एक दिन सुबह बेटे ने माँ के हाथ मे सफेद दाग देखा और बोला, "अरे ये क्या हो गया कल डॉक्टर के पास चलते है
डाक्टर बोले," ये तो कुष्ठ रोग की शुरुआत लग रही है..
अब बेटा समाज के डर के मारे सोचने लगा कि इससे पहले कि ये ज्यादा बढ़े, इन्हें कुष्ठ आश्रम छोड़ आना चाहिए...और एक दिन माँ को आश्रम पहुचा दिया और छोड़ कर आ गए...
कुछ दिन बाद समाज, मोहल्ले और रिश्तेदारों को खबर कर दी कि बनारस गयी थी, गंगा में बह गई और पेपर में उनका नाम और फ़ोटो छपवा कर सबने श्रद्धांजली दे दी
आश्रम में बेटे का पता तो था ही, एक दिन घर मे पत्र आया आपकी माँ एकदम स्वस्थ है सिर्फ चरख है आप उन्हें घर ले जा सकते है अब नवीन सकते में थे क्या करूँ, सबको तो मैंने कह दिया माँ का स्वर्गवास हो गया। फिर किसी तरह घर मे एक अंदर का कमरा उनके लिए तैयार किया कि उनको लाना तो पड़ेगा, आश्रम में क्या कहूंगा।
रात के समय जाकर माँ को घर लाया गया और उन्हें उस कमरे से निकलने मना कर दिया। कुछ दिन बीते, आधी रात को एक दिन घर मे नींद नही आने के कारण कुछ पत्रिका पलटना चाही तो उसमे से उन्हें एक पेपर की कटिंग मिली, जिसमे उनकी फोटो थी और उनको श्रद्धांजलि दी गयी थी, वो सकते में थी ये क्या हो गया, यही कारण है कि मुझे कमरे से निकलने की मनाही है।
दिल धिक्कार उठा जब मै सबके लिए मर चुकी हूं, तो मै यहां किसके लिए बैठी हूँ । बस आज फिर वही माँ गीता किसी को बिना बताए कुष्ठ आश्रम की ओर चल पड़ी, वहीं कुछ काम करूँगी सबकी सेवा करूँगी, बची जिंदगी कट ही जाएगी......लेकिन उससे पहले उस पत्रिका में और न्यूज पेपर मे स्वयं के जीवित होने की और उसी कुष्ठ आश्रम की अपने पते के रुप मे सभी को सूचना दूंगी ...जिस कलयुगी बेटे बहु ने उसे जीते जी श्रद्धांजली दी है वो भी समाज बिरादरी मे उन्हें उनके किए कुकर्मों पर श्रद्धांजली देगी....
निशब्द ब्रिजमोहन
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