“ओफ्ह हो … फिर आ गईं …… ये लाल वाली छोटी चींटियाँ बहुत परेशान कर रही है...
कल ही तो उसने किचन की सफ़ेद दीवार पर अपनी सूनी माँग की तरह लकीर बनाती चींटियों को भगाई थी दीवार पर अंगुलियों सेठोकते हुए ...
दीवार पर औरओवेन के इर्द-गिर्द स्प्रे भी किया था उसने ...ताकि वे दुबारा ना आएं ...
वह इन छोटी –छोटी निरीह चींटियों को मारना नहीं चाहती ...आखिर अन्य जीव-जंतुओं की तरह उन्हें भी अपना भोजन तलाशने का अधिकार है अगर उन्हें पता होता कि जिसे वे अपना भोजन समझ रही हैं वह किसी दूसरे का है ,तो फिर चींटियाँ क्यों कहलाती ...
शायद कुदरत ने उन्हें ऐसी समझ नहीं दी है पराई वस्तु पर अपना हक़ न जमाने की समझ उनमें होने के बावजूद अगर ऐसी ‘कृत्य’ करती तो उन्हें ज़रूर गुनाहग़ार माना जाता और इसके लिए कोई-ना-कोई सज़ा मुक़रर्र की जाती....
आज फिर अचानक अपनी खुली पीठ पर किसी मर्द की खुरदरी और सख्त अंगुलियों वाली बड़ी चींटी के रेंगने के एहसास से वह बुरी तरह चिहुंक गई...
इस बड़ी चींटी से वह भयभीत हो जाती है उसका डंक बेहद पीड़ादायक होता है ऐसी चींटियों के प्रति नफरत का भाव उसमें हमेशा से रहा है ….
पीठ पर रेंगती बड़ी चींटी अपने पैरों से डंक की धार तेज़ कर ही रही थी कि उसने बड़ी तेज़ी और मजबूती के साथ अपने दाहिने हाथ को पीछे मोड़कर उसे अपनी हथेली के कब्ज़े में ले लिया ...
फिर उसने दांत किटकिटाते हुए बुरी तरह मसलकर किचन के बाहर फेंक दिया ...
चींटी को इस तरह मसले जाने से उसकी हथेली एक अज़ीब क़िस्म की चिपचिपाहट से भर गई ...चिपचिपाहट के एहसास से उसे उबकायी आने लगी ...तत्काल उसने वाश बेसिनमें अच्छी तरह हाथ धोया और अपनी साड़ी के आँचल से हाथ पोंछती हुई बच्चों के स्टडी रूममें चली आई...
“मम्मा.... बड़े पापा आए थे अभी –अभी….
कहां चले गए इतनी ज़ल्दी...
“ हमने चींटी को मसल दिया बेटे……
और कभी नहीं आएंगे....
अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे आज खुद मे अजीब सा साहस महसूस हो रहा था ....
आज उसने एक लक्ष्मण रेखा खींच दी थी अपने और अपने बडे जेठ के बीच मे ....जिसमें आजतक वो एक पिता का रुप देखती रही थी मगर वो अक्सर उन चीटियों की भांति उसके शरीर पर रेंगने की कोशिश करते थे...
आज उसने वो स्प्रे किया जिसके चलते अब वो चीटियां रुपी दानव वहां कभी नही आएगी......
एक दोस्त की सुंदर रचना
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