गर्मी की दोपहर थी। आँगन में आम के पेड़ की छांव तले ललिता बैठी थी। चेहरे पर हल्की मुस्कान और आँखों में नमी थी। आज उसका वर्षों पुराना सपना साकार होने जा रहा था — बेटी नेहा का विवाह। घर में चहल-पहल थी। रिश्तेदारों की आवाज़ें, मंडप की सजावट, पंडित जी के मंत्रोच्चार की गूंज — सब कुछ ऐसा लग रहा था मानो जीवन की सारी अधूरी इच्छाएँ आज पूरी हो रही हों।
ललिता एक-एक रिश्तेदार को अपने हाथों से मिठाई खिला रही थी। उसकी साड़ी के पल्लू में पसीना और आँसू दोनों थे। जब उसने नेहा को लाल जोड़े में देखा तो उसकी आँखें ठहर गईं — बिलकुल वैसी ही लग रही थी जैसी कभी वो खुद अपनी शादी में लगी थी, बस फर्क इतना था कि उस दिन उसके साथ उसके सपने थे और आज सिर्फ़ उनकी यादें।
नेहा और वरुण मंडप में बैठे थे। पंडित जी मंत्रोच्चार कर रहे थे। हर "स्वाहा" के साथ ललिता के दिल की कोई पुरानी टीस भस्म होती जा रही थी।
पर अचानक उसकी निगाहें शून्य में टिक गईं। मन कहीं पीछे चला गया — उन दिनों में, जब उसका जीवन अधूरा था।
उसे याद आया, जब उसकी शादी रमेश से हुई थी, तो उनके पास कुछ नहीं था। बस एक छोटा-सा किराये का मकान और ढेर सारे सपने। रमेश सरकारी स्कूल में अध्यापक थे, और ललिता घर संभालती थी। हर शाम दोनों छत पर बैठकर बातें करते —
“एक दिन अपना खुद का घर होगा ललिता,” रमेश कहते,
“उसमें एक बगीचा होगा, जहाँ तुम अपनी पसंद के फूल लगाना, और मैं बरामदे में अखबार पढ़ूंगा।”
ललिता हँस पड़ती, “और नेहा वहीं खेलती रहेगी, है ना?”
रमेश मुस्कुराते, “हाँ, बिल्कुल वहीं।”
दिन गुजरते गए। कुछ रुपये जोड़कर उन्होंने एक छोटा-सा प्लॉट खरीदा। घर बनाने की शुरुआत भी की। ईंट, बालू, सीमेंट — सब जमा हो गए थे। हर रविवार को रमेश खुद काम की निगरानी करते। उनकी आँखों में चमक थी, जैसे कोई नया जीवन शुरू हो।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। एक दिन स्कूल से लौटते वक्त रमेश की बस का भयानक एक्सीडेंट हो गया। उस हादसे में कई लोग मारे गए, जिनमें रमेश भी थे।
वो खबर जब ललिता तक पहुँची, तो उसके पैर ज़मीन से उठ गए। सब कुछ एक पल में ख़ामोश हो गया। नेहा उस वक्त सिर्फ़ पाँच साल की थी। ललिता के कंधों पर अब जिम्मेदारी का पहाड़ था।
जिस घर का सपना उन्होंने साथ देखा था, वो सपना अधूरा रह गया।
घर का सारा सामान वहीं पड़ा रह गया। बारिश में गीली ईंटें धीरे-धीरे टूट गईं। ललिता हर शाम उस ज़मीन के पास से गुजरती, पर अंदर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाती।
उसे लगता, अगर उस मिट्टी पर पैर रखा तो रमेश की आवाज़ सुनाई देगी —
“थोड़ा जल्दी करना ललिता, छत डालनी है।”
समय बीता। ललिता ने सिलाई का काम शुरू किया। छोटी-छोटी फुलकारी और स्कूल यूनिफॉर्म सीकर नेहा की पढ़ाई का खर्च उठाया।
कभी-कभी रात में थककर जब वह मशीन बंद करती, तो सामने रखी रमेश की तस्वीर को देखती और कहती —
“तुम्हारा सपना अधूरा रह गया रमेश, लेकिन मैं नेहा को कुछ कमी नहीं आने दूँगी।”
नेहा धीरे-धीरे बड़ी हुई। कॉलेज में पढ़ने लगी। और उसी दौरान उसे नौकरी का प्रस्ताव मिला। वह होशियार थी, संवेदनशील थी। वह हमेशा माँ से कहती,
“माँ, आप देखना, एक दिन मैं सब पूरा कर दूँगी। वो घर, वो बगीचा, सब कुछ।”
ललिता मुस्कुरा देती, “बेटा, अब वो सपने बस यादें हैं।”
वक़्त उड़ता गया। नेहा की नौकरी लग गई, और घर में खुशियों की रौनक लौट आई। अब वही बेटी, जो कभी स्कूल की फीस के लिए माँ को रोते देखती थी, माँ के आँसू पोछती थी।
एक दिन नेहा ने कहा,
“माँ, अगले रविवार को कहीं चलेंगे।”
“कहाँ?” ललिता ने पूछा।
“बस चलिए, सरप्राइज है।”
रविवार को नेहा माँ को एक नई कॉलोनी में ले गई। वहाँ सुंदर-सुंदर घर बने हुए थे, बगीचे में बच्चे खेल रहे थे।
नेहा ने कार रोकी और कहा,
“आइए माँ, कुछ दिखाना है।”
ललिता ने देखा, एक छोटा लेकिन सुंदर घर उनके सामने था। दरवाज़े पर बोर्ड लगा था — “ललिता निवास।”
वह चौंक गई, “ये क्या है नेहा?”
नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा,
“माँ, ये आपका घर है। मैंने कुछ सालों से पैसे बचाए थे। अब वो सपना पूरा हो गया जो आपने और पापा ने देखा था।”
ललिता की आँखों से आँसू झर-झर गिरने लगे। उसने धीरे से दीवार को छुआ, जैसे रमेश को छू रही हो।
“देखो रमेश,” उसने फुसफुसाकर कहा, “हमारा घर बन गया।”
अब आज वही घर फूलों से सजा हुआ था। वही बरामदा, जहाँ रमेश अखबार पढ़ना चाहता था, आज वहीं नेहा की शादी का मंडप सजा था।
ललिता ने दीवारों पर टंगी तस्वीरों को देखा — रमेश की मुस्कुराती तस्वीर के नीचे लिखा था, “आपका सपना पूरा हुआ।”
वह थककर पास की कुर्सी पर बैठ गई। नेहा मंडप से उठकर माँ के पास आई,
“माँ, देखो, सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा आप चाहती थीं।”
ललिता ने कहा,
“हाँ बेटी, अब सब पूरा हो गया। बस तुम्हारी मुस्कान देखकर लगता है जैसे तुम्हारे पापा यहीं कहीं पास खड़े हैं।”
तभी पंडित जी की आवाज़ गूंजी —
“अब कन्यादान के लिए माता-पिता आएं।”
नेहा ने माँ का हाथ पकड़ते हुए कहा,
“माँ, अब आपको अकेला नहीं रहना पड़ेगा। मैं चाहे जहाँ रहूँ, ये घर, ये आँगन हमेशा आपका रहेगा।”
ललिता ने धीरे से नेहा के माथे को चूमा और बोली,
“बेटी, अब मुझे कुछ और नहीं चाहिए। जो सपना तुम्हारे पिता ने देखा था, वो आज तुम्हारे हाथों पूरा हुआ। अब बस एक ही दुआ है —
तुम्हारी जिंदगी में कभी कोई अधूरा सपना न रहे।”
पंडित जी के मंत्रों के साथ आरती की थाली घुमाई गई।
वातावरण में अगरबत्ती की खुशबू, पवित्रता और संतोष घुल चुका था।
नेहा ने माँ के आँचल में सिर रखा,
“माँ, अब आपका घर बन गया, अब आपके आँसू नहीं गिरेंगे, बस मुस्कान रहेगी।”
ललिता ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अब मेरे आँसू भी खुशी के हैं बेटी, क्योंकि जहाँ प्यार की नींव होती है, वहाँ घर अपने आप खड़ा हो जाता है।”
बरामदे से हवा आई, पर्दे हिले, और ललिता को लगा जैसे कहीं से रमेश की आवाज़ आई —
“देखो ललिता, आखिरकार हमारा घर बन ही गया।”
वह मुस्कुरा उठी।
आज पहली बार उसके चेहरे पर वो सुकून था जो अधूरे सपनों के पूरे हो जाने के बाद आता है।
उसने नेहा, वरुण और अपने नन्हे पोते को गले लगाया और कहा —
“अब बस इतना अरमान है कि हम सब हमेशा इसी घर में हँसी-खुशी रहें।”
घर की दीवारों में जैसे वो वचन गूंज उठा —
“जहाँ प्रेम और परिवार हो, वहीं असली गृहप्रवेश होता है।”
लेखिक-डाॅ संजु झा.
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