चेहरे के पीछे चेहरा

 "पिता की मौत के बाद जिस चाचा को बेटा 'भगवान' समझकर पूज रहा था और अपनी ही माँ को 'दुश्मन' मान बैठा था, एक फोन कॉल ने उस बेटे के पैरों तले से ज़मीन खींच ली। पढ़िए धोखे और ममता की यह रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी..."


आलोक के पिता, रमाकांत जी के निधन को अभी मुश्किल से तेरह दिन ही हुए थे। घर का माहौल गमगीन था। आलोक अभी सिर्फ 22 साल का था और कॉलेज के आखिरी साल में था। पिता का साया उठते ही उसे लगा जैसे वह भरी दुनिया में अकेला हो गया है। इस मुश्किल घड़ी में अगर कोई ढाल बनकर खड़ा था, तो वो थे—महेश अंकल।

महेश अंकल, रमाकांत जी के बचपन के दोस्त और बिजनेस पार्टनर थे। सुबह से शाम तक वो आलोक के घर पर ही रहते। शमशान घाट से लेकर रस्मों-रिवाज़ तक, सारा जिम्मा उन्होंने अपने कंधों पर ले रखा था।

"बेटा आलोक, तू चिंता मत कर," महेश अंकल अक्सर उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते, "तेरा बाप गया है तो क्या हुआ? मैं तो ज़िंदा हूँ। तुझे और भाभी जी को कभी कोई आंच नहीं आने दूंगा।"

आलोक की आँखों में आँसू आ जाते। उसे लगता कि भगवान ने पिता छीने तो महेश अंकल जैसा फरिश्ता भेज दिया।

दूसरी तरफ, आलोक की माँ, सावित्री देवी, का व्यवहार एकदम उलट था। जब भी महेश अंकल घर आते, सावित्री देवी का चेहरा सख्त हो जाता। वो आलोक को बार-बार महेश से दूर रहने की हिदायत देतीं।

एक दिन महेश अंकल कुछ कागज़ात लेकर आए।

"आलोक बेटा," उन्होंने बहुत प्यार से कहा, "तेरे पापा ने बिजनेस में काफी लोन लिया हुआ था। लेनदार परेशान कर रहे हैं। अगर यह फैक्ट्री हमने अभी नहीं बेची या कुछ गिरवी नहीं रखा, तो घर भी हाथ से निकल जाएगा। तू बस इन पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) के पेपर्स पर साइन कर दे, बाकी मैं संभाल लूँगा। मैं नहीं चाहता कि तुम लोग सड़क पर आओ।"

आलोक पेन उठाकर साइन करने ही वाला था कि सावित्री देवी ने झपट्टा मारकर वो कागज़ छीन लिए।

"खबरदार जो साइन किए!" सावित्री देवी चिल्लाईं। "महेश भाई साहब, आप अभी के अभी मेरे घर से निकल जाइये।"

आलोक को बहुत गुस्सा आया। उसने माँ के हाथ से कागज़ वापस लेने की कोशिश की।

"माँ! आप पागल हो गई हैं क्या? महेश अंकल हमारी मदद कर रहे हैं। पापा के बाद वही तो हैं हमारे पास। आप हमेशा उन पर शक करती हैं।"

सावित्री देवी ने आलोक को एक तमाचा जड़ दिया। "तुझे दुनिया की समझ नहीं है आलोक! जिसे तू मसीहा समझ रहा है, वो आस्तीन का सांप है।"

आलोक ने गाल पर हाथ रखा और गुस्से में कहा, "बस माँ! मुझे आपकी दकियानूसी बातें नहीं सुननी। पापा सही कहते थे, आप कभी किसी का भला नहीं सोच सकतीं।"

आलोक ने गुस्से में दरवाजा बंद कर लिया। महेश अंकल ने दुखी होने का नाटक किया और कहा, "कोई बात नहीं बेटा, भाभी जी अभी सदमे में हैं। मैं कल आऊंगा।"

उस रात आलोक को नींद नहीं आई। उसे अपनी माँ के व्यवहार पर बहुत शर्मिंदगी हो रही थी। उसे लगा कि उसे महेश अंकल से माफ़ी मांगनी चाहिए। रात के करीब 11 बज रहे थे। आलोक ने सोचा कि अंकल के घर जाकर उन्हें मना लूं, उनका घर पास ही था।

आलोक जब महेश अंकल के घर पहुंचा, तो देखा कि ड्राइंग रूम की खिड़की खुली थी और वो फोन पर किसी से बात कर रहे थे। आलोक ने सोचा कि सरप्राइज दूंगा, इसलिए वो चुपचाप खिड़की के पास खड़ा हो गया।

