एक खामोश रिश्ता: प्यार, डर और पछतावा

 रवींद्रनाथ जी की तेरहवीं का काम निपट चुका था। घर में पसरी हुई रिश्तेदारों की भीड़ अब धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौट चुकी थी। उनका इकलौता बेटा, समर, बैठक में एक खाली कुर्सी पर बैठा शून्य में घूर रहा था। समर के लिए उसके पिता हमेशा से एक सख्त, अनुशासनप्रिय और कठोर इंसान रहे थे। उसकी माँ, कमला, जीवन भर एक सहमी हुई पत्नी की तरह रहीं, जिनकी दुनिया केवल रसोई और घर के कामों तक सीमित थी। समर को याद नहीं था कि उसने कभी अपने पिता को मुस्कुराते हुए या प्यार से बात करते हुए देखा हो। वे पैसे देते थे, घर की ज़रूरतें पूरी करते थे, लेकिन उस घर में कभी परिवार जैसी गर्माहट नहीं रही। 


तभी दरवाज़े पर एक हल्की सी आहट हुई। समर ने नज़र उठाई तो देखा कि एक अधेड़ उम्र की महिला दहलीज पर खड़ी थी। उसने सफ़ेद रंग की एक सूती साड़ी पहनी हुई थी और उसकी आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। वह महिला इस परिवार की कोई रिश्तेदार नहीं थी, कम से कम समर तो उसे बिल्कुल नहीं पहचानता था। 


"आप कौन हैं? किससे मिलना है?" समर ने अपनी थकान भरी आवाज़ में पूछा।


महिला ने कोई जवाब नहीं दिया। वह धीरे-धीरे चलकर बैठक में आई और दीवार पर टंगी रवींद्रनाथ जी की फूल-मालाओं से लदी तस्वीर को देखकर फफक-फफक कर रो पड़ी। उसका रोना ऐसा था जैसे किसी ने उसकी दुनिया ही उजाड़ दी हो। समर हतप्रभ था। वह उठा और उसने पानी का गिलास उस महिला की ओर बढ़ाया। 


"आप बैठिए। और शांत होकर बताइए कि आप कौन हैं और पिताजी से आपका क्या रिश्ता था?" समर ने संयत स्वर में पूछा।


महिला ने कांपते हाथों से पानी का गिलास लिया। एक घूंट पानी पीकर उसने अपने आँसू पोंछे और एक ऐसी सच्चाई समर के सामने रख दी, जिसने उस बड़े से घर की नींव को हिलाकर रख दिया।


"मेरा नाम सुशीला है, बेटा," उसने भारी आवाज़ में कहना शुरू किया। "तुम्हारे पिता ने मुझसे कभी दुनिया के सामने शादी नहीं की, पर सच कहूँ तो वे मेरे लिए मेरे पति जैसे ही थे। बल्कि पति से भी बढ़कर थे।"


समर को लगा जैसे किसी ने उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया हो। "आप ये क्या कह रही हैं? मेरे पिताजी... और आप?"


सुशीला ने एक गहरी और दर्द भरी साँस ली। "हाँ समर। हम दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे, तुम्हारी माँ के इस घर में आने से बहुत पहले से। लेकिन तुम्हारे पिता के परिवार का इस शहर में बड़ा नाम था। उन्हें अपने समाज, अपनी बिरादरी और झूठी इज़्ज़त का बहुत डर था। उनमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे मेरे जैसी एक साधारण और गरीब घर की लड़की का हाथ दुनिया के सामने थाम सकें। इसी डर के कारण वे तुम्हारी माँ को ब्याह कर इस घर में ले आए।"


समर की आँखों के सामने अपनी माँ का वह उदास चेहरा घूमने लगा, जो ज़िंदगी भर अपने पति के प्यार के लिए तरसती रही। 


सुशीला की आँखें तस्वीर पर टिकी थीं। वह आगे बोली, "लेकिन शादी के बाद भी वे मुझसे दूर नहीं रह पाए। उन्होंने बिना शादी के ही मुझसे संबंध बनाए रखे। उन्होंने पूरी तरह से मेरा और मेरे परिवार का ख़याल रखा। मेरे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, उनकी शादियाँ, और घर की हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी को उन्होंने ऐसे निभाया जैसे एक आदर्श पिता और पति निभाता है। उन्होंने कभी भी मुझे या मेरे बच्चों को किसी भी बात की कमी नहीं होने दी। दुनिया के लिए मैं भले ही कोई नहीं थी, लेकिन उनकी दुनिया मेरे ही घर में बसती थी।"


समर का शरीर सुन्न पड़ चुका था। जिस पिता ने कभी उसे प्यार से सीने से नहीं लगाया, जिस पिता ने उसकी माँ को सिर्फ एक नौकरानी से ज़्यादा का दर्जा नहीं दिया, वह इंसान किसी और परिवार के लिए इतना समर्पित कैसे हो सकता है? 


सुशीला ने समर के चेहरे के भावों को पढ़ लिया था। उसकी आवाज़ में अब एक गहरा अपराधबोध था। "मैं जानती हूँ समर, तुम्हारे साथ और तुम्हारी माँ के साथ उन्होंने बहुत बड़ा अन्याय किया है। अपनी कायरता का गुस्सा और अपनी घुटन वे तुम दोनों पर निकालते थे। मैं भी तुम्हारी माँ के समान ही उनसे डरती थी। ज़बान के वे बहुत कटु थे, कभी-कभी बहुत कड़वा बोल जाते थे, पर दिल के बहुत अच्छे थे। उन्होंने कभी मुझे अकेला महसूस नहीं होने दिया। इतने सालों में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता जब मैं उन्हें बिना देखे रही हूँ।"


सुशीला फिर से रोने लगी। "आज वे चले गए हैं। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि आगे मेरी ज़िंदगी कैसे कटेगी। मुझे बस उन्हें आखिरी बार देखने की लालसा थी, इसलिए यहाँ चली आई।"


समर उस औरत को देख रहा था। उसके भीतर कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक अजीब सी विडंबना का अहसास था। उसके पिता ने दो औरतों की ज़िंदगी बर्बाद की थी। एक को समाज का नाम और सम्मान दिया, लेकिन प्यार और अपनापन कभी नहीं दिया। दूसरी को अपना सारा प्यार और समर्पण दिया, लेकिन समाज के सामने उसे कभी इज़्ज़त नहीं दे पाए। और इन सबके बीच, समर का अपना बचपन एक ऐसे पिता की कठोरता तले रौंदा गया, जिसका दिल असल में कहीं और बसता था। 


समर ने कोई कटु शब्द नहीं कहा। उसने बस चुपचाप सुशीला को देखा। उसे समझ आ गया था कि समाज के खोखले डर और कायरता की कीमत सिर्फ एक इंसान नहीं चुकाता, बल्कि उससे जुड़ी कई पीढ़ियां उस दर्द को ढोती हैं। रवींद्रनाथ जी तो चले गए थे, लेकिन अपने पीछे वो खामोश चीखें छोड़ गए थे, जिन्हें अब समर को जीवन भर सुनना था।


समाज के डर से लिए गए ऐसे दोहरे फैसले अक्सर कई जिंदगियों को किस तरह प्रभावित करते हैं, इस विषय पर अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें। 


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