"उसने बिना किसी सबूत के अपने ही देवर को चोर कह दिया और घर से निकाल दिया। दस साल बाद जब सफाई के दौरान एक पुराने कोट की जेब से वो 'सच्चाई' निकली, तो उस भाभी को समझ आया कि दुनिया की अदालत से तो बरी हुआ जा सकता है, पर अपने मन की अदालत उम्रकैद देती है..."
"भाभी, मैंने आपको उसी दिन माफ़ कर दिया था जब मैं घर से निकला था। क्योंकि मैं जानता था कि आप गुस्से में थीं। लेकिन..." विनोद रुका। "कानून की अदालत में तो सबूत मिलने पर इंसान बरी हो जाता है, लेकिन मन की अदालत में जब फैसला आता है न, तो वो बहुत देर कर देता है।"
सुमित्रा जी के घर में आज दिवाली की सफाई चल रही थी। पूरा घर अस्त-व्यस्त था। अलमारियां खाली की जा रही थीं, पुराने कपड़े छांटे जा रहे थे। 55 वर्षीय सुमित्रा जी थककर सोफे पर बैठ गईं। उनकी बहू, रश्मि, पुराने ट्रंक से सर्दियों के कपड़े निकाल रही थी।
"मम्मी जी, यह वाला ब्लैक कोट तो पापा जी का है न? इसे ड्राई क्लीन के लिए डाल दूं या किसी को दे दूं?" रश्मि ने एक पुराना बंदगला कोट हाथ में लेकर पूछा।
सुमित्रा जी की नज़र उस कोट पर पड़ी। एक अजीब सी सिहरन उनके शरीर में दौड़ गई। यह वही कोट था जो उनके पति, रमेश बाबू ने दस साल पहले अपने छोटे भाई, यानी सुमित्रा के देवर, विनोद की शादी में पहना था। उस शादी के बाद से यह कोट कभी नहीं निकला।
"इसे रहने दे रश्मि, इसे मैं देखूँगी," सुमित्रा जी ने कहा।
रश्मि ने कोट सोफे पर रख दिया। सुमित्रा जी ने कांपते हाथों से उस कोट को उठाया। उसकी जेबें टटोलने लगीं, शायद कोई पुराना नोट मिल जाए। जैसे ही उन्होंने अंदर वाली गुप्त जेब (Inner Pocket) में हाथ डाला, उनकी उंगलियां किसी ठंडी धातु से टकराईं।
उन्होंने वो चीज़ बाहर निकाली।
अगले ही पल, सुमित्रा जी के गले से एक चीख निकली और वो चीज़ उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।
वह एक सोने का भारी हार था। नौलखा हार।
रश्मि दौड़कर आई। "क्या हुआ मम्मी जी? यह... यह हार तो..."
रश्मि को याद नहीं था, लेकिन सुमित्रा जी की आँखों के सामने दस साल पुराना वो मंजर किसी फिल्म की तरह चलने लगा।
दस साल पहले:
घर में विनोद (सुमित्रा का देवर) की शादी की तैयारियां चल रही थीं। विनोद उस वक्त आर्थिक रूप से थोड़ा तंग था। उसने अपनी छोटी सी दुकान शुरू करने के लिए बड़े भाई रमेश से 2 लाख रुपये मांगे थे। सुमित्रा जी को यह पसंद नहीं था। उन्हें लगता था कि विनोद पैसे नहीं लौटा पाएगा।
शादी वाले दिन, सुमित्रा जी तैयार हो रही थीं। उन्होंने अपना यह पुश्तैनी हार पहनने के लिए निकाला था। लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें लगा कि भीड़भाड़ में हार गिर सकता है, इसलिए उन्होंने उसे वापस रख दिया।
अगले दिन, जब शादी का शोर थमा, तो सुमित्रा जी ने अपनी अलमारी खोली। हार गायब था।
कोहराम मच गया। घर में सिर्फ घर के लोग थे। नौकरों की तलाशी ली गई, कुछ नहीं मिला। सुमित्रा जी का शक सीधा विनोद पर गया।
"विनोद के अलावा और कौन ले सकता है?" सुमित्रा जी ने रमेश बाबू से कहा था। "उसे पैसों की सख्त ज़रूरत थी। मैंने मना कर दिया था, तो उसने बदला लेने के लिए या अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए चोरी की होगी।"
"सुमित्रा, होश में तो हो? वो मेरा भाई है," रमेश बाबू ने समझाया था।
"भाई है तो क्या हुआ? गरीबी इंसान की नीयत बदल देती है," सुमित्रा जी चिल्लाई थीं।
