रानू कई दिनों से बहुत परेशान चल रही थी। कारण एक तो घर में काम वाली बाई पिछले 15 दिनों से बीमार होने की वजह से नहीं आ रही थी। घर के सारे काम करके ऑफिस जाना, और ऑफिस में भी जो बॉस थी, वो रोज किसी न किसी बात पर जैसे मानसिक तनाव देती ही थी। रानू और बॉस की काफी अच्छी प्रोफेशनल रिलेशनशिप थी, पर कई दिनों से वो देख रही थी कि बॉस उससे बिना किसी बात के मीटिंग्स में चिढ़ जाती थी। या तो उसके काम को बिना बताए किसी और को दे देना, या पीठ पीछे उसकी बुराई जूनियर्स से करना। ये सब रानू के लिए बेहद परेशान करने वाला था। कभी कुछ काम करके देती तो वो उसमें कमी निकाल ही देती थी। वैसे भी इन दिनों मार्केट डाउन होने से और EMI की वजह से रानू नौकरी छोड़ भी नहीं सकती थी। धीरे-धीरे रानू मानसिक रूप से दबाव महसूस करने लगी। उसने अपने आप पर काम करना शुरू किया । बाहर से एक्सपर्ट की सलाह ली । पर मानो उसकी मैनेजर तो उस से किसी जन्म का बदला निकालने के लिए ही बैठी थी ।
हद तो तब हुई जब एक मीटिंग में रानू को बुलाकर उसकी काबिलियत पर सवाल उठाए उसकी मैनेजर ने, और बोला कि हमसे हायरिंग में गलती हुई । रानू अंदर तक हिल गई क्योंकि इससे पहले उसने किसी भी ऑफिस में अपने लिए इस तरह की बेइज्जती महसूस नहीं की थी, और अभी २ महीने पहले से उसे डायरेक्टर से अवार्ड भी मिला था , फिर अचानक ऐसा क्या हो गया जो उसको नहीं पता । रानू घर आई और सोचा अगर मेरे आत्मसम्मान पर बात आएगी तो मुझे बेहतर है ऑफिस से दूरी बना लेनी चाहिए। लेकिन उसने अगले पल सोचा कि आज यहाँ से भागी तो कल दूसरी जगह भी यही सहना पड़ सकता है। फिर क्या था, रानू ने अपनी 1 साल की प्रगति रिपोर्ट निकाली, जिन लोगों ने उसे रिकग्निशन भेजा था वो सारे मेल्स इकट्ठा किए। अपने जूनियर्स से बात की कि क्या वो भी रानू के बारे में ऐसा ही सोचते हैं। सारे इनपुट्स लेने के बाद उसने अपने बॉस के बॉस के साथ मीटिंग सेटअप की। सारी चीजें विस्तार से बताईं और ये भी कहा कि इस तरह की डेली पब्लिक ह्यूमिलिएशन न केवल प्रोडक्टिविटी को कम करती है बल्कि हमारे आत्मसम्मान, मानसिक, और शारीरिक स्वास्थ्य को भी खराब करती है। इसमें उसका साथ दिया कुछ लोगों ने जो खुद भी मैनेजर से प्रताड़ित थे। और इस तरह सबूतों के आधार पर सीनियर बॉस ने काफी कड़े नियम बनाए। रानू ने आत्मचिंतन किया कि आत्मसम्मान पर ठेस लगने के लिए क्या सिर्फ उन लोगों से दूर भाग जाना ही पर्याप्त है?
या फिर ख़ुद के लिए स्टैंड लेना है । ख़ुद पर और काम करना है अगर कहीं कोई चूक है तो उसे सुधारकर आगे बड़ना है । बेशक ख़ुद के सम्मान पर बात आये , या काबिलियत पर बात आये तो बेहतर ऑप्शन है कि कही और अपना रास्ता ढूँढ लो जो आपको मानसिक शांति दे । पर अगर ये फिर ना हो इसकी गारंटी नहीं । तो इन सब परिस्थिति से सीखना ज़रूरी है । इसको कैसे हैंडल करना ज़रूरी है , और कोई आप पर सवाल उठाये वो भी ग़लत तो उसको मुँह तोड़ जवाब देना भी ज़रूरी है । इसके बाद अगर आप अपनी शांति चाहे तो कही और जा सकते हैं । पर सिस्टम में रहकर ऐसे लोगों को सिखाना बहुत ज़रूरी है, जिस से अगली बार किसी को बेज्जत करने से पहले लोग १०० बार सोचे ।
धन्यवाद
लेखिका : डॉ आरती द्विवेदी
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