कमलाबाई पचपन की हो चुकी थीं। घर-परिवार, रिश्तेदारी और मोहल्ले में उनकी अच्छी-खासी धाक थी। उनका स्वभाव सीधा-सादा कम और अक्खड़पन ज्यादा था। वह अक्सर अपनी सहेलियों के बीच बैठकर बड़ी शान से कहतीं—
“अरे ये समानता-वमानता का नया झोल क्या है! औरत-औरत रहे, मर्द-मर्द रहे। बराबरी कभी होवे है भला? मैंने तो अपने बेटे अरुण को मर्दों की तरह पाला है। मजाल है, पानी का गिलास भी अपने हाथ से ले ले! और बहू… बहू को तो मेरे सामने चूँ भी करने की इजाजत ना है। सारा घर उसी का है, उसी की जिम्मेदारी है।”
पड़ोसन सीता ने हंसकर पूछा—
“तो बहन, सारे घर का काम बहू अकेली करे है?”
कमलाबाई ने अकड़ भरे स्वर में उत्तर दिया—
“सुबह-सुबह मैं थोड़ा हाथ बटा दूँ तो बटा दूँ, वरना शाम को तो मेरा समय मंदिर में बीतता है। फिर बहू जाने और उसका काम। घर की लक्ष्मी वही है, घर का बोझ वही उठाए। मर्द का काम सिर्फ कमाना है और औरत का काम घर चलाना।”
मोहल्ले की औरतें चुप हो जातीं। कमलाबाई की बातों से असहमति तो थी, पर सामने कोई कुछ कहने का साहस नहीं जुटा पाता।
कमलाबाई का इकलौता बेटा अरुण एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर था। सुलझा हुआ, समझदार और पढ़ाई में हमेशा अव्वल। अरुण की शादी हाल ही में रिया से हुई थी। रिया पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा लड़की थी। उसके विचार आधुनिक और सोच साफ थी।
शादी के शुरुआती दिनों में ही रिया समझ गई थी कि सास की सोच काफी पुरानी है। लेकिन उसे यह सुखद आश्चर्य भी हुआ कि उसका पति अरुण बिल्कुल विपरीत स्वभाव का है—संवेदनशील, सहयोगी और बराबरी में विश्वास रखने वाला।
एक दिन सुबह-सुबह, जब सूरज की पहली किरणें खिड़की से झांक रही थीं, अरुण दो कप चाय लेकर बेडरूम में आया। उसने धीरे से रिया को उठाया।
“रिया… उठो, चाय ठंडी हो जाएगी। तुम बिना चाय के तो नींद से बाहर नहीं आती।”
रिया ने आधी बंद आंखों से प्याला थामा और हंसते हुए बोली—
“अगर तुम्हें मम्मी ने देख लिया तो गजब हो जाएगा।”
अरुण ने मजाक में आंख दबाई—
“तो उन्हें मत बताना। वैसे भी मम्मी को लगता है कि मैं पानी का गिलास तक खुद नहीं ले सकता। चलो, आज भी उनका भ्रम बना रहने दो।”
रिया खिलखिला दी। यही उसका संबल था।
कुछ देर बाद पूरा परिवार नाश्ते के लिए बैठा। रिया गरम-गरम परांठे सेंक रही थी और प्लेट में सबको परोस रही थी।
कमलाबाई ने अचानक कहा—
“बहू, तू भी खा ले गरम। चल, मैं सेक देती हूँ।”
रिया थोड़ा चौंकी। लेकिन फिर मुस्कुराकर बोली—
“जी मम्मीजी।”
अरुण ने यह देखा और हल्की मुस्कान दबा ली। वह जानता था, मां का मन दोराहे पर अटका हुआ है—एक ओर पुरानी सोच और दूसरी ओर बहू की मेहनत।
नाश्ते के बाद जब अरुण ऑफिस के लिए निकलने लगा तो रिया ने उसे टिफिन पकड़ाया। कमलाबाई संतुष्ट होकर भीतर चली गईं।
तभी अरुण धीरे से रिया के कान में फुसफुसाया—
“जानू, शाम के खाने में कौन-सी सब्जी पैक करवा लाऊँ? जो तुम्हें पसंद हो।”
रिया शरमा गई और उसकी आंखों में चमक आ गई।
शाम को मंदिर से लौटकर कमलाबाई अपनी सहेलियों को फिर वही किस्सा सुनातीं—
“मेरी बहू चूँ तक नहीं कर सकती मेरे सामने। अरुण तो खुद कभी पानी भी नहीं उठाता। घर में मेरी ही चलती है।”
पर सच्चाई तो कुछ और थी। घर की असली तस्वीर यह थी कि अरुण हर काम में रिया का हाथ बंटाता। कभी सब्जी लाता, कभी चाय बनाता, तो कभी रात का खाना भी दोनों मिलकर पकाते।
रिया अक्सर कहती—
“अरुण, तुम इतना क्यों करते हो? लोग क्या कहेंगे?”