बात इतनी बढ़ी कि पंचायत बुलाने की नौबत आ गई। विनोद ने रोते हुए कसम खाई, "भाभी, मैंने आपके हार को हाथ तक नहीं लगाया। आप मेरी माँ समान हैं।"
लेकिन सुमित्रा जी के दिमाग में शक का ज़हर घुल चुका था। उन्होंने सबके सामने विनोद से कहा, "अगर तू चोर नहीं है, तो अपनी अटैची की तलाशी दे।"
विनोद का स्वाभिमान उस दिन तार-तार हो गया था। उसने अपनी अटैची पलट दी थी। उसमें से कुछ नहीं मिला। लेकिन सुमित्रा जी ने तंज कसा, "कहीं बाहर छिपा आया होगा।"
उस दिन विनोद ने अपनी पगड़ी उतारी, बड़े भाई के चरणों में रखी और कहा, "भैया, भाभी का जेवर नहीं मिला, लेकिन आज मेरा भाई मर गया। जिस घर में मेरी ईमानदारी पर शक किया गया, वहाँ मैं एक पल नहीं रहूँगा।"
विनोद अपनी नई-नवेली दुल्हन को लेकर उसी वक्त घर से निकल गया। रमेश बाबू ने रोकने की कोशिश की, पर सुमित्रा जी ने पल्लू से मुंह फेर लिया।
उसके बाद दस साल बीत गए। विनोद ने कभी पलटकर नहीं देखा। सुना था कि वह शहर चला गया, बहुत मेहनत की और अब एक बड़ा व्यापारी बन गया है। रमेश बाबू कई बार उससे मिलने गए, लेकिन विनोद ने उनसे बात तो की, पर घर आने से मना कर दिया।
वर्तमान:
सुमित्रा जी फर्श पर पड़े उस हार को घूर रही थीं। उन्हें याद आया कि शादी वाले दिन हड़बड़ी में उन्होंने यह हार अपनी अलमारी में रखने के बजाय, रमेश बाबू के कोट की अंदरूनी जेब में छिपा दिया था ताकि सुरक्षित रहे। और फिर शादी की भागदौड़ में वो यह बात पूरी तरह भूल गईं। बाद में जब हार नहीं मिला, तो उन्होंने अपनी भूल का इल्जाम विनोद के माथे मढ़ दिया।
"हे भगवान! मैंने यह क्या अनर्थ कर दिया?" सुमित्रा जी फूट-फूट कर रोने लगीं। "मैंने एक बेगुनाह को चोर बना दिया। मैंने अपने पति से उनका भाई छीन लिया। रश्मि... रश्मि, मैं पापिनी हूँ।"
शाम को जब रमेश बाबू घर आए, तो उन्होंने सुमित्रा जी को बदहवास हालत में पाया। मेज पर वो हार रखा था। रमेश बाबू सब समझ गए। वो कुछ नहीं बोले, बस एक कुर्सी खींचकर बैठ गए और छत को घूरने लगे।
"रमेश जी, मुझे मारिये, मुझे घर से निकाल दीजिये," सुमित्रा जी उनके पैरों में गिर पड़ीं। "चलो, अभी चलो विनोद के पास। मैं उसके पैर पकड़कर माफी मांगूंगी। मैं उसे घर वापस लाऊंगी।"
रमेश बाबू ने ठंडी आवाज़ में कहा, "हार तो मिल गया सुमित्रा, लेकिन वो दस साल कौन लौटाएगा? वो अपमान, वो आंसू, जो उसने पिये थे, उन्हें कैसे वापस लाओगी?"
फिर भी, दोनों ने फैसला किया कि वे विनोद के पास जाएंगे।
अगले दिन वे विनोद के शहर, उसके आलीशान बंगले पर पहुँचे। विनोद अब बहुत बड़ा आदमी बन गया था। जब उसने भैया-भाभी को देखा, तो वह चौंका, लेकिन उसने पुराना अपमान याद नहीं रखा। उसने झुककर पैर छुए।
सुमित्रा जी, विनोद को देखते ही रो पड़ीं। उन्होंने कांपते हाथों से वो हार निकाला और विनोद के सामने रख दिया।
"लल्ला... मुझे माफ़ कर दे," सुमित्रा जी हिचकियों के बीच बोलीं। "मैंने तुझ पर कलंक लगाया था। यह हार... यह हार कोट की जेब में था। तू निर्दोष था, और मैं... मैं दोषी हूँ।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। विनोद की पत्नी भी वहां खड़ी थी।
विनोद ने उस हार को देखा। फिर उसने धीरे से उसे वापस सुमित्रा जी के हाथों में रख दिया।
"भाभी," विनोद की आवाज़ शांत थी, बहुत शांत। "आप यह हार ले आई हैं? इसकी अब क्या ज़रूरत है?"
