शहर के बाहरी हिस्से में एक वृद्धाश्रम था। यह स्थान शांत और सधे वातावरण वाला था, लेकिन जो भी इसके अंदर आता, उसे अक्सर एक अजीब सी उदासी महसूस होती। वृद्धाश्रम के पीछे का रास्ता रोज़-रोज़ एक कार की आवाज़ से गूंज उठता। कार आकर वृद्धाश्रम के मुख्य द्वार के पास रुकती और उसमें से एक युवक उतरता। वह युवक, रोहित, हमेशा एक ही समय पर आता और सीधे वृद्धाश्रम की सबसे बुज़ुर्ग महिला, लक्ष्मी दीदी, के पास बैठ जाता।
लक्ष्मी दीदी का चेहरा समय के साथ झुर्रियों और उम्र के धब्बों से भर गया था, लेकिन उनकी आँखों में हमेशा वही गर्माहट और प्रेम की चमक थी, जिसे देखकर कोई भी उनके बेटे का गर्व महसूस कर सकता था। रोहित के साथ उनका मिलन केवल मिलन नहीं, बल्कि भावनाओं और अनकही माफी का संवाद बन चुका था।
आज भी सुबह-सुबह रोहित अपनी कार लेकर वृद्धाश्रम पहुंचा। वह लक्ष्मी दीदी के पास बैठा और उनके हाथ पकड़कर बार-बार माफी मांगने लगा। उनका यह दृश्य वृद्धाश्रम के गेट कीपर, रामसिंह, की नजरों से छुपा नहीं था। रामसिंह एक बुज़ुर्ग थे और अक्सर वृद्धाश्रम के अन्दर बाहर की गतिविधियों पर ध्यान देते थे। उन्होंने पास खड़े अन्य बुजुर्ग से कहा—
"भाई, कहते हैं औलाद की नीयत बदल जाती है, पर यहाँ तो देखने में कुछ और ही नज़ारा है।"
बुज़ुर्ग हँसते हुए बोले—
"रामसिंह जी, कभी-कभी आँखों से दिखने वाली बातें भी पूरी सच्चाई नहीं बतातीं। कोई कहानी तो जरूर है जो इन्हें रोज़ यहाँ लाती है।"
रोहित ने जब माफ़ी माँगी और चल दिया, तो रामसिंह ने वृद्धाश्रम के भीतर जाकर लक्ष्मी दीदी से हाल-चाल पूछा। उन्होंने धीरे से पूछा—
"दीदी, यह जो लड़का रोज़ आता है, वह आपका बेटा ही है न?"
लक्ष्मी दीदी थोड़ी देर चुप रहीं और फिर हाँ में सिर हिलाया। रामसिंह आगे बढ़कर बोले—
"बड़ा भला है आपका बेटा। लगता है आपसे मिलने की उसकी बड़ी इच्छा है। क्या वह आपको यहाँ से ले जाना चाहता है?"
लक्ष्मी दीदी ने फिर से सिर हिलाकर हाँ कहा। तभी वृद्धाश्रम के अन्य लोग भी इकट्ठा होने लगे। उनकी बातें और नजरें इस दृश्य पर टिक गईं।
एक बुज़ुर्ग ने अनुभवजन्य स्वर में कहा—
"कहते हैं कि औरत वसुधा की तरह धैर्यवान होती है, लेकिन आपकी आंखों में जो दर्द है, वह कुछ और ही कहानी कह रहा है।"
एक अन्य बुज़ुर्ग ने जोड़ते हुए कहा—
"अब जमाना बदल गया है। अब सहनशीलता बीते दिनों की बात हो गई है। आज के पुरुष और महिलाएँ समान अधिकार चाहते हैं। किसी को माता-पिता की देखभाल का हक़ चाहिए, किसी को बच्चों से प्यार और सम्मान की आज़ादी।"
लक्ष्मी दीदी सब सुन रही थीं, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। उनकी आँखों में आँसुओं की नमी थी, लेकिन उनका मन शांत था।
अगले दिन वही कार फिर से वृद्धाश्रम के द्वार पर खड़ी हुई। इस बार रोहित के साथ एक महिला, नेहा, आई थी, जिसके गोद में एक छोटा बच्चा था। दोनों ने हाथ जोड़कर वृद्धाश्रम के सामने खड़े होकर विनती की—
"माँजी, हम दोनों को माफ़ कर दीजिए और हमारे साथ अपने घर चलिए। यह हमारा बच्चा है। आपको अपने पोते की कसम!"
