सावली छाँव

 गर्मी की दोपहर थी। सूरज अपनी तेज़ किरणों से जैसे सारे गाँव को तपता जा रहा था। राधिका अपनी छोटी बहन आर्या के साथ आँगन में बैठी थी। दोनों हाथ में पानी की बाल्टी लेकर बगीचे की मिट्टी को सींच रही थीं। बचपन से ही राधिका को बागबानी का शौक था, पर आज उसका मन कुछ और ही परेशान था।

“दीदी, आज अम्बा की शाख से कितने पत्ते झड़ गए हैं!” आर्या ने जलकर कहा।
राधिका ने हँसते हुए कहा, “अरे बचपन की चिंता मत कर। ये पेड़ सालों से हमारे घर की छाँव रहा है, पत्ते फिर उग आएँगे। पर ध्यान रखो, मिट्टी सुखी है, पानी देना पड़ेगा।”

राधिका के घर में बहुत सारी जिम्मेदारियाँ थीं। माँ का देहांत कई साल पहले हो चुका था, और पिता सुबह से खेतों में चले जाते। बड़ी बहन राधिका, अकेली ही घर की देखभाल करती थी। खाना बनाना, बच्चों की पढ़ाई, बगीचे की देखभाल, सब कुछ उसी के जिम्मे था। पर राधिका में अद्भुत संतुलन था। उसके चेहरे की मुस्कान और शब्दों की मिठास हर मुश्किल को आसान बना देती थी।

आज का दिन थोड़ा अलग था। शहर से उनकी चचेरी बहन, निधि, अचानक आने वाली थी। निधि शहर की बड़ी कंपनी में नौकरी करती थी और आमतौर पर गाँव आती ही नहीं। राधिका ने सोचा कि घर की सफाई, खाना, बगीचे की तैयारी—सब कुछ समय पर निपटा लेना चाहिए।

वह रसोई में चली गई। आटे की लोई गूँध रही थी, पर मन कहीं और था। अचानक उसने देखा, आर्या उसके पास आई और बोली, “दीदी, बाहर कोई आया है?”
राधिका झट से दरवाजे की ओर गई। आँगन के गेट पर निधि खड़ी थी। उसकी आँखों में शहर की चमक थी, पर चेहरे पर हलकी चिंता साफ दिख रही थी।

“निधि! तुम यहाँ! अचानक?” राधिका ने खुश होकर गले लगा लिया।
“हाँ दीदी, अचानक छुट्टी मिली, सोचा तुमसे मिल ही लूँ। घर याद आ गया,” निधि ने मुस्कुराते हुए कहा।

खुशी के साथ-साथ राधिका के मन में हल्की बेचैनी भी थी। निधि का आगमन घर के कामकाज में व्यवधान डाल सकता था। उसे आर्या की पढ़ाई, रसोई के काम, बगीचे की देखभाल—सब कुछ एक ही समय में निबटाना था। पर जैसे ही निधि ने कदम घर में रखा, राधिका ने महसूस किया कि आज कुछ अलग होने वाला है।

“दीदी, मुझे बताओ, तुम ठीक हो ना? आर्या कैसी है?” निधि ने चिंता जताई।
“सब ठीक हैं। बस थोड़ा व्यस्त हूँ। तुम्हारे आने से खुशी हुई,” राधिका ने हाथ बढ़ाते हुए कहा।

निधि को आते ही घर में हलचल बढ़ गई। पहले तो राधिका ने उसे बैठाया और चाय बनाकर दी। आर्या ने अपने छोटे हाथों से मिठाई परोसने की कोशिश की, और निधि हँसते हुए उसकी चोटी थपथपा रही थी।

धीरे-धीरे दिन ढलने लगा। राधिका ने सोचा कि क्यों ना आज बगीचे में सभी मिलकर काम करें। निधि ने तुरंत हामी भर दी। तीनों ने मिलकर मिट्टी को खुरचा, फूलों की पत्तियों को काटा, और पुराने सूखे पौधों को हटाया। राधिका ने देखा कि निधि भी बचपन की तरह मेहनत कर रही है, पर उसके हाथों में अनुभव और सोच थी।

“दीदी, मुझे लगता है, हमें इस बगीचे में रोज़ थोड़ी देर बैठना चाहिए। बच्चों के लिए भी अच्छा रहेगा। यहाँ की हवा, यहाँ की मिट्टी—सिर्फ खेती नहीं, यह जीवन की सीख देती है,” निधि ने कहा।

