पूर्णता

 "अरे दीदी आपके बराबर वाले फ्लैट में सुधा मेमसाब आई है ना, वो बहुत अच्छी है"., अधेड़ उम्र की अपनी गृह सहायिका रज्जो की बात सुनकर कोमल व्यंग से मुस्कुरा कर बोली, क्यूं वो क्या तुझे, मुझ से ज्यादा पगार देती है...

नहीं दीदी बात #कम ज्यादा पगार की नहीं बल्कि एक स्त्री के मन की बात समझ उसे आत्मसम्मान दिलाने के लिए किए हुए प्रयास की है... अनपढ़ होने का दंश मुझे अक्सर इस उम्र में आकर भी सालता रहता था, कई बार आपसे भी इस बात का जिक्र किया, ऐसे ही एक दिन बातो ही बातों में मेरे मन की ये इच्छा जानकर, सुधा मेमसाब पिछले एक महीने से मुझे रोज दो घंटे पढ़ाती है.... आत्मसंतुष्टि से सरोबार रज्जो के चेहरे की चमक अब बढ़ गई थी। मौलिक रचना कविता भडाना -

 


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