"तुम्हारी माँ को पता है?" सुजाता की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें हथौड़े जैसी चोट थी। "क्या तुम्हारी माँ को पता है कि उनका पढ़ा-लिखा और होशियार बेटा, सड़क पर अपनी माँ की उम्र की औरतों की पीठ पर हाथ मारता है?" समीर की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह तुरंत सोफे से उठा और सुजाता के पैरों में गिर पड़ा। "मुझे माफ़ कर दीजिए आंटी... मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं दोस्तों की संगत में पागल हो गया था। मुझे नहीं पता था कि..."
आसमान से गिरती बारिश की बूंदों ने शहर को पूरी तरह से भिगो दिया था। बयालीस साल की सुजाता तेज़ कदमों से अपने घर की ओर बढ़ रही थीं। उनके हाथ में सब्ज़ियों से भरा थैला था और बदन पर एक साधारण सी साड़ी। मुख्य सड़क पर पानी घुटनों तक भर चुका था, इसलिए सुजाता ने घर जल्दी पहुँचने के लिए एक सुनसान और तंग गली का रास्ता चुन लिया था। शाम के साढ़े सात बज रहे थे और अँधेरा गहराने लगा था। सुजाता बस यही सोच रही थीं कि उनका उन्नीस साल का बेटा राहुल घर पर अकेला है और भूख से परेशान हो रहा होगा। तभी पीछे से एक बाइक की तेज़ आवाज़ ने उस शांत गली का सन्नाटा चीर दिया। बाइक सवार ने जानबूझकर बाइक को एक गहरे गड्ढे के पास से निकाला, जिससे गंदा पानी सुजाता की साड़ी पर छलक गया। सुजाता ने ठिठक कर पीछे देखा।
"उफ़! क्या ज़हर लग रही हो आंटी! बारिश में तो एकदम कयामत ढा रही हो!"
बाइक पर अठारह-उन्नीस साल का एक लड़का बैठा था। उसके होंठों पर एक बहुत ही भद्दी और गंदी मुस्कान थी। सुजाता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक पल के लिए उन्हें लगा जैसे उनके कानों ने कुछ गलत सुन लिया है। वह लड़का बिल्कुल उनके बेटे राहुल की उम्र का था। सुजाता ने उसे अनसुना किया और अपने कदमों की रफ़्तार बढ़ा दी। उनका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। एक कामकाजी महिला और एक माँ होने के नाते उन्होंने दुनिया के कई रंग देखे थे, लेकिन अपने ही बेटे की उम्र के एक लड़के के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर उनकी रूह कांप गई।
लेकिन उस उद्दंड लड़के की हिम्मत बढ़ती ही जा रही थी। उसने अपनी बाइक सुजाता के बिल्कुल नज़दीक कर ली। "अरे मुड़कर तो देखो जानेमन, इतनी क्या जल्दी है? आओ मैं तुम्हें घर छोड़ दूँ," उसने भद्दी आवाज़ में कहा। सुजाता ने घबराकर कहा, "तमीज़ से बात करो! मेरी उम्र तुम्हारे माँ के बराबर है। शर्म नहीं आती तुम्हें?" लड़के ने ज़ोर से ठहाका लगाया और अचानक उसने अपनी बाइक की रेस बढ़ाई। सुजाता कुछ समझ पातीं, उससे पहले ही उस लड़के ने मौका देखकर सुजाता की पीठ पर ज़ोर से अपना हाथ मारा। सुजाता का संतुलन बिगड़ गया और वह कीचड़ से भरी सड़क पर गिर पड़ीं। उनकी सब्ज़ियां पानी में बिखर गईं। वह लड़का ज़ोर-ज़ोर से हँसता हुआ अपनी बाइक दौड़ाकर अँधेरे में गायब हो गया।
सुजाता वहीँ सड़क पर बैठी रह गईं। बारिश के पानी में उनके आँसू छुप गए थे, लेकिन उनके स्वाभिमान पर जो चोट लगी थी, उसकी टीस उनके पूरे शरीर को सुन्न कर रही थी। उन्होंने कांपते हाथों से खुद को संभाला। कपड़े कीचड़ से सन चुके थे, कोहनी छिल गई थी, लेकिन इन सब से बड़ा दर्द उस स्पर्श का था जिसने उनकी गरिमा को तार-तार कर दिया था। सुजाता किसी तरह अपने घर पहुँचीं। दरवाज़ा उनके बेटे राहुल ने खोला। अपनी माँ की यह हालत देखकर राहुल घबरा गया। "माँ! ये क्या हो गया? आप गिर गईं क्या? किसी ने कुछ कहा क्या आपको?" राहुल की आवाज़ में अपनी माँ के लिए चिंता और गुस्सा दोनों था। सुजाता जानती थीं कि राहुल का खून बहुत गर्म है। अगर उसे सच्चाई पता चली, तो वह उस लड़के को ढूँढ़कर अपनी जान जोखिम में डाल लेगा। सुजाता ने अपने आँसू पी लिए और एक झूठी मुस्कान के साथ कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस गली में कीचड़ के कारण पैर फिसल गया था। मैं ठीक हूँ।"
उस रात सुजाता सो नहीं पाईं। वो बार-बार बाथरूम में जाकर अपनी पीठ को पानी से धोती रहीं, जैसे उस गंदे स्पर्श को हमेशा के लिए मिटा देना चाहती हों। उन्हें हर उस औरत पर तरस आ रहा था जिसे इस समाज में हर रोज़ ऐसे खौफनाक पलों से गुज़रना पड़ता है। दो दिन बीत गए, लेकिन सुजाता उस सदमे से बाहर नहीं आ पाई थीं।
