अलका की शादी को अभी मुश्किल से दस दिन ही हुए थे। वह अपने नए घर, नए माहौल और नए रिश्तों को समझने की कोशिश कर रही थी। उसके पति, रोहित, एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे और दिन भर ऑफिस में रहते। घर में सास, ससुर, जेठ-जेठानी और दो देवर रहते थे। बड़ा परिवार था, और सबकी अपनी-अपनी आदतें।
अलका स्वभाव से शांत और संयमी थी। उसने अपनी मां से हमेशा यही सीखा था — “पहले परखो, फिर बोलो।” लेकिन नया माहौल, अजनबी लोग और ढेर सारी बातें… कभी-कभी मन को विचलित कर देतीं।
एक दोपहर, जब अलका किचन में सब्ज़ी काट रही थी, तभी उसकी जेठानी, रीना, पास आई और धीमे स्वर में बोली,
“अलका, तुम्हें पता है? तुम्हारे मायके से जो साड़ी और उपहार आए थे, उनमें से आधी चीज़ें मम्मी जी ने अपने पास रख ली हैं। कल मैंने देखा, उन्होंने अलमारी में अलग से रखी हैं।”
अलका चौंक गई।
“पर क्यों? वो तो मेरे मायके से आए थे, मेरे लिए…”
रीना ने आंखें मटकाते हुए कहा,
“यही तो! यहां जो भी आता है, पहले मम्मी जी के पास जाता है। फिर वो तय करती हैं कि किसे क्या देना है। तुम्हारे केस में तो लगता है, उन्होंने आधा अपने पास रख लिया है। सोच लो, अगर अभी आवाज़ नहीं उठाई तो बाद में कुछ नहीं मिलेगा।”
रीना की बातें अलका के मन में घर करने लगीं। शाम तक वह बेचैन रही। वह सोच रही थी कि मां के लाए हुए उपहार उसकी अपनी पहचान हैं, और अगर कोई उन्हें बिना कारण रोक ले तो यह गलत है।
रात को उसने रोहित से बात करने का सोचा, लेकिन फिर सोचा — “अभी शादी के कुछ ही दिन हुए हैं, ऐसे में शिकायत करना ठीक होगा? कहीं रोहित को लगे कि मैं सामान के पीछे पड़ी हूँ…”
इस उलझन में उसने कुछ नहीं कहा।
अलका जब पूजा के लिए उठी, तो उसने देखा कि सास, उषा देवी, अपने कमरे में अलमारी से कुछ कपड़े निकाल रही थीं। तभी रीना भी वहाँ आ गई।
“मम्मी जी, कल अलका कह रही थी कि उसके मायके से जो साड़ियां आई हैं, वो सब उसे दे दीजिए। कह रही थी कि वो अपने कमरे में रखना चाहती है।”
अलका यह सुनकर दंग रह गई। उसने तो ऐसी कोई बात ही नहीं कही थी!
उषा देवी का चेहरा गंभीर हो गया।
“अलका, तुमने मुझसे सीधे कहने की बजाय रीना से कहा? और वो भी इस लहजे में? हमें लगा था तुम समझदार हो…”
अलका का चेहरा सफेद पड़ गया।
“नहीं मम्मी जी, मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा। रीना भाभी, आपने मम्मी जी से यह क्यों कहा? मैं तो बस… कल आपने…”
रीना ने बात काट दी,
“अरे, मैंने तो वही कहा जो तुम सोच रही थीं। मैंने तो बस मम्मी जी को पहले से बता दिया ताकि गलतफहमी न हो।”
अलका का दिल बैठ गया। वह कुछ कहती, इससे पहले ही उषा देवी ने शांत स्वर में कहा,
“अलका, कल तुम्हारे मायके से जो उपहार आए थे, उनमें से कुछ मैंने अलग रख दिए थे क्योंकि वे तुम्हारे मामा जी के घर भेजने थे। वहाँ अगले हफ्ते शादी है, और उन्होंने मुझसे पहले ही कह रखा था कि जो भी अच्छा सामान आए, उसमें से कुछ भेज देना। बाक़ी सारी चीज़ें तुम्हारे कमरे में रखी हैं, तुम देख सकती हो।
और रीना, बिना पूरी बात जाने किसी की ओर से बोलना ठीक नहीं है। अगर मैं कल अलका से न पूछती और तुम्हारी बात मान लेती, तो शायद हमारे बीच गलतफहमी पैदा हो जाती।”
रीना ने असहज होकर नज़रें फेर लीं। अलका ने राहत की सांस ली, लेकिन उसके भीतर झटका गहरा था।
उसने धीरे से कहा,
“मम्मी जी, मुझे माफ़ करिए अगर मैंने मन में कोई संदेह किया। मुझे आपसे सीधे बात करनी चाहिए थी।”
उषा देवी ने मुस्कुराकर कहा,
“बेटी, घर में रिश्ते कपड़ों जैसे होते हैं — अगर धागा ज़रा भी खिंच जाए, तो सिलाई खुलने लगती है। हर बात पर तुरंत प्रतिक्रिया देने से पहले जांचना-परखना जरूरी है। खासकर तब, जब आप नए रिश्तों में हों।”
उस दिन के बाद अलका ने तय कर लिया कि वह किसी की कही बात पर तुरंत भरोसा नहीं करेगी। वह पहले खुद सच्चाई जानेगी, फिर कोई कदम उठाएगी।
धीरे-धीरे, उसके और उषा देवी के बीच गहरा अपनापन बन गया। रीना भी, कुछ समय बाद, अपनी गलती मानकर अलका से माफी मांगने आई।
परिवार में अब माहौल पहले से बेहतर था। अलका के मन में अब एक ही बात गूंजती — “जल्दबाजी में उठाया गया कदम रिश्तों को तोड़ सकता है, लेकिन धैर्य और समझ रिश्तों को मजबूत करते हैं।”
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