बेटा अर्जुन, मैं कल रेखा जी से मंदिर में शादी कर रहा हूँ। तुम और बहू आओगे तो मुझे अच्छा लगेगा, बाकी तुम्हारी इच्छा है।"
भूपेंद्र जी ने बेटे के कमरे के दरवाजे से कहा।
"जी पापा।"
अर्जुन ने केवल इतना कहा।
अंदर से बहू प्रिया ने झुँझलाते हुए कहा — "दिमाग खराब हो गया है इनका। यह कौन सी उम्र है शादी करने की? लोग क्या कहेंगे! अपने साथ-साथ हमारी भी नाक कटवाएँगे।"
भूपेंद्र जी मुस्कुराए और बोले, "फिक्र मत करो बहू। जब तुम ससुर को नौकर समझती थी, तब कोई कुछ नहीं बोला। जब तुम घर का हिसाब-किताब गिनती थी, तब भी कोई नहीं बोला। अब लोग क्या कहेंगे?"
वे वहाँ से चले गए।
कुछ समय पहले की बात है। भूपेंद्र जी, जिनका इकलौता बेटा अर्जुन है, का परिवार पहले खुशहाल था। उनकी पत्नी शारदा, जो अर्जुन की माँ थीं, कुछ साल पहले ही दुर्घटना में निधन हो गई थीं। भूपेंद्र जी ने अर्जुन को पिता और माँ दोनों का स्नेह दिया, पढ़ाया-लिखाया, और उसका भविष्य संवारने के लिए हर संभव प्रयास किया।
अर्जुन की शादी के बाद भूपेंद्र जी रिटायर हो गए। उन्होंने सोचा कि अब बचे हुए दिन वे अपने दोस्तों के साथ बिताएँगे, पोते-पोती को प्यार देंगे और जीवन का आनंद लेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
प्रिया को भूपेंद्र जी के मित्रों का घर आना पसंद नहीं था। भले ही घर भूपेंद्र जी का था और पेंशन भी ठीक-ठाक आती थी, प्रिया को यह सब बोझ लगता था। अर्जुन शांति बनाए रखने के लिए चुप रहता।
एक दिन, भूपेंद्र जी ने अपने पुराने मित्र की पत्नी रेखा जी को पार्क में देखा। उनके अकेलेपन और जीवन की कठिनाइयों ने भूपेंद्र जी को बहुत सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि इस उम्र में किसी के साथ जीवन का साझा होना कितना ज़रूरी है।
भूपेंद्र जी ने रेखा जी से विवाह का प्रस्ताव रखा। रेखा जी ने शुरू में सोचने में समय लिया, लेकिन आखिरकार उन्होंने स्वीकार कर लिया। दोनों ने महसूस किया कि जीवन के इस पड़ाव में एक दूसरे का साथ ही सबसे बड़ी खुशी और सुरक्षा है।
अगले दिन भूपेंद्र जी ने अर्जुन और प्रिया से कहा, "प्रिया, तैयार हो जाओ, हमें मंदिर जाना है।"
अर्जुन ने कंधे उचकाते हुए कहा, "मुझे यह सब नहीं देखना, और तुम्हें भी कोई जरूरत नहीं है।"
प्रिया ने गंभीर स्वर में कहा, "दुनिया और तुम्हारे ख्याल में ही अब तक चुप रही। अब हम यह दिखा देंगे कि सम्मान और फर्ज़ क्या होता है। हमारा सामान पैक कर लो।"
"सामान क्यों?" अर्जुन ने हैरानी जताई।
"हाँ, हम इस घर को छोड़कर किराए के घर में जा रहे हैं," प्रिया ने जवाब दिया।
अर्जुन ने थोड़ी देर सोचा और फिर बच्चों को तैयार होने को कहा। प्रिया भी उनके साथ तैयार हो गई।
मंदिर में भूपेंद्र जी और रेखा जी अपने कुछ मित्रों के साथ शादी की रस्में कर रहे थे। उनकी निगाह बार-बार दरवाजे की ओर थी, उम्मीद थी कि कोई उनका साथ देगा। तभी अर्जुन और प्रिया बच्चों के साथ दरवाज़े पर पहुंचे।
"अरे, बच्चे तुम!" भूपेंद्र जी की आँखों में चमक थी।
"हाँ दादाजी, हम करेंगे आपका और दादी का गठबंधन," बच्चों ने खुशी से कहा और पंडित जी की मदद से गठबंधन सम्पन्न हुआ।
कुछ समय बाद अर्जुन ने कहा, "पापा, अब हम चलते हैं।"
"कहाँ?" भूपेंद्र जी ने आश्चर्य से पूछा।
"पापा, हमने किराए का घर देख लिया है। अब हम वहीं रहेंगे। यह घर आपका है, हम आपकी सेवा करेंगे, लेकिन अब हम अपना जीवन खुद बनाएँगे।"
भूपेंद्र जी और रेखा जी ने रोकने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन और प्रिया ने दृढ़ता दिखाई। प्रिया ने अर्जुन का हाथ पकड़ा और मुस्कुराई — यह उनकी नई राह थी, अपने जीवन का नया अध्याय।
भूपेंद्र जी ने महसूस किया कि सचमुच, जीवन केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि खुद के लिए भी जीना चाहिए।
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