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खिड़की

   यहां पर बीच में एक कमरा बनवा लेते हैं , इससे हमारा घर बिल्कुल सेपरेट हो जाएगा । आए दिन किच-किच , मनमुटाव और फिर जायदाद बंटवारे के बाद निखिल ने कहा , ठीक है निखिल पर उस ओर एक खिड़की जरूर रखना , नित्या ने सुझाव दिए । क्यों भाभी के बिना तुम्हें भी चैन नहीं है क्या ? व्यंगात्मक हंसी हंसते हुए निखिल ने कहा ।अरे वो ताजी हवा भी तो आएगी ना नित्या ने भी तुरंत जवाब दिया ।

        जब भी नित्या उस कमरे में जाती निगाहें खिड़की के उस पार चली ही जाती। आखिर वर्षों से साथ रहे जेठ जेठानी जो उस पार रहते थे । बिल्कुल यही हाल उस ओर भी था कभी-कभी देवरानी जेठानी की नजरें मिल भी जाती, होठों पर हल्की सी मुस्कान भी आ जाती पर किसी ने भी बात करने की तत्परता नहीं दिखाई।

       आज निखिल के ऑफिस जाने के बाद जैसे ही नित्या ने खिड़की खोली उसे कुछ आवाज सुनाई दी जेठानी जी फोन पर किसी से बात कर रही थी अखिल (निखिल के बड़े भाई) को खून की जरूरत है कहीं से भी इंतजाम हो पाएगा क्या ? नित्या ने तुरंत निखिल को फोन किया निखिल ने फोन नहीं उठाया नित्या परेशान हो दूसरी बार नंबर डायल करने ही वाली थी तभी जेठानी जी आंखों में आंसू लिए आईं और बोली नित्या, निखिल कहां है ? दीदी मैंने सब सुन लिया है उन्हें ही फोन लगा रही हूं ।

       अखिल भैया बिल्कुल ठीक है मैंने उन्हें खून दे दिया है निखिल ने घर आते ही कहा । पर आपको पता कैसे चला निखिल ?  नित्या ने आश्चर्य से पूछा , तुमने दोनों घरों के बीच वाले कमरे में सकारात्मक संभावना की खिड़की जो बनवाई थी ।

✍️ संध्या त्रिपाठी अंबिकापुर , छत्तीसगढ़

( स्वरचित अप्रकाशित रचना)


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