तभी उसे महेश अंकल की आवाज़ सुनाई दी। वो ज़ोर-ज़ोर से हंस रहे थे।

"अरे यार, काम तो हो ही गया था। वो तो ऐन मौके पर उस बुढ़िया सावित्री ने टांग अड़ा दी। वरना आज उस मूर्ख लड़के से पूरी प्रॉपर्टी और फैक्ट्री अपने नाम करवा लेता। रमाकांत तो मर गया, अब उसका बेटा क्या चीज़ है।"

आलोक के पैर ज़मीन में गढ़ गए।

महेश अंकल आगे बोल रहे थे, "चिंता मत कर। लड़का मेरे मुट्ठी में है। वो अपनी माँ से नफरत करता है। कल इमोशनल ड्रामा थोड़ा और बढ़ा दूंगा। एक बार साइन मिल जाएं, फिर उस माँ-बेटे को धक्के मारकर घर से निकाल दूंगा। करोड़ों की फैक्ट्री है भाई, ऐसे कैसे छोड़ दूं?"

आलोक का दिमाग सुन्न हो गया। जिसे वो 'भगवान' समझ रहा था, वो 'शैतान' निकला। और जिस माँ को वो 'दुश्मन' और 'शक करने वाली' समझ रहा था, वो असल में उसकी सुरक्षा कवच थी। उसे वो कहावत याद आ गई—"ज़िन्दगी में.... कुछ सीखो या ना सीखो, मगर लोगों को पहचानना ज़रुर सीखो क्योंकि लोग जैसे दिखते हैं वो वैसे होते नहीं हैं।"

आलोक उल्टे पैर वहां से भागा। उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह रही थी, लेकिन ये आंसू दुख के नहीं, पश्चाताप के थे।

घर पहुँचकर उसने देखा कि माँ अभी भी जगी हुई हैं और भगवान के मंदिर के सामने बैठी रो रही हैं। "हे ईश्वर, मेरे बच्चे की रक्षा करना। वो भोला है, उसे दुनिया की चाल समझ नहीं आती।"

आलोक दौड़कर गया और माँ के चरणों में गिर पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगा।

"माँ... मुझे माफ़ कर दो माँ। मैं अंधा हो गया था। मैंने एक बाहरी इंसान के लिए आपका अपमान किया। माँ, वो महेश अंकल तो..."

सावित्री देवी ने आलोक को उठाया और सीने से लगा लिया।

"मुझे पता है बेटा। तेरे पापा ने मरते वक़्त मुझे बताया था कि महेश की नज़र हमारी दौलत पर है। लेकिन मैं डरती थी कि तू यकीन नहीं करेगा। दुनिया में मीठी छुरी चलाने वालों की कमी नहीं है बेटा, लेकिन माँ की कड़वी दवा ही जान बचाती है।"

अगले दिन जब महेश अंकल फिर से वो कागज़ लेकर आए और अपनी मीठी बातों का जाल बिछाने लगे, तो आलोक ने वो कागज़ लिए और उनके सामने ही फाड़कर हवा में उड़ा दिए।

"क्या हुआ बेटा?" महेश अंकल सकपका गए।

"कुछ नहीं अंकल," आलोक ने दरवाज़ा खोलते हुए कड़क आवाज़ में कहा। "बस मुझे 'साइन' करना नहीं, 'इंसान' को पढ़ना आ गया है। आप जा सकते हैं, और दोबारा इस चौखट पर मताइयेगा, वरना पुलिस को वो रिकॉर्डिंग सुनानी पड़ेगी जो मैंने कल रात आपकी खिड़की के बाहर से की थी।"

महेश अंकल का चेहरा पीला पड़ गया। वो चुपचाप सिर झुकाकर चले गए।

उस दिन आलोक ने सीखा कि हर मुस्कुराता चेहरा दोस्त नहीं होता और हर टोकने वाली माँ दुश्मन नहीं होती। दुनिया का सबसे बड़ा सच यही है कि अपना खून, अपना ही होता है।


कहानी का सार:

हम अक्सर बाहर वालों की चिकनी-चुपड़ी बातों में आकर अपने घर के बुजुर्गों और माता-पिता की सलाह को ठुकरा देते हैं। हमें लगता है कि वे हमें रोक रहे हैं, जबकि असल में वे हमें उन गड्ढों से बचा रहे होते हैं जो हम अपनी अनुभवहीनता के कारण देख नहीं पाते। पारखी नज़र रखिये, क्योंकि मुखौटे बहुत सुंदर होते हैं, लेकिन उनके पीछे के चेहरे अक्सर भयानक होते हैं।

सवाल आपके लिए:

क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि जिस पर आपने सबसे ज्यादा भरोसा किया, उसी ने आपको धोखा दिया? और जिसने आपको रोका-टोका, अंत में वही सही साबित हुआ? अपने अनुभव कमेंट में जरूर शेयर करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आंखें खोलीं, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो जीवन की सच्चाई बयां करती ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को अभी फ़ॉलो करें। धन्यवाद!


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