सुबह की हल्की धूप परदे से छनकर अंदर आ रही थी।
लीना ने जल्दी-जल्दी अपने बाल बाँधे, आईने में खुद को देखा और मुस्कुरा दी — “बस यही ठीक है।”
सामने मेज पर रखा छोटा-सा टिफ़िन उठाया, बैग में रखा और दरवाजे की तरफ़ बढ़ी।
“दीदी, इतनी सुबह-सुबह फिर निकल गईं?” — नीचे वाली पड़ोसन ने आवाज़ दी।
“हाँ, ड्यूटी पर जाना है।”
“ड्यूटी?” — और फिर वही ताने, वही मुस्कुराहट जिसमें व्यंग्य की धार छिपी थी।
“किसी को कुछ बेचने नहीं जाती, खुद को बेचती है शायद!”
लीना ने सुन लिया, पर जैसे अनसुना कर दिया।
उसे पता था — जब तक वो समाज की सोच नहीं बदल सकती, उसे खुद को ही मज़बूत रखना होगा।
लीना एक बड़ी कंपनी में सेल्स गर्ल थी।
दिनभर ग्राहकों के सामने हँसना, बातें करना, प्रोडक्ट्स दिखाना — यही उसका काम था।
और इस काम के लिए उसे सलीकेदार, थोड़े मॉडर्न कपड़े पहनने पड़ते थे।
पर यही कपड़े लोगों की नज़रों में उसे “बदचलन” बना देते थे।
घर लौटते वक्त जब गली से गुजरती, तो कुछ लोग ताने कसते —
“देखो-देखो, शाम को भी बाहर घूमती है!”
“कपड़े तो ऐसे जैसे फिल्मों में काम करती हो।”
लीना बस सिर झुकाकर आगे बढ़ जाती।
घर में उसकी बूढ़ी माँ और छोटा भाई रोहन थे।
पिता का निधन तब हुआ था जब रोहन सिर्फ़ दस साल का था।
माँ को दिल की बीमारी थी, दवाओं का खर्चा, घर का किराया — सब लीना की नौकरी पर ही चलता था।
पर लोगों को इन बातों से क्या लेना?
उन्हें बस दिखावा चाहिए, सच्चाई से कोई मतलब नहीं।
उस दिन ऑफिस से लौटकर लीना ने माँ के पैर दबाए।
“माँ, आज बहुत बेचैनी सी है मन में। सब क्यों मुझे गलत समझते हैं?”
माँ ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा —
“बेटी, लोग तो भगवान को भी नहीं छोड़ते। तू तो इंसान है। जब तक तू जानती है कि तेरे इरादे साफ़ हैं, तब तक किसी की बात का असर मत लेना।”
लीना ने आँसू पोंछे और मुस्कुरा दी।
“तुम सही कहती हो माँ।”
पर किसे पता था कि अगली सुबह एक नया तूफान आने वाला है।
अगले दिन सुबह ही दरवाजे पर तेज़ आवाज़ें सुनाई दीं।
“लीना घर पर है? बुलाओ उसे!”
दरवाजा खुला — सामने खड़ी थी ताई सरोज, जो गाँव से आई थीं।
वो गुस्से से बोलीं —
“क्या हाल बना रखा है तूने लीना! पूरे मोहल्ले में तेरे कपड़े, तेरी चाल-ढाल की चर्चा है। लोग कहते हैं तू दिन-रात मर्दों के बीच रहती है। शर्म नहीं आती तुझे? हमारे खानदान की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।”
लीना चुप रही।
माँ कुछ कहतीं उससे पहले ताई फिर बोलीं —
“अगर मेरे बस में होता, तो तुझे घर से निकाल देती। हमारी औरतें घर में रहती हैं, पर तुझे तो सड़कों पर घूमना अच्छा लगता है। यही सिखाया था तेरी माँ ने?”
माँ ने आँसुओं के साथ कहा —
“सरोज, तू जो चाहे कह ले, लेकिन मेरी बेटी अपनी मेहनत से घर चला रही है।”
“मेहनत? इसे मेहनत कहते हैं तू? ये तो…!”
ताई का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि तभी बाहर से किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई —
“माँ! माँ!”
सब बाहर भागे।
देखा — ताई की बहू सीमा हाँफती हुई आ रही थी, उसके चेहरे पर घबराहट थी।
“क्या हुआ?” ताई ने घबराकर पूछा।
“माँ… माँ, सिम्मी… सिम्मी भाग गई! पड़ोस के धोबी राजू के साथ!”
