ममता की छाया

 सेठ रामकिशोर जी ने अपनी पसंद और गायत्री की सहमति से चिराग के लिए पास के ही शहर की एक संस्कारी लड़की सृष्टि को चुना। सृष्टि न केवल सुंदर थी, बल्कि वह एक शिक्षक की बेटी थी, इसलिए उसमें धैर्य और शिष्टाचार कूट-कूट कर भरे थे। शादी बड़े धूमधाम से हुई।

गायत्री ने अपने हाथों से बहू का स्वागत किया, लेकिन उनके मन के किसी कोने में एक अनजाना डर बैठा था। वह डर था—बंटवारे का डर। उन्हें लगा कि अब चिराग का समय, उसका ध्यान और उसका प्यार बढ़ जाएगा।

घर में नई दस्तक और ममता का संघर्ष

शादी के शुरुआती हफ्तों में, गायत्री की आसक्ति और बढ़ गई। सुबह जब सृष्टि चिराग के लिए चाय बनाने किचन में जाती, तो गायत्री पहले ही वहां खड़ी मिलतीं। वह कहतीं, "बहू, तुम रहने दो। चिराग को कितनी चीनी चाहिए और उसे कितनी कड़क चाय पसंद है, यह सिर्फ मुझे पता है। तुम जाकर आराम करो।"

सृष्टि मुस्कुराकर पीछे हट जाती। लेकिन यह सिर्फ चाय तक सीमित नहीं रहा। चिराग ऑफिस से आता, तो गायत्री दरवाजे पर खड़ी मिलतीं। वह उसे पानी पिलातीं, पंखा चलातीं और दिन भर की बातें पूछने लगतीं। सृष्टि को चिराग से बात करने का मौका ही नहीं मिलता।

रामकिशोर जी यह सब देख रहे थे। उन्होंने एक रात गायत्री को समझाया, "गायत्री, बेटा बड़ा हो गया है। अब उसकी अपनी गृहस्थी है। तुम्हें थोड़ा पीछे हटना होगा।"

लेकिन गायत्री भावुक होकर बोलीं, "क्या माँ का हक खत्म हो गया? मैंने उसे अपनी जान से ज्यादा प्यार किया है, क्या अब मैं उसे देख भी नहीं सकती?"

तनाव की दरारें

सृष्टि धीरे-धीरे घुटन महसूस करने लगी। वह चिराग के लिए कुछ करना चाहती, लेकिन गायत्री हर काम में अपनी दखलअंदाजी रखतीं। चिराग भी असमंजस में था। वह माँ का दिल दुखाना नहीं चाहता था, लेकिन उसे अपनी पत्नी की उदासी भी दिख रही थी।

एक दिन, चिराग को ऑफिस में देर हो गई और उसे हल्का सिरदर्द था। सृष्टि ने सोचा कि वह आज चिराग की मालिश करेगी और उसे दवाई देगी। जैसे ही वह तेल लेकर कमरे में गई, गायत्री वहां पहले से ही चिराग का सिर दबा रही थीं।

सृष्टि ने धीमे स्वर में कहा, "माँ जी, आप थक गई होंगी, लाइए मैं कर देती हूँ।"

गायत्री ने तीखे स्वर में कहा, "सृष्टि, जब वह छोटा था तब से मैं ही उसे संभाल रही हूँ। तुम जाओ, सो जाओ।"

सृष्टि चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई और उस रात वह फूट-फूट कर रोई। चिराग ने उसे रोते देखा, तो उसका दिल पसीज गया। उसे समझ आ गया कि अब चुप्पी तोड़नी होगी, वरना यह घर बिखर जाएगा।

चिराग का साहसी कदम

अगले दिन रविवार था। चिराग ने अपनी माँ को पास बिठाया और कहा, "माँ, मुझे आपसे कुछ मांगना है।"

गायत्री ने चहकते हुए कहा, "बोल बेटा, तू कहे तो अपनी जान दे दूँ।"

