अनुराग क्या हुआ सुबह से देख रहा हूँ ऑफिस में किसी से बात नहीं कर रहे हो
अनुराग ने हल्के से सिर घुमा दिया, “कुछ नहीं यार… बस… मन ठीक नहीं है।”
“रोहन, मुझे घर… घर जैसा नहीं लगता,” अनुराग की आवाज़ भर्रा गई, “मैं ऑफिस में थकता हूँ, फिर भी घर जाने से डर लगता है। वहाँ जाते ही लगता है—अब किसकी किससे भिड़ंत होगी।”
रोहन ने चौंककर देखा, “अरे… तेरी तो शादी को ढाई साल हुए हैं। प्रिया से क्या हुआ? वो तो काफी समझदार लगती थी।”
अनुराग ने लंबी साँस ली, “समझदार है… पर माँ के साथ नहीं रहना चाहती। माँ को लगता है, बहू ने घर की रौनक छीनी। प्रिया को लगता है, माँ हर बात में टोकती हैं। और मैं… मैं दोनों तरफ से खिंच रहा हूँ।”
“टोकती हैं मतलब?” रोहन ने पूछा।
“जैसे… प्रिया को मॉडर्न किचन पसंद है। माँ को लगता है कि ‘हमारे टाइम में’ ये सब फिजूलखर्ची है। माँ सुबह पूजा करती हैं, प्रिया को ऑफिस के लिए जल्दी निकलना होता है—तो माँ कहती हैं, ‘घर की बहू होकर पूजा में एक दिया भी नहीं जलाती।’ प्रिया कहती है, ‘मैं रोज़ ऑफिस जाती हूँ, मैं थक जाती हूँ।’”
रोहन ने धीरे से कहा, “और तू?”
अनुराग आँखें झुकाकर बोला, “मैं शांति के लिए माँ को सुना देता हूँ। हाँ, वही… क्योंकि माँ मान जाती है। प्रिया के सामने कुछ बोल दूँ तो वो रोने लगती है कि ‘आप हमेशा अपनी माँ का पक्ष लेते हैं।’ और माँ के सामने प्रिया के लिए बोल दूँ तो माँ का चेहरा उतर जाता है… वो चुप हो जाती है, और उसकी चुप्पी सबसे भारी होती है।”
रोहन ने कप रख दिया। उसकी आँखें गंभीर हो गईं। “अनुराग, एक बात बताऊँ? तू जिसे ‘शांति’ समझ रहा है, वो असल में ‘गलत समझौता’ है।”
अनुराग चौंका, “मतलब?”
“मतलब यह,” रोहन ने साफ शब्दों में कहा, “जब तू अपनी माँ को झिड़क देता है, माँ को चोट लगती है। और प्रिया को संदेश मिलता है कि ‘देखो, मैं रोऊँगी तो बच्चा माँ को डाँट देगा।’ फिर प्रिया का मन और खुल जाता है। और माँ का मन और बंद। यह चक्र चलता रहता है।”
अनुराग की आँखें नम हो गईं। “पर मैं क्या करूँ? मैं लड़ नहीं सकता। मैं बस चाहता हूँ घर में शांति रहे।”
रोहन ने उसे ध्यान से देखा। “शांति बनाने के लिए पहले न्याय करना पड़ता है। और न्याय का मतलब है—सीधा बोलना। बिना चीखे। बिना किसी को छोटा किए।”
अनुराग ने धीमे से पूछा, “कैसे?”
रोहन ने अपनी उँगलियों पर गिनना शुरू किया, “तीन बातें। पहली—तू अपनी माँ को ‘डाँटकर’ नहीं, ‘समझाकर’ बात करेगा। दूसरी—प्रिया को भी ये बताना पड़ेगा कि सम्मान ‘कंडीशन’ पर नहीं होता। तीसरी—तू अपने ऊपर की जिम्मेदारी वापस ले। घर का काम, फैसले, भावनाएँ—सब माँ और बीवी के बीच हवा में मत लटकने दे।”
अनुराग ने माथा पकड़ा, “पर माँ तो कहती हैं—‘बहू को घर संभालना चाहिए।’ प्रिया कहती है—‘मुझे करियर भी देखना है।’”
रोहन मुस्कुराया, “तो बीच का रास्ता बना। पति का काम यही है। तू ‘मैनेज’ नहीं करेगा तो कौन करेगा?”
उस शाम अनुराग घर लौटा तो उसने कुछ अलग किया। वह सीधे कमरे में नहीं गया। माँ रसोई में थीं, प्रिया फोन पर किसी से बात कर रही थी। उसने आवाज़ लगाई, “माँ, प्रिया… दोनों इधर आओ, पाँच मिनट बात करनी है।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा—मानो कोई नया तूफान आने वाला हो।
अनुराग ने बहुत शांत स्वर में कहा, “मैं रोज़ देख रहा हूँ कि हम तीनों एक-दूसरे को समझने के बजाय जज कर रहे हैं। माँ, आप प्रिया की हर बात को ‘संस्कार’ से जोड़ देती हैं। प्रिया, तुम हर टोक को ‘कंट्रोल’ समझ लेती हो। और मैं… मैं दोनों को खुश करने के चक्कर में किसी को भी ठीक से नहीं समझ पा रहा।”
माँ ने तमतमाकर कहा, “तो अब तू भी मुझे समझाएगा?”
