**अहंकार की दीवार और रिश्तों की बुनियाद**

 "समर, तुम हमेशा ऐसा क्यों करते हो? तुम्हें मेरी कोई फिक्र ही नहीं है।" काव्या ने समर के स्टडी रूम में घुसते ही शिकायत भरे लहजे में कहा।


समर ने अपनी फाइल बंद की और काव्या की ठुड्डी को हल्के से पकड़ते हुए कहा, "तो तुम मेरी हर बात पर इतना भड़क क्यों जाती हो?"


काव्या समर के बेहद करीब आ गई और उसकी आंखों में देखते हुए बोली, "तो तुम मुझसे इतना दूर क्यों भागते हो? मेरे करीब क्यों नहीं रहते? तुम जानते हो कि मैं शादी के बाद अपना सारा वक्त सिर्फ तुम्हारे साथ बिताना चाहती हूं।"


समर ने धीरे से खुद को पीछे किया और एक लंबी सांस लेते हुए बोला, "काव्या, हम एक ही घर में रहते हैं। सारा वीकेंड हम साथ होते हैं। लेकिन इसके अलावा भी मेरी एक दुनिया है। इंसान को कुछ समय अपनों के लिए, अपने दोस्तों के लिए भी चाहिए होता है।"


काव्या ने मुंह बिचका लिया और नफरत भरे स्वर में बोली, "तुम्हारे वो दोस्त? उनकी तो बात ही मत करो। मुझे समझ नहीं आता कि तुम हर शाम उन दो कौड़ी के, छोटे स्तर वाले लोगों के बीच क्यों बैठे रहते हो! तुम्हारा इस शहर में इतना बड़ा नाम है, और तुम उन झोपड़पट्टी वालों के साथ..."


"काव्या!" समर की आवाज अचानक तेज हो गई। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। "अपनी हद पार मत करो। तुम्हारी यही बात मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगती। जिन लोगों को तुम दो कौड़ी का कह रही हो, वो मेरे बचपन के साथी हैं। जब मेरे पिता का निधन हुआ था और हमारे घर में चूल्हा तक नहीं जला था, तब इन्हीं 'छोटे' लोगों ने अपना पेट काटकर हमें खाना खिलाया था। मेरे लिए वो परिवार हैं। चल अब बाहर जा, मुझे बहुत जरूरी काम है।" समर ने गुस्से से उसे कमरे के बाहर का रास्ता दिखा दिया।


काव्या पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गई। उसे समर का यह व्यवहार अपने प्यार का अपमान लगा। वह एक बहुत ही अमीर और रसूखदार परिवार से आई थी, जहाँ इंसानों की इज्जत उनके बैंक बैलेंस और कपड़ों के ब्रांड से तय होती थी। समर के दोस्त—दीपक जो एक मैकेनिक था, और रमन जो एक छोटी सी परचून की दुकान चलाता था—काव्या की नजरों में किसी कीड़े-मकौड़े से कम नहीं थे। उसे लगता था कि ये लोग समर के पैसों का फायदा उठाते हैं और उसे उसके पति से दूर कर रहे हैं।


अगले दिन समर को किसी जरूरी मीटिंग के सिलसिले में तीन दिन के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। घर में काव्या और समर की बूढ़ी मां, यशोदा जी ही थीं। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और तेज आंधी के कारण बिजली भी कट गई थी। अचानक यशोदा जी के सीने में तेज दर्द उठा। वे दर्द से तड़पने लगीं और उनके माथे पर पसीना आ गया। काव्या बुरी तरह घबरा गई। उसने अपनी गाड़ी की चाबी निकाली, लेकिन बारिश और सड़क पर जलभराव के कारण गाड़ी ले जाना नामुमकिन सा लग रहा था। 


काव्या ने कांपते हाथों से अपने हाई-सोसाइटी वाले कई दोस्तों को फोन लगाया। किसी ने इतनी रात और तूफान का बहाना बनाया, तो किसी ने फोन ही नहीं उठाया। काव्या के आंसू बहने लगे। उसकी सास की सांसें उखड़ रही थीं। तभी उसे समर की एक डायरी याद आई जिसमें इमरजेंसी नंबर लिखे थे। उसमें सबसे ऊपर दीपक का नंबर था। काव्या ने अपना सारा अहंकार निगलते हुए झिझकते हुए दीपक को फोन किया।


