नींव

 आश्चर्य होता है कि मुग्धा जी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता। पति पत्नी अकेले रहते हैं मात्र एक सहायिका रखी है जो सुबह, शाम काम कर जाती है। फल, सब्जी राशन खुद ही लाती हैं। डॉक्टर के जाना हो या कोई और काम हो सब आसानी से कर लेती हैं। वैसे तो इस उम्र में बहुत से माता पिता बच्चों से सहारे की आशा रखते हैं पर न जाने क्यों मुग्धा जी के मुँह से कभी ये नहीं सुना बेटा बहू पूछते नहीं। बेटी को हमारी कोई परवाह नहीं। सीधी सादी मुग्धा जी सारी जिंदगी पति और बच्चों में ही लगी रहीं। पड़ोस में रहने वाली औरतें कभी कभी टोकती अरे बेटा कभी दिखता नहीं जबकि रहता तो इसी शहर में है।

कोई जबाव नहीं देती मुस्कुरा भर देतीं हैं।

जब से मेरी उनसे नजदीकी बढ़ी है मैं तो जैसे उनकी फेन हो गई। सारे काम बड़े सलीके से करती हैं। बच्चे घर आते जाते हैं तो पूरा सत्कार करती हैं। मुझे जब तब उनकी सहायता की जरूरत पड़ती ही रहती है कभी मना नहीं करतीं। 'सत्तर' वर्ष की मुग्धा जी बहुत बीमार हो गईं। सहायिका के सहारे ही काम चलाती रहीं। बेटा, बहू आते तो उनका काम बढ़ जाता। बेटी एक दो दिन रह गई थी।

उनकी परेशानी देख मुझ से रहा नहीं गया। "आप कितना करती हो अपने बच्चों का, उनकी दुःख बीमारी में खड़ी रहती हो। आप उनको कहती क्यों नहीं कि वह लोग आप का ख़याल रखें।"

मुग्धा जी मुस्कुरा कर बोली," स्नेहा जानती हो हम किसी को क्यों नहीं कुछ कहते। ये जो आजकल अकेले अकेले रहने की प्रथा बन गई है उसकी नींव हमने ही डाली थी।

हमने ही परिवार से अलग अपनी गृहस्थी जमाई थी। हम ने कौन सा अपने माता पिता या सास ससुर का ख़याल रखा था। तुम बताओ तुम रहीं कभी अपनी सास के साथ?" मैं क्या जबाव देती बस मुग्धा जी को देखती रही।

गीतांजलि गुप्ता

नई दिल्ली©®


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