रिश्तों की राख

 अविनाश के जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि उसकी माँ जीवित थी, उसी शहर में रहती थी, लेकिन फिर भी वह एक अनाथ की तरह पला-बढ़ा था। पिता के देहांत के बाद माँ ने अपनी एक नई दुनिया बसा ली और दूसरी शादी करके अविनाश को उसके बड़े ताऊजी और ताईजी के पास हमेशा के लिए छोड़ दिया। माँ कभी-कभार त्योहारों पर मिलने आती, कुछ महंगे खिलौने या कपड़े दे जाती, लेकिन उसकी आँखों में अविनाश के लिए वो ममता और तड़प कभी नहीं दिखी जो उसे अपने नए परिवार के बच्चों के लिए थी। इस गहरी उपेक्षा और बचपन के उस सूनेपन ने अविनाश के मन में रिश्तों के प्रति एक गहरी कड़वाहट भर दी थी।

बचपन से ही ताईजी के तानों और ताऊजी के कठोर अनुशासन के बीच पलते हुए अविनाश ने खुद को एक सख्त खोल में समेट लिया था। ताईजी हमेशा उसे एक बोझ समझती थीं। खाने की थाली परोसने से लेकर स्कूल की फीस भरने तक, ताईजी का हर काम यह जताने के लिए होता था कि अविनाश उन पर एक ऐसा कर्ज है जिसे चुकाने की जिम्मेदारी उनके सिर जबरदस्ती मढ़ दी गई है। इन सब हालातों ने अविनाश के मन में शादी और परिवार नाम की संस्था से एक गहरी चिढ़ पैदा कर दी थी। उसे लगता था कि हर रिश्ता सिर्फ एक समझौता है, और परिवार एक ऐसा पिंजरा है जहाँ इंसान घुट-घुट कर मरता है।

लेकिन, जीवन के इस नीरस पतझड़ में जब काव्या का प्रवेश हुआ, तो अविनाश की दुनिया का मौसम ही बदल गया। काव्या उसके ऑफिस में नई आई थी। उसकी सादगी, उसकी निस्वार्थ हंसी और हर किसी की मदद करने का उसका स्वभाव अविनाश के जमे हुए दिल को धीरे-धीरे पिघलाने लगा। काव्या ने अविनाश के उस खामोश दर्द को बिना कहे ही पढ़ लिया था, जिसे आज तक उसके अपने नहीं समझ पाए थे। जब अविनाश टाइफाइड से तप रहा था और उसके घर वालों ने उसे एक कमरे में अलग छोड़ दिया था, तब काव्या ने ही अस्पताल में उसकी तीमारदारी की थी। काव्या के हाथों से बने उस सादे से दलिये में अविनाश को पहली बार वो स्वाद मिला था, जिसे दुनिया 'माँ का प्यार' कहती है। काव्या के निस्वार्थ स्नेह और परवाह ने अविनाश के मन की उस गहरी खाई को भर दिया था, जहाँ अपनों ने सिर्फ कांटे बोए थे। अविनाश को पहली बार यह एहसास हुआ कि वो भी किसी के लिए मायने रखता है।

मगर नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। जैसे-जैसे वे दोनों एक-दूसरे के करीब आ रहे थे, परिस्थितियां उन्हें पास लाने के बजाय दूर धकेलने लगीं। काव्या के पिता को पैरालिसिस का अटैक आ गया और घर की बड़ी बेटी होने के नाते उसे अपनी नौकरी छोड़कर अपने शहर वापस लौटना पड़ा। दूरियों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ ने उन दोनों के बीच एक मजबूरी की दीवार खड़ी कर दी। अविनाश फिर से उसी अकेलेपन और घुटन के दलदल में धंसने लगा, जिससे काव्या ने उसे निकाला था।

दिवाली का त्योहार था। अविनाश ना चाहते हुए भी अपने पुश्तैनी घर गया था। घर में दीपों की रोशनी थी और बाहर पटाखों का शोर, लेकिन अविनाश के लिए वह घर हमेशा की तरह एक ठंडी सराय से ज्यादा कुछ नहीं था। रात को पूजा संपन्न होने के बाद जब सब लोग ड्राइंग रूम में बैठे थे, तभी ताऊजी ने फिर से वही पुरानी और चुभती हुई बात छेड़ दी।

