खामोश चीखें और रेशमी बेड़ियाँ

 


रेशम के धागों में बुने हुए लाल जोड़े को निहारती हुई राधिका की आँखों में हज़ारों सपने तैर रहे थे। उसकी बड़ी भाभी अक्सर उसे छेड़ते हुए पूछती थीं, "राधिका, बता तुझे कैसी ज़िंदगी चाहिए? पहले किसी से इश्क लड़ाएगी या पहले शादी करेगी और फिर प्यार?" राधिका हमेशा शर्मा कर अपनी पलकें झुका लेती और मासूमियत से कहती, "भाभी, अगर शादी और प्यार दोनों एक साथ हो जाएं, तो ज़िंदगी किसी परीकथा जैसी नहीं हो जाएगी?" राधिका का दिल मोम जैसा नर्म था, जो किताबों में पढ़ी हुई प्रेम कहानियों पर यकीन करता था और एक ऐसे राजकुमार का इंतज़ार करता था जो उसे पलकों पर बिठाकर रखे और उसे दुनिया की हर खुशी दे।


एक दिन राधिका के घर एक ऐसा रिश्ता आया जिसने पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ा दी। शहर के सबसे बड़े और नामी उद्योगपति, सेठ सूरजभान का इकलौता बेटा देवांश। देवांश लंदन से पढ़कर लौटा था और उसका अपना एक बहुत बड़ा कारोबार था। सूरजभान जी को राधिका की सादगी और उसके संस्कार इतने भा गए कि उन्होंने बिना किसी दहेज या तामझाम के राधिका को अपने घर की बहू बनाने का फैसला कर लिया। राधिका के माता-पिता की तो जैसे लॉटरी लग गई थी। राधिका का विवाह बड़ी ही धूमधाम से देवांश के साथ संपन्न हो गया।


सपनों की एक नई दुनिया और आँखों में एक असीम प्यार की उम्मीद लिए, राधिका ने उस विशाल और आलीशान कोठी में अपना पहला कदम रखा। घर क्या था, वह तो एक महल था, जहाँ हर चीज़ रेशम और सोने से मढ़ी हुई थी। राधिका ने सोचा था कि उसका पति, जो इतना पढ़ा-लिखा और दुनिया घूमा हुआ इंसान है, वह उसके मन को समझेगा, उसके सपनों को एक नई उड़ान देगा। लेकिन हकीकत उन सपनों से कोसों दूर थी।


विवाह की पहली रात, जिसे हर लड़की अपने जीवन का सबसे हसीन पल मानती है, राधिका के लिए एक ऐसा डरावना सच लेकर आई जिसने उसकी आत्मा को छलनी कर दिया। फूलों से सजे उस विशाल कमरे में जब देवांश दाखिल हुआ, तो उसके चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं थी। उसने राधिका की तरफ एक ऐसी नज़र से देखा जिसमें ना तो कोई अपनत्व था, ना ही कोई कोमलता। देवांश के लिए राधिका कोई जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि एक ऐसा खिलौना थी जिसे उसके पिता ने अपनी पसंद से खरीद कर घर में सजा दिया था।


बिना कोई प्यार भरे शब्द कहे, बिना राधिका की भावनाओं को समझे, देवांश ने उस रात जो व्यवहार किया, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को पत्थर कर देने के लिए काफी था। वह एक ऐसा पति था जिसकी जड़ें तो किताबों और डिग्रियों में थीं, लेकिन उसका दिल पूरी तरह से बंजर था। राधिका उसके लिए केवल एक शारीरिक ज़रूरत पूरी करने और घर की शोभा बढ़ाने वाली एक निर्जीव वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं थी।