"ज़रूरत है बेटा," सुमित्रा जी बोलीं। "मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही है। तू मुझे सजा दे। गाली दे, लेकिन मुझे माफ़ कर दे।"
विनोद ने एक गहरी सांस ली।
"भाभी, मैंने आपको उसी दिन माफ़ कर दिया था जब मैं घर से निकला था। क्योंकि मैं जानता था कि आप गुस्से में थीं। लेकिन..." विनोद रुका। "कानून की अदालत में तो सबूत मिलने पर इंसान बरी हो जाता है, लेकिन मन की अदालत में जब फैसला आता है न, तो वो बहुत देर कर देता है।"
विनोद ने आगे कहा, "यह हार आपको वापस मिल गया, आपकी तिजोरी भर गई। लेकिन मेरे दिल में जो जगह खाली हुई थी, वो अब नहीं भर सकती। मैं आपसे नराज़ नहीं हूँ, पर अब वो 'अपनापन' नहीं रहा। आप लोग बैठिये, चाय पीजिये। लेकिन अब हम 'रिश्तेदार' हैं, 'परिवार' नहीं।"
सुमित्रा जी समझ गईं कि काँच में पड़ी दरार सोने के तारों से भी नहीं भरती। वो हार, जो कभी उनकी शान था, आज उनके गले का फंदा बन गया था। विनोद ने उन्हें इज़्ज़त दी, चाय पिलाई, गाड़ी तक छोड़ने आया, लेकिन एक बार भी नहीं कहा कि "घर कब चलोगे भाभी?"
वापस लौटते वक्त कार में सुमित्रा जी उस हार को मुट्ठी में भींचे बैठी थीं। वो हार उन्हें काट रहा था।
रमेश बाबू ने गाड़ी चलाते हुए कहा, "देख लिया? सबसे बड़ा न्यायालय हमारा मन होता है। विनोद ने तुम्हें कुछ नहीं कहा, लेकिन तुम्हारी अपनी अंतरात्मा अब तुम्हें ताउम्र कचोटती रहेगी कि तुमने एक 'शक' के लिए एक 'भाई' खो दिया।"
सुमित्रा जी ने खिड़की से बाहर देखा। उन्हें एहसास हुआ कि इंसान को अपनी जुबान और अपने विचारों पर ताला उस तिजोरी से ज्यादा मज़बूत रखना चाहिए जिसमें वो गहने रखता है। क्योंकि गहने खो जाएं तो दोबारा मिल सकते हैं (जैसे आज मिल गया), लेकिन खोया हुआ विश्वास और रिश्ता कभी वापस नहीं मिलता।
उस रात सुमित्रा जी ने वो हार अपनी बहू रश्मि को दे दिया और कहा, "इसे ले जा, और मेरी नज़रों से दूर कर दे। और याद रखना रश्मि, कभी किसी पर बिना सबूत के उंगली मत उठाना। क्योंकि जब उंगली उठती है, तो रिश्ता गिर जाता है।"
कहानी का सार:
शक एक ऐसा दीमक है जो मज़बूत से मज़बूत रिश्तों की बुनियाद को खोखला कर देता है। गुस्से में कहे गए शब्द और बिना सोचे-समझे लगाए गए आरोप एक ऐसा घाव देते हैं जो समय के साथ भर तो जाता है, लेकिन उसका निशान हमेशा बाकी रहता है। अपनी अंतरात्मा को साफ रखिये, क्योंकि दुनिया से झूठ बोलना आसान है, लेकिन खुद से नज़रें मिलाना सबसे मुश्किल।
सवाल आपके लिए:
अगर आप विनोद की जगह होते, तो क्या दस साल बाद सच्चाई पता चलने पर भाभी के साथ वापस पहले जैसा रिश्ता बना पाते? या जो विनोद ने किया, वही सही था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
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