"हेलो भाभी जी! भइया तो शहर से बाहर हैं, सब ठीक तो है घर पे?" दूसरी तरफ से दीपक की चिंता और सम्मान भरी आवाज आई।


काव्या ने रोते हुए सारी बात बताई। सिर्फ पंद्रह मिनट के अंदर, दीपक अपनी पुरानी और खटारा सी मारुति वैन लेकर काव्या के दरवाजे पर खड़ा था। उसके साथ रमन भी था। दोनों बारिश में पूरी तरह भीग चुके थे, लेकिन उन्हें अपनी परवाह नहीं थी। उन्होंने बहुत ही सावधानी से यशोदा जी को उठाया और गाड़ी में लिटाया।


"आप बिल्कुल मत घबराइए भाभी जी, अम्मा को कुछ नहीं होगा। हम हैं ना," रमन ने काव्या को तसल्ली देते हुए कहा।


अस्पताल पहुंचकर डॉक्टरों ने तुरंत यशोदा जी को आईसीयू में ले लिया। काव्या एक कोने में सहमी हुई बैठी थी। उसने देखा कि दीपक और रमन पूरी रात अस्पताल के चक्कर काटते रहे। कभी दवाइयां लाते, कभी ब्लड बैंक की लाइन में लगते। उन्होंने अपनी जेब से सारे पैसे खर्च कर दिए, लेकिन काव्या से एक बार भी पैसों के लिए नहीं कहा। उनके गीले कपड़े सूख चुके थे और वे थकान से चूर थे, लेकिन उनकी आंखों में अपनी 'अम्मा' के लिए फिक्र साफ झलक रही थी।


सुबह के चार बजे डॉक्टर बाहर आए और मुस्कुराकर बोले, "आप लोगों ने बिल्कुल सही समय पर इन्हें यहां पहुंचा दिया। अगर आधा घंटा भी और देरी हो जाती तो बचाना मुश्किल था। अब ये खतरे से बाहर हैं।"


यह सुनकर काव्या वहीं फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। ये आंसू घबराहट के नहीं, बल्कि उसके उस गहरे पश्चाताप के थे जिसने आज उसके सारे गुरूर को मिट्टी में मिला दिया था।


दोपहर तक समर भी पहली फ्लाइट से वापस आ गया। अस्पताल पहुंचकर जब उसने अपनी मां को सुरक्षित देखा, तो उसने राहत की सांस ली। काव्या दौड़कर समर के गले लग गई और रोते हुए बोली, "मुझे माफ कर दो समर। मैं बहुत बड़ी मूर्ख थी। मैंने हमेशा इंसानों को उनके कपड़ों और हैसियत से तौला। लेकिन आज मुझे समझ आ गया कि इंसान की असली हैसियत उसके दिल और उसके कर्मों से होती है। जिन लोगों को मैंने दो कौड़ी का समझा, आज उन्होंने मेरे लिए भगवान बनकर मां की जान बचाई है। मैं सच में बहुत शर्मिंदा हूं।"


समर ने काव्या के आंसू पोछे। पास ही स्टील की ठंडी बेंच पर सो रहे दीपक और रमन को देखकर समर की आंखें भी भर आईं। काव्या ने आगे बढ़कर उन दोनों 'छोटे' लोगों के हाथ जोड़ लिए। दीपक हड़बड़ा कर उठ गया, "अरे भाभी जी, ये क्या कर रही हैं आप? आप तो हमारे घर की लक्ष्मी हैं।"


उस दिन काव्या को समझ आ गया था कि जिंदगी में सच्चा सुकून और सुरक्षा बैंक बैलेंस या बड़े रुतबे वाले लोगों से नहीं, बल्कि उन सच्चे रिश्तों से मिलती है जो मुसीबत के वक्त बिना किसी स्वार्थ के आपके साथ खड़े होते हैं। अहंकार की दीवार हमेशा के लिए टूट चुकी थी।


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**आपकी क्या राय है?**

क्या आपने भी कभी बाहरी दिखावे या हैसियत के आधार पर किसी इंसान का गलत आंकलन किया है? क्या मुसीबत के वक्त खून के रिश्तों से ज्यादा ये निस्वार्थ दोस्ती काम नहीं आती? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।


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