अनुराग ने नरम होकर कहा, “माँ, मैं समझा नहीं रहा… मैं सीख रहा हूँ। मैं आपका बेटा हूँ, और प्रिया मेरा जीवन है। दोनों में से किसी को भी चोट नहीं लगनी चाहिए।”
प्रिया ने धीमे से कहा, “पर आपकी माँ… हर बात में…”
अनुराग ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही कहा, “और मैं भी हर बात में गलत रहा हूँ। क्योंकि मैंने गुस्से में माँ को बोले हैं। आज मैं साफ कह रहा हूँ—माँ, मैं आपसे ऊँची आवाज़ में बात नहीं करूंगा। और प्रिया, मैं तुम्हारी हर शिकायत पर माँ को कटघरे में नहीं खड़ा करूंगा।”
माँ कुछ बोलने लगीं, पर अनुराग ने जोड़ दिया, “हम एक नियम बनाते हैं। पूजा आप करिए, माँ। प्रिया ऑफिस के दिन सुबह नहीं बैठ पाएगी, तो शाम को अगर वह घर आए तो एक अगरबत्ती जला देगी—सिर्फ सम्मान के लिए, मजबूरी के लिए नहीं।”
प्रिया ने धीरे से सिर हिलाया।
“और किचन के फैसले,” अनुराग आगे बोला, “हम तीनों मिलकर करेंगे। माँ, आपकी पुरानी पद्धति की चीज़ें भी रहेंगी, और प्रिया की सुविधा भी। ये ‘मेरा’ या ‘आपका’ नहीं होगा—ये ‘हमारा’ होगा।”
माँ का चेहरा थोड़ा नरम पड़ा। “और घर का काम?”
अनुराग ने पहले से तैयार जवाब दिया, “काम बाँटेंगे। मैं भी। हफ्ते में दो दिन मैं सब्जी काटूंगा, और रविवार को मैं खाना बनाऊँगा। प्रिया को भी लगेगा कि घर सिर्फ़ उसकी जिम्मेदारी है नहीं, और माँ को भी लगेगा कि बहू अकेली नहीं है।”
प्रिया की आँखों में हल्की चमक आई। “उतना तो… आप कर भी लोगे?”
अनुराग हँसा, “पहले दो बार जलेगा, तीसरी बार खाया जाएगा।”
माँ के होंठों पर भी मुस्कान आ गई—बहुत दिनों बाद।
अगले कुछ हफ्तों में घर का माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा। अनुराग ने जब भी प्रिया को माँ के बारे में तीखी बात करते सुना, वह बस इतना कह देता, “प्रिया, बात पर भी ध्यान दो और लहजे पर भी।” और माँ जब कभी पुराने तानों की तरफ जातीं, अनुराग कह देता, “माँ, प्रिया हमारी घर की बहू है, पर सबसे पहले वो हमारे घर की लड़की है—इज्जत से बात करेंगे।”
एक दिन प्रिया ने खुद माँ से पूछा, “माँ… आपको क्या पसंद है खाने में? मुझे सच में सीखना है।”
माँ ने आश्चर्य से देखा। फिर बोलीं, “मूंग की दाल और… तेरी जैसी चाय।”
प्रिया हँस पड़ी, “तो कल मूंग की दाल। और चाय… अभी बनाती हूँ।”
अनुराग बाहर से यह सब सुन रहा था। उसके गले में कुछ अटक गया—लेकिन इस बार वह दुख नहीं था। यह राहत थी।
कुछ महीनों बाद प्रिया गर्भवती हुई। अब शिकायतें बदलीं। पहले “माँ टोकती थी अब “माँ ज्यादा लाड़ कर रही हैं” हो गया। माँ कहतीं, “बहू, बैठ जा, मैं कर दूँगी।” प्रिया कहती, “माँ, मैं कमजोर नहीं हूँ।” और अनुराग बीच में हँसता, “दोनों की टेंशन मेरी है—एक काम नहीं करने देतीं, दूसरी आराम नहीं करने देती।”
घर में हँसी लौट आई थी।
एक रात रोहन का मैसेज आया—“कैसा चल रहा है?”
अनुराग ने जवाब लिखा—“पहली बार घर जाने से डर नहीं लगता। अब लगता है घर मेरी ताकत है।”
रोहन ने रिप्लाई किया—“बस यही चाहिए था।”
अनुराग ने फोन रखकर माँ के कमरे की तरफ देखा। माँ सो रही थीं। फिर प्रिया की तरफ देखा—वह बच्चे के लिए छोटे-छोटे कपड़े देख रही थी। अनुराग के मन में एक बात साफ हो गई—
रिश्ते टूटते नहीं…
उन्हें तोड़ देती है हमारी चुप्पी, हमारा डर, और हमारा गलत तरीका।
और जब आदमी एक बार सचमुच “बीच का पुल” बन जाए, तो परिवार नदी नहीं रहता—किनारा बन जाता है।
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