रविवार की सुबह थी। राहुल ने सुजाता से कहा, "माँ, आज मेरा एक दोस्त घर आ रहा है। हम दोनों को कॉलेज का एक प्रोजेक्ट पूरा करना है। वो बहुत होशियार है माँ, उसी के नोट्स से मैंने पिछले सेमेस्टर में टॉप किया था। आप आज राजमा-चावल बना लेना, उसे बहुत पसंद हैं।" सुजाता ने बेटे की खुशी के लिए अपने सारे दर्द एक किनारे रख दिए और मन से खाना बनाने लगीं। दोपहर करीब एक बजे दरवाज़े की घंटी बजी। राहुल दौड़कर गया और अपने दोस्त को अंदर लेकर आया। "माँ, बाहर आओ! देखो मेरा दोस्त समीर आया है," राहुल ने आवाज़ लगाई।
सुजाता अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए रसोई से बाहर आईं। उनके चेहरे पर एक मेहमान-नवाज़ मुस्कान थी। लेकिन जैसे ही उनकी नज़र सोफे पर बैठे उस लड़के पर पड़ी, उनके पाँव वहीं जम गए। उनके हाथों से स्टील की कटोरी छूटकर ज़मीन पर गिर गई और एक तेज़ आवाज़ ने कमरे की शांति को भंग कर दिया। सोफे पर बैठा वह लड़का कोई और नहीं, बल्कि वही था जिसने उस बारिश वाली रात को सुजाता की पीठ पर हाथ मारा था। समीर की नज़र जैसे ही सुजाता पर पड़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ गया। उसके शरीर का खून जैसे बर्फ बन गया। उसकी आँखें फटी रह गईं। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस औरत के साथ उसने सड़क पर वह नीच हरकत की थी, वह उसके सबसे अच्छे दोस्त की माँ है।
कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। "क्या हुआ माँ? आप ठीक तो हो?" राहुल ने कटोरी उठाते हुए पूछा। सुजाता ने एक गहरी साँस ली। उनके अंदर का तूफ़ान आँखों में उतर आया था, लेकिन उन्होंने खुद पर नियंत्रण रखा। "मैं ठीक हूँ बेटा, हाथ से फिसल गई," सुजाता ने कहा और वापस रसोई में चली गईं। समीर की हालत खराब थी। वह हर पल डर रहा था कि अभी सुजाता राहुल को सब कुछ बता देंगी और राहुल उसे ज़िंदा नहीं छोड़ेगा। पसीने से लथपथ समीर किसी तरह वहाँ बैठा रहा।
कुछ देर बाद सुजाता पानी के दो गिलास लेकर आईं। उन्होंने एक गिलास समीर के सामने रखा। राहुल तभी अपनी कोई किताब लेने अंदर कमरे में चला गया। अब ड्रॉइंग रूम में सिर्फ सुजाता और समीर थे। सुजाता समीर के बिल्कुल सामने खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब सी करुणा और तिरस्कार था। समीर मारे शर्म के कांपने लगा।
"तुम्हारी माँ को पता है?" सुजाता की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें हथौड़े जैसी चोट थी। "क्या तुम्हारी माँ को पता है कि उनका पढ़ा-लिखा और होशियार बेटा, सड़क पर अपनी माँ की उम्र की औरतों की पीठ पर हाथ मारता है?" समीर की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह तुरंत सोफे से उठा और सुजाता के पैरों में गिर पड़ा। "मुझे माफ़ कर दीजिए आंटी... मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं दोस्तों की संगत में पागल हो गया था। मुझे नहीं पता था कि..."
"तुम्हें नहीं पता था कि मैं राहुल की माँ हूँ? इसलिए तुमने वो सब किया?" सुजाता ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा। "अगर मैं किसी और की माँ होती, तो क्या तुम्हारा ऐसा करना सही होता? बेटा, औरत सिर्फ एक शरीर नहीं होती। जब तुम सड़क पर किसी औरत का अपमान करते हो, तो तुम सिर्फ उसे नहीं, बल्कि अपनी परवरिश, अपनी माँ की इज़्ज़त और अपनी इंसानियत को कीचड़ में रौंद देते हो। मेरी जगह अगर उस अँधेरी गली में तुम्हारी सगी माँ होती, तो क्या तुम तब भी यही करते?"
सुजाता के इन शब्दों ने समीर की आत्मा को अंदर तक चीर दिया। वह बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अपने किए पर इतना गहरा पछतावा हो रहा था कि वह सुजाता से नज़रें नहीं मिला पा रहा था। सुजाता ने उसे माफ़ तो कर दिया, लेकिन उसे जीवन का वह सबक सिखा दिया जो उसे किसी किताब में नहीं मिल सकता था।
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क्या आपने भी कभी सड़क पर किसी महिला के साथ ऐसी घटना होते देखी है? क्या सुजाता का समीर को बिना राहुल को बताए अकेले में सबक सिखाना सही था या उन्हें राहुल को सच बता देना चाहिए था? इस कहानी के बारे में आपकी क्या राय है, कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं, हमें आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।
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