संघर्ष

 पूरे तीन दिनो बाद फ्लैट का दरवाजा खोला तो देखा, बालकोनी में रखे एक खाली बड़े गमले में कबूतर के दो अंडे रखे हैं। मैंने उन्हें हटाने का पाप नही किया। मैं दिन में एक आध बार बालकोनी में झांक कर देख लेता, जिज्ञासा थी कि अंडो से बच्चे कैसे निकलते है, कैसे लगते हैं। एक दिन देखा कि एक कौवा उन अंडो को अपनी चोंच से तोड़ खाने वाला ही था कि कबूतरी ने आकर उस पर हमला कर दिया। हड़बड़ा कर कौवा हट कर ताक में थोड़ी दूर मुंडेरी पर बैठ गया। कबूतरी ने अपने दोनो पंख फैला कर उन अंडो को ढक लिया। उस दिन वह अपने लिये दाना चुगने भी नही गयी। अब वह दाना चुगने दूर नही जाती थी, आशंकित हो पास ही रहती थी, मैंने बाजरे के दाने उसके लिये बालकोनी में ही डालने प्रारम्भ कर दिये। वह अब निश्चिंत थी, उसके होने वाले बच्चों का उसके होते कोई कुछ नही

बिगाड़ सकता।
बालेश्वर गुप्ता, नोयडा मौलिक एवम अप्रकाशित।

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