दिन बीतते गए और राधिका उस महलनुमा कोठी में एक सजावटी मूर्ति बनकर रह गई। बाहर से देखने वालों को लगता कि राधिका कितनी भाग्यशाली है, जो उसे ऐसा रईस और पढ़ा-लिखा पति मिला है। लेकिन उस कोठी की चारदीवारी के पीछे राधिका हर रात अपने आँसुओं से तकिया भिगोती थी। देवांश कभी उससे दो पल बैठकर बात नहीं करता। उसका प्यार तो दूर, उसकी नज़रों में राधिका के लिए एक इंसान होने का भी सम्मान नहीं था। राधिका जब भी उससे अपने मन की बात कहने की कोशिश करती, देवांश उसे झिड़क देता। "तुम्हें किस चीज़ की कमी है? जो चाहोगी वह खरीद सकती हो। बस मुझसे यह प्यार-मोहब्बत और जज़्बातों की फालतू उम्मीद मत रखना," देवांश के ये शब्द राधिका के कानों में सीसा बनकर उतरते थे।


महीनों तक राधिका इस घुटन भरे माहौल में अपने आपको समेटने की कोशिश करती रही। उसके मन की वह प्यारी सी लड़की जो कभी प्यार और शादी के एक साथ होने के सपने देखती थी, वह कहीं बहुत पीछे छूट गई थी। एक दिन राधिका अपने कमरे के बड़े से आईने के सामने खड़ी थी। उसने देखा कि भारी ज़ेवरों और महंगी साड़ियों के बोझ तले वह चुलबुली और सपनों से भरी राधिका कहीं मर चुकी है। उसकी आँखों की चमक गायब हो गई थी और चेहरे पर एक अजीब सी वीरानी छा गई थी। उसने महसूस किया कि वह एक ऐसे इंसान से प्यार की भीख मांग रही है, जिसके पास दिल नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। उस दिन राधिका के अंदर जैसे कुछ टूटकर दोबारा जुड़ने लगा। उसने तय किया कि वह अब इस घुटन में घुट-घुट कर नहीं जिएगी। प्यार न सही, लेकिन वह अपना आत्मसम्मान और अपनी पहचान वापस पाएगी।


राधिका ने अपनी अलमारी से एक लाल रंग का साधारण सा सलवार सूट निकाला और उसे पहन लिया। बालों का जो भारी और कसा हुआ जूड़ा वह इस घर की बहू होने के नाते हमेशा बनाए रखती थी, उसे खोलकर आज उसने अपना हेयरस्टाइल बदल लिया और बालों को खुला छोड़ दिया। उसके गले में जो भारी सोने का मंगलसूत्र था, जो उसे अब एक दमघोंटू जंजीर की तरह महसूस होने लगा था, उसे उतारकर उसने एक बहुत ही साधारण और पतली सी नेकलेस पहन ली। आज आईने में जो अक्स उभर रहा था, वह सेठ सूरजभान की डरी और सहमी हुई बहू का नहीं, बल्कि आज़ाद और अपनी शर्तों पर जीने वाली राधिका का था।


राधिका ने समझ लिया था कि पति के नाम पर उसे जो पत्थर मिला है, उससे वह प्यार की उम्मीद कभी नहीं कर सकती। उसने अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने और एक एनजीओ के साथ जुड़कर गरीब बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया। देवांश ने जब यह बदलाव देखा तो वह चौंक गया, लेकिन राधिका ने अब उसके तानों और उसकी बेरुखी की परवाह करना पूरी तरह छोड़ दिया था। उसने अपने लिए एक नई दुनिया बसा ली थी, जहाँ वह खुद से प्यार करती थी। उसने जान लिया था कि सबसे बड़ा प्रेम वह होता है, जो इंसान खुद से और अपने आत्मसम्मान से करता है।


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दोस्तों, आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या हमारे समाज में आज भी ऐसी कई राधिका मौजूद हैं, जो महलों में तो रहती हैं, लेकिन अंदर ही अंदर एक ऐसे रिश्ते में घुट रही होती हैं जिसमें कोई भावनाएं नहीं होतीं? अगर आपके आस-पास या आपकी नज़र में ऐसा कोई अनुभव है, तो अपने विचार हमारे साथ कमेंट सेक्शन में जरूर साझा करें।


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