हाँ दीदी..., मेरा निर्णय अटल है। अम्मा अब कहीं नहीं जायेगी। पिछले दो साल से वो कभी बड़े भईया तो कभी मंझले भाई के पास एक मेहमान की तरह रहती आ रहीं हैं। उन्हें छोड़ने को मेरा जी कभी नहीं किया लेकिन वो पुत्र-मोह नहीं त्याग पा रहीं थीं। इस बार मैंने उनके चेहरे की झुर्रियों में पति के गुजरने की पीड़ा देखी है। घर रहते हुए बेघर की तरह इधर-उधर...। बाबा नहीं हैं तो क्या हुआ, मैं तो हूँ।" नितिन ने फ़ोन पर अपनी जेठसाली को कहा।
" पर नितिन एक बार पायल से तो पूछ लो..।" उधर से आवाज आई।
" दीदी.., आपको अपनी बहन पर विश्वास न होगा पर मुझे अपनी पायल पर पूरा यकीन है। कल ही तो वह चिंटू को संयुक्त परिवार पर दो वाक्य लिखवा रही थी। जैसे चिंटू उसका भविष्य है, वैसे ही मैं भी तो अम्मा का भविष्य हूँ और दीदी...." बाहर खड़ी पायल नितिन से कुछ कहने आई थी लेकिन अब उसने भी निर्णय किया कि अब अम्मा जी यहीं रहेंगी, अपने नितिन और चिंटू के पास।
- विभा गुप्ता स्वरचित
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