“क्या?!”
ताई की ज़मीन जैसे खिसक गई।
“कल से नहीं दिखी थी, लगा किसी सहेली के घर गई होगी। आज राजू की दुकान बंद मिली, और किसी ने कहा दोनों को स्टेशन पर देखा है!”
सन्नाटा छा गया।
ताई का चेहरा उतर गया, आँखों में पानी भर आया।
लीना वहीं खड़ी थी — उसकी आँखों में दुःख नहीं, दृढ़ता थी।
वो धीरे से बोली —
“देखा ताई, आप मुझे बदचलन कहती थीं, पर असली चरित्र कपड़ों में नहीं, सोच में होता है। मैं रोज़ नौकरी पर जाती हूँ क्योंकि मेरे घर की रोटी उसी से बनती है। पर आपकी बेटी, जो घर में पर्दे में रहती थी, वो…”
ताई की आँखों से आँसू बह निकले।
“मुझे माफ़ कर दे लीना… मैंने तुझ पर गलत इल्ज़ाम लगाए। मुझे लगा नौकरी करने वाली औरतें रास्ता भटक जाती हैं, पर अब समझ में आया — रास्ता घर में बैठकर भी भटक जाता है।”
माँ ने ताई को बैठाया, पानी दिया।
लीना पास आई और कहा —
“ताई, वक्त बुरा नहीं होता, सोच बुरी हो जाती है। अगर औरत अपने पैरों पर खड़ी हो तो उसे बदचलन नहीं, बहादुर कहा जाना चाहिए। मैं वो काम करती हूँ जिससे मेरे घर की रोशनी जलती है, किसी का घर नहीं उजाड़ती।”
ताई ने सिर झुका लिया।
“सच कहती है तू बेटी। मैं अपनी अंधी सोच में फँस गई थी।”
उस रात जब सब सो गए, लीना बालकनी में खड़ी आसमान देख रही थी।
माँ पास आईं —
“आज तुझे देखकर गर्व हो रहा है। तूने सिर्फ़ अपनी नहीं, अपनी जैसी हर लड़की की इज़्ज़त बचाई है।”
लीना मुस्कुराई —
“माँ, मैं बस चाहती हूँ कि एक दिन समाज ये समझे कि औरत के कपड़े या नौकरी नहीं, उसका इरादा और मेहनत उसे परिभाषित करते हैं।”
“वो दिन ज़रूर आएगा बेटी,” माँ ने कहा।
“जब लोग दूसरों पर उंगली उठाने से पहले अपने घर की खिड़की में झाँकेंगे।”
कुछ दिन बाद मोहल्ले में वही ताई सरोज सबके सामने बोलीं —
“तुम सब कहते थे कि लीना बदचलन है, पर मैं कहती हूँ, अगर हर घर में ऐसी लड़की हो जाए जो अपने दम पर घर संभाले, तो कोई माँ अपने बेटे के कंधे पर बोझ न बने।”
लोग चुप रह गए।
लीना दूर खड़ी थी, आँखों में गर्व था।
आज उसने किसी को जवाब नहीं दिया, वक्त ने खुद उसकी तरफ़ से जवाब दे दिया था।
वो दिन लीना की ज़िंदगी का मोड़ बन गया।
अब जब वो गली से गुजरती, वही लोग जो पहले ताने कसते थे, नमस्ते करते।
“लीना जी, आज तो बहुत अच्छा ऑफ़र होगा, न?”
“अरे भई, अब तो हमारी मोहल्ले की स्टार बन गई है!”
लीना मुस्कुरा देती, बिना किसी ग़ुस्से के।
क्योंकि अब उसे समझ आ गया था — सम्मान किसी से माँगा नहीं जाता, मेहनत से कमाया जाता है।
उसने माँ का हाथ थामा और कहा —
“देखो माँ, अब लोग मुझे ‘बदचलन’ नहीं कहते, ‘बहादुर’ कहते हैं।”
माँ की आँखों से आँसू निकल आए,
“क्योंकि तूने उन्हें सिखा दिया कि इज़्ज़त किसी की सोच से नहीं, अपने कर्मों से बनती है।”
और लीना ने आसमान की तरफ़ देखा —
जहाँ उसे अपनी मंज़िल की तरह साफ़ और ऊँचा भविष्य दिखाई दे रहा था।
क्योंकि अब वो जान चुकी थी —
लोग क्या कहते हैं, उससे फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि तू अपने बारे में क्या सोचती है।
0 टिप्पणियाँ