चिराग ने गंभीर होकर कहा, "माँ, मुझे आपकी जान नहीं, मुझे मेरा बचपन वापस चाहिए।"

गायत्री चौंक गईं। चिराग ने आगे कहा, "माँ, जब मैं छोटा था, आप मुझे गिरने देती थीं ताकि मैं चलना सीखूँ। आप मुझे खुद खाना खाने देती थीं ताकि मेरा हाथ न कांपे। लेकिन आज, आप मुझे बड़ा होने ही नहीं दे रहीं। सृष्टि मेरी पत्नी है, इस घर की बहू है। अगर आप उसे मेरा ख्याल नहीं रखने देंगी, तो वह इस घर को अपना कैसे मानेगी? क्या आप चाहती हैं कि आपकी आसक्ति मेरे वैवाहिक जीवन को खत्म कर दे?"

गायत्री को जैसे काटो तो खून नहीं। उनकी ममता उन्हें गलत दिशा में ले जा रही थी। उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, लेकिन मन का वह मोह इतनी जल्दी नहीं जा रहा था।

वह दिन जब ममता 'त्याग' बनी

कुछ दिन बाद, घर में एक बड़ी पूजा रखी गई। गायत्री को पूजा की सारी जिम्मेदारी संभालनी थी, लेकिन अचानक उनका पैर फिसल गया और उनके टखने में मोच आ गई। डॉक्टर ने उन्हें पूरी तरह आराम करने की सलाह दी।

गायत्री परेशान हो गईं। "सब कैसे होगा? मेहमान आएंगे, चिराग का पसंदीदा खाना कौन बनाएगा? सृष्टि तो अभी नई है।"

लेकिन सृष्टि ने कमान संभाल ली। उसने न केवल पूजा का सारा इंतजाम किया, बल्कि 50 लोगों का खाना भी अकेले तैयार किया। वह बीच-बीच में गायत्री के पास आती, उन्हें दवाई देती और उनके पैर सहलाती।

शाम को जब मेहमानों ने खाने और व्यवस्था की तारीफ की, तो रामकिशोर जी ने गर्व से कहा, "यह सब हमारी बहू सृष्टि की मेहनत है।"

रात को जब सब चले गए, गायत्री ने देखा कि सृष्टि के पैरों में सूजन आ गई है। वह रसोई में खड़ी बर्तन साफ कर रही थी। गायत्री धीरे-धीरे छड़ी लेकर वहां पहुंचीं। उन्होंने सृष्टि के हाथ से बर्तन ले लिया और कहा, "बस कर बेटी, बहुत थक गई होगी तू।"

सृष्टि ने कहा, "नहीं माँ जी, यह तो मेरा फर्ज है।"

गायत्री की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने सृष्टि को गले लगा लिया और कहा, "बेटा, आज तक मैं चिराग को अपना 'चिराग' समझकर मुट्ठी में बंद किए बैठी थी। मुझे डर था कि तू आएगी तो वह बुझ जाएगा। पर आज समझ आया कि तू तो वह तेल और बाती है, जो इस चिराग को और ज्यादा रौशन करेगी।"


उपसंहार: नया सवेरा

उस दिन के बाद गायत्री बदल गईं। उन्होंने घर की चाबियाँ और रसोई की जिम्मेदारी पूरी तरह सृष्टि को सौंप दी। अब वह चिराग के ऑफिस से आने पर दरवाजे पर खड़ी नहीं रहती थीं, बल्कि अपने कमरे में बैठकर रामकिशोर जी के साथ पुरानी यादें साझा करतीं या भजन सुनतीं।

चिराग अब खुश था क्योंकि उसे माँ की ममता और पत्नी का साथ, दोनों मिल रहे थे। गायत्री ने समझ लिया था कि सच्चा प्रेम बांधने में नहीं, बल्कि भरोसा करके पंख देने में है।

सेठ रामकिशोर जी का घर अब सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं था, वह 'प्यार का मंदिर' बन चुका था जहाँ सास-बहू दो सहेलियों की तरह रहती थीं।


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