अरुण मुस्कुराकर जवाब देता—
“रिया, लोग तो हमेशा कुछ न कुछ कहेंगे। पर मुझे फर्क नहीं पड़ता। मुझे फर्क पड़ता है तुम्हें कैसा लगता है। हम बराबरी से काम करेंगे तो हमारा रिश्ता भी बराबरी पर खड़ा होगा।”
एक दिन मोहल्ले में किसी के यहां कीर्तन का कार्यक्रम था। रिया ऑफिस से थोड़ा देर से लौटी, इसलिए रात का खाना देर से बनने लगा। कमलाबाई नाराज़ हो उठीं।
“बहू, इतना समय हो गया। घर में मर्द भूखे बैठे रहें और औरत ऑफिस घूमती रहे, यह ठीक नहीं। घर संभालना तेरी जिम्मेदारी है।”
रिया चुपचाप काम करती रही। लेकिन अरुण से यह सब सहा न गया।
“मां, रिया भी नौकरी करती है। थक कर आती है। आप क्यों सोचती हैं कि घर सिर्फ औरत की जिम्मेदारी है? क्या मैं खाना नहीं बना सकता? क्या बर्तन धोना मेरा काम नहीं हो सकता?”
कमलाबाई भौंचक्की रह गईं।
“तू भी अब औरतों जैसी बातें करने लगा है!”
अरुण ने शांत स्वर में कहा—
“नहीं मां, मैं इंसान होने की बातें कर रहा हूँ। बराबरी की बातें। अगर बेटी होती तो आप कहतीं पढ़े-लिखे, नौकरी करो। और बहू से उम्मीद है कि वह सिर्फ रसोई में खपती रहे। यह न्याय नहीं है।”
कमलाबाई गुस्से में भीतर चली गईं।
समय बीतने के साथ, कमलाबाई ने कई बार देखा कि रिया और अरुण किस तरह घर को मिलकर संभालते हैं। एक दिन जब रिया बीमार हो गई, तब अरुण ने अकेले ही रसोई संभाली। गरम सूप बनाया, टिफिन तैयार किया और कपड़े तक धो दिए।
कमलाबाई ने यह सब देखा तो उनके मन में हलचल हुई।
“क्या मैंने सच में बेटे को कमजोर बना दिया? या वह असल में जिम्मेदार इंसान बन गया है?”
धीरे-धीरे उनकी सोच में दरारें पड़ने लगीं।
कुछ हफ्तों बाद कमलाबाई की सहेलियाँ फिर आंगन में जुटीं। हमेशा की तरह बातचीत चली—
“कमला, तूने तो अपने बेटे को बड़ा मर्दाना पाला है न?”
कमलाबाई कुछ पल चुप रहीं। फिर हल्की मुस्कान के साथ बोलीं—
“हाँ बहन, मैंने बेटे को जिम्मेदार इंसान बनाया है। अब वह बहू के साथ बराबरी से घर भी संभालता है और ऑफिस भी। असली बरकत इसी में है कि घर के काम और जिम्मेदारी सब मिलकर निभाएं। मर्द-औरत का फर्क नहीं, बस साथ निभाने की भावना हो।”
सहेलियाँ हैरानी से एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं।
कमलाबाई के शब्दों में पहली बार अक्खड़पन नहीं, बल्कि अनुभव की मिठास थी।
उस शाम अरुण और रिया बालकनी में बैठे थे। अरुण ने रिया से कहा—
“देखा, मां भी अब धीरे-धीरे बदल रही हैं।”
रिया ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“हाँ, क्योंकि उन्हें समझ आ गया कि बराबरी का मतलब लड़ाई नहीं, बल्कि रिश्तों में मजबूती है।”
दोनों ने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। घर के भीतर कमलाबाई मंदिर की घंटी बजा रही थीं, और बाहर आकाश में नई सुबह का संकेत देने वाला चांद चमक रहा था।
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