राधिका ने सिर हिलाया। उसे भी यही लगता था। पर रोज़मर्रा की जिम्मेदारियों में वह इसे भूल जाती थी।

संध्या, राधिका की पड़ोसी, अचानक आ गई। “अरे राधिका! निधि आई है? तो जल्दी से सबको बुलाओ, चाय-पानी कर लो। बच्चों को भी खाना खिला दो।”

घर में हलचल बढ़ गई। राधिका ने देखा कि निधि बच्चों के साथ हँस-खेल रही थी, बगीचे के काम में हाथ बँटा रही थी। राधिका का मन हल्का होने लगा। उसने महसूस किया कि जब जिम्मेदारी बाँटी जाए, तो बोझ कम और खुशी बढ़ती है।

पर शाम को कुछ ऐसा हुआ जिसने राधिका का मन एकदम थाम लिया। आर्या अचानक गिर पड़ी। उसका पैर चोटिल हो गया था। राधिका दौड़ी, निधि भी पीछे-पीछे। घर में हड़कंप मच गया।

“आर्या, क्या हुआ?” राधिका ने रोते हुए पूछा।
“पैर…” आर्या दर्द में चिल्लाई।

निधि ने तुरंत कहा, “दीदी, मुझे तुम पर भरोसा है। मैं मदद करूँगी। उसे शांत करो, मैं बैंडेज लगाती हूँ।”

राधिका ने देखा कि निधि ने पहले ही प्राथमिक चिकित्सा का अभ्यास किया था। उसने आर्या का पैर सावधानी से बाँधा, दर्द कम किया और उसे आराम दिया। राधिका की आँखों में आंसू थे, पर दिल हल्का हुआ।

“धन्यवाद निधि, तुम्हारे बिना मैं क्या करती?” राधिका ने कहा।

रात को सभी बैठे और रसोई में हल्की बातचीत होने लगी। निधि ने कहा, “दीदी, तुम्हें पता है, घर का सारा काम तुम्हारे कंधों पर है। पर मैं देखकर खुश हूँ कि तुम सब संभाल लेती हो। पर कभी-कभी दूसरों से मदद लेना भी जरूरी है।”

राधिका ने सिर हिलाया। यह बात उसने महसूस की थी, पर कभी इस तरह खुलकर किसी को कह नहीं पाई थी।

अगले दिन राधिका ने बच्चों की पढ़ाई, घर का काम और बगीचे की जिम्मेदारी निधि के साथ बाँट दी। उसने देखा कि दिन कितना आसान और शांत हो गया। बच्चों के चेहरे पर हँसी, घर की साफ-सफाई, और बगीचे की खुशबू—सब कुछ जीवन को सुंदर बना रही थी।

इस अनुभव ने राधिका को समझाया कि जीवन में अकेले हर काम करने की जरूरत नहीं। दूसरों से मदद लेना, जिम्मेदारियाँ बाँटना, और साथ में काम करना—यही परिवार और जीवन की असली सीख है।

कुछ हफ्तों बाद, निधि लौट गई। पर राधिका ने अब अपने घर और जिम्मेदारियों को अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया। उसने निर्णय लिया कि अब वह हर काम अकेले नहीं करेगी। आर्या और बच्चों की छोटी-छोटी जिम्मेदारियाँ भी बाँटी जाएँगी। पड़ोसी, रिश्तेदार, और मित्र भी मदद के लिए शामिल होंगे।

राधिका ने अपने मन में महसूस किया कि जीवन में सबसे बड़ी ताकत सिर्फ मेहनत नहीं, बल्कि सहयोग और समझदारी है। बगीचे की सावली छाँव की तरह, परिवार में भी हर व्यक्ति का योगदान जरूरी है। जब सब मिलकर काम करते हैं, तो बोझ हल्का और खुशियाँ बढ़ती हैं।

राधिका ने देखा कि अब उसका जीवन सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ नहीं, बल्कि हर दिन की छोटी-छोटी खुशियों से भरपूर हो गया। उसने बच्चों के साथ खेला, बगीचे में काम किया, रसोई में नई रेसिपीज़ ट्राय की, और साथ ही अपने परिवार के हर सदस्य की मदद करना शुरू किया।

और इसी तरह, गाँव की दोपहरें अब राधिका के लिए सिर्फ मेहनत की नहीं, बल्कि परिवार की, सहयोग की और जीवन की वास्तविक खुशियों की याद दिलाने वाली बन गईं।


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