नेग

 “अरे निधि, आज तो बड़ी देर कर दी,” सीमा आंटी ने अपनी बेटी प्रियंका को देखकर मुस्कुराते हुए कहा।

“हां मां, ननद रीना भी आज राखी बांधने आई थी, इसलिए निकलने में देर हो गई। भैया-भाभी कहां हैं? और दीदी आ गई क्या राखी बांधने?” प्रियंका ने पूछते हुए कहा।

“दीदी तो सुबह ही राखी बांधकर चली गई। भाभी अपनी मायके गई हैं, संजय भी उनके साथ गए हैं। थोड़ी देर में भैया भी आ जाएंगे। तब तक तुम रोहित के पास चली जाओ, वह भी तुम्हारे आने का इंतजार कर रहा होगा।”

“चल जाऊंगी, पर अगर अभी गई तो रोहित जल्दी आने नहीं देगा। और छोटी भाभी तो खाने के लिए जोर देंगी,” प्रियंका ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

“अरे क्या हुआ, वही तो भाई-बहन हैं। यहां खाया, वहां खाया—एक ही बात है।” सीमा आंटी ने समझाते हुए कहा।

“ठीक है, मैं एक काम करती हूं। आप ये सामान यहीं रख दो। यह बड़े भैया-भाभी के लिए है, मैं जाकर दे आती हूं,” प्रियंका ने कहा और उठ गई।

“क्या लाई हो इसमें?” सीमा आंटी ने पूछा।

“मां, भैया के लिए कुर्ता और भाभी के लिए एक सूट है। भैया-भाभी इतने गिफ्ट देते हैं, तो मेरी तरफ से भी तो कुछ बनता है न,” प्रियंका ने खुशी से कहा और अपने छोटे भाई-भाभी के घर की ओर बढ़ गई, जो गली में ही थोड़ी दूर था।

“प्रियंका, रोहित और तुम्हारी छोटी भाभी के लिए कोई गिफ्ट नहीं लाई?” सीमा आंटी ने देखा कि प्रियंका के हाथ में केवल राखी और मिठाई का डिब्बा था।

“अरे नहीं मां, उनके लिए तो मैं ज्यादा खर्च नहीं कर सकती। जो जितना करेगा, उसी हिसाब से मैं भी कर दूंगी,” प्रियंका ने कहा।

“बेटा, भाई-बहन के रिश्ते में हिसाब-किताब नहीं देखा जाता। बहन के लिए तो सभी भाई बराबर होते हैं।”

सीमा आंटी को बेटी की सोच थोड़ी कचोट रही थी, पर प्रियंका हमेशा ही अपनी सोच पर अड़ी रहती थी।

छोटी बहन के प्रति प्रियंका का व्यवहार उन्हें अंदर तक खलता था। रोहित की आर्थिक स्थिति भी अभी अच्छी नहीं थी, क्योंकि जिस कंपनी में वह काम करता था, वह बंद हो गई थी। वह नई नौकरी की तलाश में था और अस्थायी काम कर रहा था। वहीं, संजय का कारोबार अच्छा चल रहा था।

निर्मला आंटी ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा और प्रियंका रोहित के घर चली गई। रोहित और उनकी पत्नी प्रियंका को देखकर खुश हुए। बड़े प्रेम और लगाव से उन्होंने प्रियंका की राखी बांधी। जब रोहित ने नेग में 1200 रुपये दिए, तो प्रियंका ने मुंह बनाते हुए पैसे पकड़ लिए और जल्दी ही वहां से निकल गई। छोटी भाभी खाने के लिए आग्रह करती रही।

शाम को जब बड़े भाई-भाभी लौटे, तो प्रियंका ने उन्हें खुशी-खुशी राखी बांधी और अपनी तरफ से गिफ्ट भी दिया। संजय ने हमेशा की तरह ढेर सारा सगुन दिया, जिसे देखकर प्रियंका का चेहरा खिल उठा।

घर लौटते हुए सीमा आंटी ने सिर्फ आशीर्वाद दिया, जिससे प्रियंका थोड़ी चौंकी, क्योंकि हर बार मां साड़ी और कुछ न कुछ सगुन देती थीं।

अगले दिन प्रियंका ने मां को फोन किया, “मां, आप दोनों बहनों के शगुन में भेदभाव क्यों करती हैं? दीदी कह रही थी कि आपने उन्हें इतनी सुंदर साड़ी और कंगन दिए, लेकिन मुझे कुछ नहीं दिया। पता है, मुझे कितना बुरा लग रहा है,” प्रियंका ने रूठते हुए कहा।

“बेटा, मैंने केवल एक बार अंतर किया, और तुम इतना बुरा मान रही हो। और जो तुम हर बार भाई-भाभियों के बीच भेदभाव करती हो, क्या उन्हें बुरा नहीं लगता? बेटा, मेरे लिए सभी बच्चे बराबर हैं। लेकिन अगर तुम रिश्तों को लेन-देन की नजर से तोड़ोगी, तो सोचो मुझे कितना दुख होगा। किस्मत पलटने में देर नहीं लगती, लेकिन ये छोटी-छोटी बातें मन में हमेशा रहती हैं।”

मां की बात सुनकर प्रियंका की आंखें नम हो गईं। उसे अपने बचपन की याद आ गई जब भाई अपना गुल्लक फोड़कर राखी पर गिफ्ट लाते थे। दोनों बहनें भी अपने हिस्से की मिठाई-चॉकलेट भाइयों को देती थीं। उस दिन का इंतजार सालभर रहता था—पैसों का कोई मोल नहीं होता था रिश्तों में।

प्रियंका ने भर्राई आवाज़ में कहा, “आप ठीक कह रही हैं मां। अब मैं कभी ऐसा नहीं करूंगी।”

सीमा आंटी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। उन्हें संतोष हुआ कि उनकी बेटी अब भाई-बहन के बीच भेदभाव नहीं करेगी।


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