" दीदी...इस बार माफ़ कर दो..आगे से आपको मुझसे कोई शिकायत नहीं होगी।" हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए मनीष अपनी बड़ी बहन मालती से बोला तो वो बोली," बस...बहुत हो गया...अब तू यहाँ नहीं रह सकता.. तेरी हरकतों से मुझे समझ आ गया कि चिकने घड़े पे पानी नहीं ठहरता।" कहते हुए मालती ने उसका सामान बाँधकर उसे वापस गाँव जाने को कह दिया।
मालती का पति दिल्ली में नौकरी करता था।शादी के बाद कुछ महीने अपने सास-ससुर के पास रहकर वो दिल्ली चली आई और अपनी गृहस्थी को सजाने-सँवारने लगी।दो साल बाद वह एक बेटे मनु की माँ बनी और उसी के पालन-पोषण में वो व्यस्त हो गई।
उसके मायके में माँ और एक छोटा भाई मनीष था जो नौवीं कक्षा में पढ़ता था।उसी समय मालती के पिता की एक हादसे में मृत्यु हो गई। मालती ने कुछ दिन वहाँ रहकर मनीष को समझाया कि देख, पापा तो अब रहे नहीं..माँ की ज़िम्मेदारी तेरे पर ही है, इसलिए मन लगाकर पढ़ाई करना।लेकिन पिता के न रहने पर तो वो बेलगाम हो गया..स्कूल के बहाने इधर-उधर घूमता रहता और अक्सर ही अपनी माँ से झगड़ पड़ता था।किसी तरह से उसने दसवीं पास किया तब पति के कहने पर मालती ने उसे अपने पास बुला लिया और स्कूल में दाखिला करवा दिया।
बहन के पास आकर तो मनीष को शहर की हवा लग गई।स्कूल से उसकी शरारतें और शाॅर्ट अटेंडेंस की शिकायतें आने लगी।तब मालती ने उसे कड़े शब्दों में समझाया..एक बार तो उस पर हाथ भी उठाने लगी थी तभी उसके पति ने आकर रोक दिया," परेशान मत हो मालती..अभी बचपना है, धीरे-धीरे समझ जायेगा।" लेकिन उसकी आदतों में कोई सुधार नहीं आया।अब तो वह मोहल्ले की लड़कियों को भी छेड़ने लगा था।अब जब उसने बारहवीं की परीक्षा दे दी थी तो फिर मालती उसे अपने पास क्यों रखती।इसलिए उसका सामान बाँधते हुऐ बोली," आगे जो करना है, माँ के सामने करना।"
बेटे के वापस आने से मनीष की माँ समझ गई कि उसमें कोई सुधार नहीं आया है।फिर भी माँ है, आस तो रहेगी ही।उन्होंने काॅलेज़ में उसका नाम लिखवा दिया कि शायद सुधर जाये।कुछ दिनों के बाद वह फिर से आवारागर्दी करने लगा।अब तो उसे जुए की भी लत लग गई थी।माँ से पैसे के लिये रोज झगड़ा...एक दिन तो उसने अपना हाथ उठा दिया तब उसकी माँ उसे घर से बाहर करती हुई बोली," अब तू खुद कमा और उड़ा।" कहकर भड़ाक-से दरवाज़ा बंद कर लिया।
मनीष ने सोचा, दीदी नाराज़ है ना..जीजाजी तो मुझे बहुत प्यार करते हैं।तुरंत ट्रेन पकड़कर दिल्ली पहुँच गया।अपने जीजीजी के चरणों पर गिर पड़ा," अब आपका ही सहारा है।" उसके जीजाजी उसे दुत्कारते हुए बोले," दूर हट! माताजी ने मुझे सब बता दिया है।तू है चिकना घड़ा और चिकने घड़े पे पानी नहीं ठहरता।" कहते हुए उन्होंने मनीष को घर से बाहर कर दिया।मालती अपने बेटे के साथ खड़ी सब देख रही थी।भाई की हालत देखकर उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े लेकिन अपने घर की भलाई के लिये उसने अपना जी कड़ा कर लिया और अपनी आँख के आँसू पोंछ लिये।
विभा गुप्ता
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