रामसिंह को यह दृश्य देखकर अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रहा। उसने रोहित और नेहा से कहा—
"बेटा, अगर आपकी माँ नहीं जाना चाहती तो फिर क्यों जबरदस्ती उसे ले जाना चाहते हो? भगवान ऐसे बेटे सबको दें। आजकल के बच्चे जान-बूझकर माँ-बाप को इस तरह के संस्थानों में छोड़ देते हैं।"
यह सुनकर लक्ष्मी दीदी का धैर्य टूट गया। उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने अपने आंचल से आँसू पोंछते हुए कहा—
"आप शायद नहीं जानते, रामसिंह जी। जब मेरे पति इस दुनिया से चले गए, तो मेरा सारा जमा-पूंजी इनलोगों ने ले लिया। रोज़ एक रोटी के लिए मुझे घंटों इंतजार करना पड़ता था। मुझे अपमानित किया गया, नसीहत दी गई, रात-दिन दुःख भरे आँसू बहाए गए। अंत में मुझे घर छोड़ने के लिए कहा गया। अब बताइए, मैं कहां जाऊँ? आज भी कोई माफी मांगने नहीं आया। ये लोग बस मुझे डराने और मेरे सामने यह नाटक करने आए हैं। ताकि मैं बच्चे को संभालने के लिए अपने पास रखूँ।"
लक्ष्मी दीदी की बातें सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग स्तब्ध रह गए। कोई कुछ नहीं कह सका। सबके मन में एक तरह का अपराधबोध और सहानुभूति का भाव जाग उठा।
रोहित ने धीमे स्वर में कहा—
"माँ, अब हम सब आपके साथ हैं। अब कोई भी आपको अपमान नहीं करेगा। हम आपको अपने घर ले जाएंगे। और इस बार यह निश्चित है कि कोई भी आपको परेशानी नहीं देगा।"
नेहा ने रोहित का हाथ पकड़ा और कहा—
"माँजी, आज से आपका घर वही है, जहाँ आपका बेटा और पोता हैं। आपको किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होगी।"
इस घटना के बाद वृद्धाश्रम में एक नई उम्मीद की हवा चली। वहाँ के अन्य बुजुर्गों ने भी समझा कि कभी-कभी चीज़ें दिखने जैसा नहीं होतीं। किसी की सहनशीलता और धैर्य की कहानी अंदर ही अंदर कई संघर्ष और पीड़ा छुपा सकती है।
कुछ दिन बाद, लक्ष्मी दीदी अपने बेटे रोहित, बहू नेहा और पोते अर्जुन के साथ वृद्धाश्रम से बाहर निकलीं। उनका चेहरा पहले से अधिक चमक रहा था। वृद्धाश्रम के गेट पर खड़े रामसिंह ने उन्हें देखकर कहा—
"दीदी, आज आपकी आँखों में जो चमक है, वह किसी खुशी से कम नहीं।"
लक्ष्मी दीदी ने हल्की मुस्कान देते हुए कहा—
"रामसिंह जी, आपकी आँखों ने सही देखा। आज मुझे यह अहसास हुआ कि जीवन में हर दर्द और हर अपमान के बाद भी, सच्चे प्यार और सम्मान की उम्मीद हमेशा बनी रहती है।"
रोहित ने अपने हाथ में माँ का हाथ पकड़ते हुए कहा—
"माँ, अब हम सब साथ हैं। आपने जो सहा, वह किसी ने नहीं जाना। लेकिन अब आपके आंसू सिर्फ खुशी के होंगे।"
वृद्धाश्रम के गेट पर खड़े अन्य बुजुर्ग भी यह दृश्य देख रहे थे। उनके मन में यह सवाल उठ रहा था— क्या यही नहीं असली जीवन की परीक्षा है? जीवन में कठिनाइयाँ आएंगी, अपमान और पीड़ा आएगी, लेकिन जब औलाद सच्ची होगी, सम्मान और प्यार में विश्वास रखेगी, तभी जीवन में सच्ची राहत मिलती है।
लक्ष्मी दीदी और उनका परिवार कार में बैठकर घर की ओर बढ़ा। कार धीरे-धीरे सड़कों पर चली, लेकिन दिलों में एक नई उमंग और आशा का सैलाब बह रहा था। उन्होंने पीछे मुड़कर वृद्धाश्रम की ओर देखा। वह जगह अब उनके लिए सिर्फ़ पुरानी यादों का स्थान नहीं थी, बल्कि उस संघर्ष और धैर्य की गवाही बन गई थी, जिसने उन्हें सिखाया कि सम्मान और प्यार किसी संस्थान या नियम से नहीं, बल्कि दिल से मिलता है।
रोहित ने माँ से कहा—
"माँ, अब आप अपने पोते अर्जुन के साथ समय बिताइए। हम आपको कभी अकेला नहीं छोड़ेंगे।"
लक्ष्मी दीदी ने आँखें नम करते हुए कहा—
"बेटा, यही असली सुख है। कभी पैसे, संपत्ति या सामाजिक स्थिति से नहीं मिलता। सच्चा सुख तो अपने परिवार के प्यार और सम्मान में ही होता है।"
नेहा ने भी पोते को अपनी गोद में लिया और कहा—
"अर्जुन, देखो, दादी अब हमेशा हमारे साथ हैं। अब हम सब साथ में खुश रहेंगे।"
यात्रा के दौरान कार में खामोशी थी, लेकिन वह खामोशी सुकून की थी। आंसू अब सिर्फ़ खुशी के थे। और वृद्धाश्रम के गेट पर खड़े रामसिंह और अन्य बुज़ुर्गों ने एक-दूसरे की ओर देखा और कहा—
"देखा, यही तो जीवन की सच्ची परीक्षा है। दर्द, अपमान और पीड़ा आएगी, लेकिन जब परिवार का प्यार सच्चा हो, तो हर दुख दूर हो जाता है।"
लक्ष्मी दीदी की कहानी सिर्फ़ एक माँ की नहीं थी, बल्कि हर उस इंसान की थी जिसे जीवन ने कठिनाइयों के बीच छोड़ दिया, लेकिन जिसने अपने धैर्य और साहस से सम्मान और प्यार की राह खोजी।
और इस तरह, वृद्धाश्रम के पुराने दरवाजे के पास रोज़ आने वाली कार अब नहीं आई, क्योंकि लक्ष्मी दीदी को अब उनके घर, उनके परिवार के साथ मिल चुका था।
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