बहुत समय पहले की बात है। वाराणसी के एक पुराने घाट के पास “हरिहर चाय” नाम की छोटी-सी दुकान थी। दुकान जितनी छोटी थी, दुकानदार उतना ही बड़ा दिल वाला—हरिहर। उम्र कोई चालीस के आस-पास, चेहरे पर थकान की रेखाएँ, मगर आँखों में ईमानदारी की चमक। वह पास ही की तंग गलियों में बने एक किराए के कमरे में पत्नी सुगंधा और दो बच्चों—मोहन (बारह साल) और गुड़िया (आठ साल)—के साथ रहता था।
हरिहर सुबह चार बजे उठता। चूल्हा जलाता, अदरक कूटता, दूध चढ़ाता और फिर घाट की ओर ठेले को धक्का देकर ले जाता। घाट पर बाबू लोग, नाविक, पंडे, छात्र और साधु—सब आते। चाय बिकती भी, मगर उतनी नहीं कि घर आराम से चल सके। सबसे बड़ी मुसीबत थी—उधार। लोग हँसकर कहते, “हरिहर, अभी लिख दे… तनख्वाह आते ही दे देंगे।” और तनख्वाह आती, तो उनका चेहरा बदल जाता। कोई बहाना, कोई गुस्सा, कोई टाल-मटोल।
इसी उधार ने हरिहर के मन को धीरे-धीरे तोड़ दिया था। वह पहले रोज़ दुकान के सामने वाले छोटे से शिवमंदिर में दीपक जलाता था। पर जब लगातार घाटा होने लगा, बच्चों की फीस रुकने लगी, और घर में कई दिन तक सब्ज़ी तक न बने—तो उसका विश्वास भी रुक गया।
“भगवान से कह-कहकर थक गया,” वह एक दिन सुगंधा से बोला। “मैं मेहनत कर रहा हूँ, ईमानदारी से… फिर भी दुख खत्म नहीं होता। अगर भगवान होते तो कुछ तो रास्ता निकालते।”
सुगंधा ने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी—जब पेट खाली हो, तो आस्था भी कमजोर हो जाती है।
लेकिन हरिहर की आदतें नहीं बदलीं। दुकान पर रोज़ एक काली-सी कुतिया आती, उसके पीछे तीन छोटे पिल्ले। हरिहर उन्हें बचे हुए दूध में रोटी भिगोकर दे देता। पास के मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने वाली एक बूढ़ी अंधी औरत थी—सब उसे माई कहते। वह दिन भर भजन गुनगुनाती और शाम को थकी आवाज़ में “बेटा, पानी…” कहती। हरिहर उसे रोज़ बिना पूछे चाय और दो सूखी बिस्कुट दे देता।
माई कभी पैसे नहीं मांगती। सिर्फ आशीर्वाद देती—“बेटा, तेरी रोटी में बरकत हो।”
एक शाम, बारिश के बाद घाट पर सन्नाटा था। हरिहर दुकान समेट रहा था कि माई ने धीरे से पूछा,
“हरिहर बेटा… तू रोज़ सबकी सेवा करता है, लेकिन आजकल मंदिर में दिया नहीं जलाता। क्यों रे? नाराज़ है भगवान से?”
हरिहर का चेहरा तन गया। उसने थकी हुई हँसी हँसी—
“माई, अब ये सब बातें छोड़ो। भगवान-वगवान कुछ नहीं होता। होता है तो सिर्फ मेहनत… और लोगों की बेईमानी। मैंने कितनी बार पूजा की, मन्नत मानी… मेरे घर का चूल्हा फिर भी मुश्किल से जलता है। अब किसके आगे सिर झुकाऊँ?”
माई ने अपनी खाली आँखों के गड्ढों को जैसे आसमान की ओर उठा दिया।
“बेटा… तू पूजा करे या ना करे, पर तेरा कर्म पूजा से कम नहीं। सेवा करने वाला खाली हाथ नहीं रहता। ऊपर वाला देर करता है, पर भूलता नहीं।”
हरिहर ने कटु स्वर में कहा,
“अगर ऊपर वाला है, तो मेरी दुकान बचा ले। अगले महीने नगर-निगम वाले सब ठेले हटाने वाले हैं। नोटिस लग गया है—‘अवैध अतिक्रमण’। जुर्माना भरने के पैसे नहीं हैं, दुकान हटानी पड़ेगी। फिर मैं बच्चों को लेकर गांव चला जाऊँगा।”
इतना कहकर वह तेजी से अपने ठेले की रस्सी बांधने लगा, जैसे बातों से भाग रहा हो।
उस रात सुगंधा ने नोटिस पढ़कर रो दिया। मोहन बोला, “बाबा, मैं स्कूल छोड़ दूँ?”
हरिहर का कलेजा कट गया। “नहीं बेटा… पढ़ाई नहीं रुकेगी,” कहकर उसने अपने आँसू अंदर ही दबा लिए।
अगले कई दिन हरिहर ने इधर-उधर दौड़ लगाई। किसी ने कहा, “पैसा दो तो लाइसेंस बनवा देंगे।” किसी ने कहा, “मेरे पास समय नहीं।” उधारी मांगने गया तो लोग उल्टा उसे ही जलील करने लगे। एक दुकानदार ने तो साफ कह दिया, “जा भाई, गरीब आदमी की चाय कौन उधार चुका पाए!”
