देख,आशी तुझे इस शादी में आना ही होगा।मेरे यहाँ यह आखिरी शादी है।बिट्टू तुझे लेने आयेगा, भाईसाहब और सौरभ के साथ जरूर आइयो।
जीजी,कोशिश पूरी करूँगी,मेरी भी तुम सबसे मिलने की इच्छा है,पर वो क्या जीजी इनकी तबियत कुछ खराब रहती है ना,इसलिये यह उन पर ही निर्भर करेगा।
फैक्टरी में भारी नुकसान के कारण रमेश आर्थिक संकट से गुजर रहा था।कर्ज देने वाले और बैंक उसके पीछे पड़े थे।बैंक ने तो उसकी फैक्टरी ही सीज कर ली थी।कोई आय का स्रोत न होने के कारण रमेश ने सब रिश्तेदारी और मित्रो के समारोहों में जाना बंद कर दिया था।उसकी पत्नी आशी और बेटा सौरभ भी इस आर्थिक संकट से अछूते नही रह गये थे।आशी फिर भी किफायत से घर संभाले थी,पर 11 वर्षिय सौरभ क्या करे?उसको एक सस्ते स्कूल में दाखिला कराना पड़ा।वो तो कुछ पैसा आशी ने अपने अच्छे समय मे जोड़ लिया था,फिलहाल वही काम आ रहा था।लेकिन कब तक ऐसा चल सकता था,सो रमेश ने अपना एक प्लाट तथा आशी के आभूषणों को बेचकर दुकान करने का मन बनाया।झिझक थी,पर कुछ तो अपनी सामर्थ्य को देख, करना ही था।रमेश उसी योजना में लगा था,कर्ज देने वालो को वह भविष्य में अदायगी के आधार पर उनसे तकादा न करने को मना रहा था।
इसी बीच आशी की सबसे बड़ी बहन सुषमा ने फोन पर आशी से अपनी बेटी पिंकी की शादी में आने का आग्रह किया।ऐसा भी नही था कि सुषमा को उनकी स्थिति का पता नही था,पर बहन इस बहाने सबसे मिल लेगी,यह सोच वह आशी से शादी में शामिल होने का प्रबल आग्रह कर रही थी।साथ ही अपने बेटे बिट्टू को खुद लेने भी भेज रही थी।रमेश हीनभावना के कारण जाना नही चाहता था,पर उसने देखा कि आशी का मन जाने का है तो वह मना नही कर सका।बिट्टू के साथ रमेश,आशी और सौरभ शादी से एक दिन पूर्व चले ही गये।
सुषमा जीजी ने बहुत धूमधाम से पिंकी की शादी की।सब रिश्तेदार शादी में शामिल हुए थे।आशी सबसे मिलकर खुश थी,पर एक बात उसके दिल पर बार बार चोट कर रही थी,सब आशी से या रमेश से मिलते और उनके आर्थिक हालात पर चिंता भी जाहिर करते,इससे वे दोनो ही असहज हो जाते।किसी प्रकार शादी के कार्यक्रम निपट गये पिंकी की विदाई हो गयी।रमेश और आशी वापस चलने की तैयारी करने लगे।तभी सुषमा जीजी के घर के अंदर कुछ कोलाहल सा हुआ।ज्ञात हुआ कि सुषमा के गले का हार गायब हो गया है, जिसकी कीमत लगभग एक लाख रुपये थी।सब अपनी अपनी सलाह दे रहे थे,कोई पुलिस में रिपोर्ट करने को कह रहा था।सुषमा कह रही थी,नही पुलिस को तो नही बुलाएंगे,सब रिश्तेदार ही तो हैं।आशी का चेहरा फक पड़ा हुआ था,हमे जल्दी निकलना था,ऐसे में क्या करे?रमेश आशी की दुविधा समझ रहा था क्योकि वह भी उसी सोच से ग्रसित था।वे इस समय आर्थिक संकट में थे तो सबका शक उन पर हो सकता है।आशी लगभग रोने को थी,क्या चोरी का कलंक लेकर जायेंगे?रमेश ने आशी को ढाढस बंधाया और फुसफुसा कर कहा क्यो परेशान होती हो,साँच को क्या कभी आंच आ सकती है?
रमेश ने आगे बढ़कर सब रिश्तेदारों के बीच मे कहा कि हमे जल्द ही जाना है,पर ये चोरी हो गयी है।दो ही कारण मेरी समझ में आते हैं, एक तो यह कि हार जीजी कही रखकर भूल गयी है दूसरा यह कि हम सब रिश्तेदारो में से ही किसी ने चोरी की है।चूंकि हमे तुरंत जाना है तो मैं सबके सामने अपनी, आशी और सौरभ तथा सामान की तलाशी देकर जाना चाहूंगा।सब मना करते रहे पर रमेश ने सबके सामने अपना सामान भी खोल दिया और अपनी जेबें भी उलट दी।इतना करने के बाद रमेश,आशी और सौरभ के साथ वहां से चला आया।रमेश सोच रहा था कि बुरे दिनों में ऐसे भी तोहमत लग सकती है, यहां उसकी बुद्धि काम कर गयी,अन्यथा चोरी का शक निश्चित रूप से उन पर ही जाता।
रमेश ने गांठ बांध ली कि अपनी स्थिति के सुधरने से पूर्व वह इस प्रकार के समारोह में नही जायेगा।बाद में पता चला कि पिंकी की शादी के चार दिन बाद वह खोया हार सुषमा जीजी के घर मे ही मिल गया।यह समाचार सुन रमेश और आशी ने राहत की सांस ली।आज उनके मन का बोझ उतर गया था।
बालेश्वर गुप्ता, नोयडा
सच्ची घटना पर आधारित
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