"अविनाश, अब तुम अच्छी नौकरी कर रहे हो। उम्र भी हो रही है। शहर के एक बहुत बड़े ठेकेदार की बेटी का रिश्ता आया है। मैंने हाँ कर दी है। लड़की वाले इसी महीने सगाई करना चाहते हैं," ताऊजी का लहजा एकदम आदेशात्मक था, उसमें अविनाश की रजामंदी के लिए कोई जगह नहीं थी।

अविनाश के अंदर का सोया हुआ ज्वालामुखी फटने को बेताब हो गया। उसने गहरी सांस ली और कहा, "ताऊजी, मैं आपको पहले भी कई बार साफ-साफ बता चुका हूँ कि मुझे शादी नहीं करनी है। मुझे इन खोखले रिश्तों और शादी के नाम से ही घुटन होती है। आप मुझ पर यह फैसला नहीं थोप सकते।"

ताईजी, जो अब तक चांदी के बर्तनों को सजा रही थीं, अचानक पलटकर ताने भरे स्वर में बोलीं, "घुटन तो हमें भी बहुत हुई थी जब तुम्हारे पिता के मरने के बाद तुम्हारी वो स्वार्थी माँ तुम्हें हमारे गले मढ़ कर चली गई थी। हमने अपने बच्चों का पेट काटकर तुम्हें पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया। क्या अब हमारा इतना भी हक नहीं कि हम अपने हिसाब से तुम्हारी शादी कर सकें? वो लड़की दहेज में इतना कुछ ला रही है और उनका रुतबा इतना बड़ा है कि हमारे परिवार की समाज में नाक ऊंची हो जाएगी।"

अविनाश अपनी जगह पर स्तब्ध रह गया। उसे ताईजी के इस बेगानेपन और कठोरता की आदत तो थी, लेकिन आज उनके स्वार्थ का यह नंगा रूप देखकर उसकी आत्मा तक कांप गई। उसे गहराई से महसूस हुआ कि जिस परिवार को वह अपना खून मानता था, वहां वह सिर्फ एक 'इन्वेस्टमेंट' था, जिससे अब उन्हें भारी मुनाफा कमाने का वक्त आ गया था। उसे काव्या की बहुत याद आई, जिसकी आँखों में अविनाश के लिए कोई स्वार्थ नहीं था, कोई लालच नहीं था, सिर्फ और सिर्फ अथाह प्यार था।

अविनाश अपनी जगह से उठा। उसकी आँखों में अब कोई डर, कोई संकोच या बचपन का वो अपराधबोध नहीं था। उसने बिल्कुल शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, "ताईजी, ताऊजी... आपने मुझे छत दी और पाला, इसका कर्ज मैं जीवन भर चुकाऊंगा। मैं अपनी तनख्वाह का एक बड़ा हिस्सा हर महीने आपके खाते में भेजता हूँ और आगे भी भेजता रहूंगा। लेकिन अपनी जिंदगी और अपनी भावनाओं का सौदा मैं आपकी झूठी शान और दहेज के लिए नहीं कर सकता। जो माँ मुझे जन्म देकर भी अपना नहीं सकी, और जिन अपनों ने मुझे पालकर भी हमेशा पराया ही समझा, उनके स्वार्थ के लिए मैं उस इकलौते इंसान को नहीं छोड़ सकता जिसने मुझे बिना किसी लालच के अपना माना है।"

अविनाश ने अपने कमरे से अपना बैग उठाया और घर की दहलीज पार कर ली। बाहर पटाखों का धुआं था, लेकिन अविनाश के मन का आसमान आज एकदम साफ था। उसे पता था कि अब उसे कहाँ जाना है। उसे अपने उस वसंत के पास जाना था जो किसी दूसरे शहर में उसका इंतजार कर रहा था। काव्या से दूर रहकर उसने जो घुटन महसूस की थी, आज इस झूठे परिवार के पिंजरे को तोड़कर वह पूरी तरह आजाद हो गया था। रिश्तों की राख से निकलकर अविनाश अब अपने प्रेम के उस आँगन में कदम रखने जा रहा था, जहाँ कोई उसे पराया नहीं समझेगा।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या अहसानों के बोझ तले दबकर अपनी पूरी जिंदगी की खुशियों की कुर्बानी दे देना सही है? क्या अविनाश का यह साहसिक कदम सही था? अपने विचार कमेंट करके जरूर बताएं।

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