और बोले, "अपनों से कैसा इन्फेक्शन बेटी? जब समीर बचपन में बीमार पड़ता था, तो क्या मैं उसे छोड़ देता था? तुम भी तो मेरी बेटी हो। शरीर कमज़ोर है तो क्या हुआ, दिल में तो आज भी वही ममता है।"
नारायण जी ने अपने कांपते हाथों से चम्मच पकड़ी और काव्या को सूप पिलाने लगे। अगले दस दिनों तक नारायण जी ने काव्या की जो सेवा की, वह कोई नर्स या डॉक्टर नहीं कर सकता था। वे सुबह उठकर उसके लिए नीम का पानी उबालते, उसे अपनी पुरानी कहानियाँ सुनाकर उसका दर्द बँटाते और रात-रात भर जागकर उसके माथे पर पट्टियां रखते। उन्होंने एक बार भी काव्या को उसके पुराने बुरे व्यवहार की याद नहीं दिलाई। उनका वह निस्वार्थ वात्सल्य और लगाव उस अंधेरे कमरे में किसी ईश्वरीय रोशनी की तरह था।
जैसे-जैसे काव्या ठीक हो रही थी, उसके भीतर का घमंड टूट कर आँसुओं में बह रहा था। जब वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई, तो वह सबसे पहले दौड़कर नारायण जी के कमरे में गई और उनके पैरों में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी।
"मुझे माफ़ कर दीजिए पिताजी," काव्या सुबकते हुए बोली। "मैंने हमेशा आपकी कमज़ोरियों का मज़ाक उड़ाया। मैंने सोचा था कि मेरी खूबसूरती और मेरे अमीर दोस्त ही मेरी ताकत हैं। लेकिन जब मेरा रूप छिन गया, तो सबने मेरा साथ छोड़ दिया। और आपने... आपने मुझे उस रूप में अपनाया जब मैं खुद को भी आईने में नहीं देख पा रही थी।"
नारायण जी ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए एक बहुत गहरी बात कही, जो काव्या के जीवन का सबसे बड़ा सबक बन गई। उन्होंने कहा, "बेटी, रूप, रंग, पैसा और जवानी... ये सब तो मेहमान हैं। ढल जाती है हर चीज अपने वक्त पर, बस एक व्यवहार और लगाव ही है जो कभी बूढ़ा नहीं होता। अगर हम अपने स्वभाव में मिठास और रिश्तों में लगाव रखते हैं, तो शरीर के कमज़ोर होने पर भी हमारी अहमियत कभी कम नहीं होती।"
काव्या की आत्मा तक ये शब्द उतर गए थे। उस दिन के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। जो ससुर कल तक काव्या के लिए एक बोझ थे, आज वे उसकी दुनिया का सबसे अहम हिस्सा बन चुके थे। काव्या को समझ आ गया था कि रिश्ते बाहरी चकाचौंध से नहीं, बल्कि आत्मा के जुड़ाव और सुंदर व्यवहार से सींचे जाते हैं।
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