हरिहर के भीतर कुछ टूट गया। उसने फैसला कर लिया—दुकान हटेगी, तो हटेगी। इज्जत बेचकर नहीं जिएगा।
वही आखिरी दिन था। सुबह घाट पर उसने पहली बार बिना चाय बेचे ठेला खाली किया। शाम होते-होते वह ठेले के नीचे लगे लकड़ी के गट्टे, लोहे की कीलें, पुराने टीन—सब खोलने लगा। बारिश में जमीन नरम थी। जब उसने एक पुराना पत्थर हटाया तो नीचे एक बड़ा-सा खड्डा बन गया। उसमें ठेला टिकाने के लिए कई साल पहले एक लोहे की पाइप गाड़ दी गई थी।
हरिहर पाइप खींचने लगा। पाइप हिलती नहीं। उसने फावड़ा लिया, और खोदना शुरू किया। मिट्टी हटाते-हटाते फावड़े की नोक किसी चीज से टकराई—“ठन!”
हरिहर चौक गया। उसने हाथ से मिट्टी हटाई तो एक जंग लगी लोहे की डिब्बी दिखी। डिब्बी पर ताला था, मगर ताला टूटा हुआ। शायद सालों पुराना।
उसके हाथ कांपने लगे। उसने डिब्बी खींचकर बाहर रखी, और ढक्कन खोला। अंदर एक कपड़े में लिपटा सामान था। उसने कपड़ा हटाया तो आँखें फटी की फटी रह गईं—सोने की दो चूड़ियाँ, एक हार, कुछ पुराने सिक्के, और साथ में एक कागज।
हरिहर को लगा जैसे उसकी सांस रुक गई। उसने तुरंत इधर-उधर देखा—कोई आसपास नहीं था। उसने डिब्बी कपड़े में बांधी और तेजी से घर की ओर चल पड़ा। रास्ते भर उसके मन में डर भी था और खुशी भी—“कहीं यह सपना तो नहीं?”
घर पहुँचकर सुगंधा ने डिब्बी देखी तो घबरा गई।
“ये क्या है?”
हरिहर ने कांपती आवाज़ में कहा, “खोलकर देख।”
सुगंधा ने जैसे ही सोना देखा, उसके हाथ जोड़ गए। “हे भगवान…!”
हरिहर ने कागज खोला। कागज पर पुरानी स्याही में लिखा था—
“जिसे यह मिले, वह इसे अपनी मेहनत से जोड़कर देखे। यह धन चोरी का नहीं—मेरी पत्नी का स्त्रीधन है। गंगा की बाढ़ में घर बह गया था। मैं इसे सुरक्षित रखकर फिर लेने आया, मगर लौट न सका। अगर ईश्वर ने इसे किसी जरूरतमंद तक पहुँचाया है, तो समझो उसका हक़ था। — माधव दास, सन 1962”
हरिहर देर तक चुप रहा। फिर उसके भीतर कई साल का गुस्सा पिघलकर आँसू बन गया।
“सुगंधा…” वह फूट पड़ा, “मैं भगवान को कोसता रहा… और देख, रास्ता वहीं से खुला जहां मैं हार मान चुका था। अगर मैं दुकान हटाने नहीं आता, तो ये कभी नहीं मिलता।”
अगली सुबह हरिहर सबसे पहले मंदिर गया। कई साल बाद उसने दीपक जलाया। उसकी हथेलियाँ कांप रही थीं, लेकिन मन में भारीपन नहीं था। उसने सिर झुकाकर कहा, “मैंने विश्वास छोड़ दिया था… माफ कर देना।”
फिर वह बाहर आया। माई उसी सीढ़ी पर बैठी थी। हरिहर ने उसके चरण छुए।
“माई… आपकी बात सच निकली।”
माई मुस्कुराई। “बेटा, सच तो तेरे कर्म में था। ऊपर वाले ने बस मुहर लगाई।”
हरिहर उसे सहारा देकर अपने घर ले गया। सुगंधा ने माई के लिए बिछावन लगाया। बच्चों ने पहली बार किसी दादी का स्पर्श महसूस किया। माई ने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा—“आज से तू मेरी गुड़िया नहीं, मेरी बिटिया है।”
हरिहर ने उस धन का इस्तेमाल दिखावे में नहीं किया। उसने पहले नगर-निगम में कानूनी फीस देकर दुकान का छोटा-सा लाइसेंस बनवाया। फिर एक पक्का ठेला बनवाया, जिस पर लिखा—“हरिहर चाय—ईमानदारी का स्वाद”। उसने उधार बंद कर दिया—“चाय मिलेगी, प्रेम से… उधार नहीं।”
धीरे-धीरे लोग उसकी साफ-सुथरी दुकान पर आने लगे। वह हर सुबह मंदिर में दीपक जलाता, मगर सबसे बड़ी पूजा—वह वही रखता जो पहले से करता आया था: सेवा।
और जब भी किसी दुखी चेहरे को देखता, वह माई की बात याद करता—
“ऊपर वाला देर करता है… पर भूलता नहीं।”
सीख:
विश्वास का मतलब चमत्कार मांगना नहीं, कर्म के साथ उम्मीद बनाए रखना है। जो सच्चे मन से मेहनत और सेवा करता है, उसके हिस्से का उजाला देर से सही—आता जरूर है।
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