औक़ात का सवाल

 संध्या देवी अपने मोहल्ले में अपनी अकड़ और कटु वचनों के लिए जानी जाती थीं। उनकी जुबान पर तंज हमेशा तैयार रहते। अक्सर बहुओं की सजधज देखकर कह देतीं—

“अरे, देखो तो! मां-बाप के घर तो कुछ देखा नहीं और यहां आकर गहनों में लदी-फदी घूम रही है। भाग्य का छींका टूटना इसी को कहते हैं।”

आज भी उन्होंने यही बात कही। निशाना उनकी अपनी बहू नीलिमा थी। और पास बैठी बेटी माधवी, जो मायके आई हुई थी, ठहाके मारकर हंस पड़ी।

नीलिमा के कदम वहीं ठिठक गए। तभी कमरे से बाहर निकलते हुए उनके पति अजय बोले—
“अरे नीलिमा, जल्दी करो। हमें निकलना है। बारात निकलने वाली है। शुभम फोन पर दो बार नाराज़गी जता चुका है।”

नीलिमा ने चुपचाप सिर हिला दिया और अजय के पीछे-पीछे निकल गई।

पीछे रह गई संध्या देवी और माधवी।

“देखा मम्मी, कैसे घूरकर देख रही थी आपको।”
माधवी मुस्कुराई।

“घूरने दो। गलत तो मैंने कहा नहीं। मायके में तो ढंग के कपड़े भी नहीं देखे थे, और अब गहनों में लदी घूमती है। इंसान को अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए।”
संध्या देवी ने तंज कसते हुए कहा।

गाड़ी में बैठते ही नीलिमा खामोश हो गई। अजय ने देखा तो पूछा—
“क्या हुआ? अब तो सुबह तक तुम शुभम की शादी की तैयारियों में लगी थी, और अब इतनी चुप क्यों?”

“कुछ नहीं…” नीलिमा ने छोटा सा जवाब दिया।

“मम्मी ने कुछ कहा क्या?” अजय ने अनुमान लगाया।

नीलिमा की आंखें भर आईं।
“क्या कहेंगी? वही हमेशा की बातें। मैं गरीब घर से हूं, मैंने गहने-कपड़े नहीं देखे। और अब अगर सजी-धजी दिख जाऊं तो कहती हैं औकात भूल गई। मैं कोई भागकर नहीं आई थी। उन्हीं ने रिश्ता पक्का किया था।”

अजय ने उसे समझाया—
“छोड़ो नीलिमा, उनकी आदत है। हर बात में ताने देती हैं। हम शादी में जा रहे हैं, खुश रहो।”

नीलिमा ने धीरे से कहा—
“खुश रहूं कैसे? हर बार एहसान जता देती हैं कि उन्होंने गरीब घर की बहू को अपनाया है। और अब… औकात का ताना।”

अजय हंस पड़ा।
“तो क्या सोच रही हो?”

नीलिमा ने होंठ काटते हुए कहा—
“सोच रही हूं, एक दिन औकात दिखा ही दूं।”

अजय और नीलिमा की शादी को एक साल हो चुका था। अजय का परिवार उच्च-मध्यमवर्गीय था, जबकि नीलिमा का घर निम्न-मध्यमवर्गीय।

असल में संध्या देवी ने ही नीलिमा को एक शादी में देखा था। सांवली-सी, साधारण पहनावे में भी आकर्षक और सलीकेदार। उन्हें तुरंत पसंद आ गई। और फिर उन्होंने सोचा—
“घर में बहू आएगी तो दबकर रहेगी। गरीब घर की है, ज्यादा नखरे भी नहीं करेगी। वैसे भी आजकल अच्छे रिश्ते कहां मिलते हैं।”

शादी धूमधाम से हुई। लेकिन विवाह के कुछ ही महीनों बाद संध्या देवी की नजरें नीलिमा में कमियां ढूंढने लगीं। जब भी वह तैयार होकर बाहर जाती, संध्या देवी ताने देतीं।

नीलिमा ने शुरू-शुरू में सब सहा। लेकिन अब उसकी चुप्पी चिढ़ में बदल रही थी। उसने मन ही मन ठान लिया था कि वह जवाब देकर ही रहेगी।

समय बीता। अजय के मामा के बेटे की शादी तय हुई। शादी शहर में ही थी और पूरे परिवार को बुलावा आया।

संध्या देवी इस शादी को लेकर बेहद उत्साहित थीं। लगन-टीके से लेकर विदाई तक पूरा हफ्ता यहीं गुजरना था। उन्होंने खुद पार्लर जाकर तैयारियां कीं।

उस दिन जब सब घर से निकलने लगे, संध्या देवी ने पूछा—
“अरे बहू तैयार नहीं हुई क्या?”

“मम्मी, वो तैयार हो रही है। बस आती ही होगी।”
अजय ने कहा।

थोड़ी देर बाद नीलिमा कमरे से बाहर आई। उसने साधारण-सी साड़ी पहनी थी, हाथ में लाख की चूड़ियां, गले में हल्का-सा पेंडेंट और कानों में छोटी बालियां।

“चलो मम्मीजी, मैं तैयार हूँ।”

संध्या देवी का चेहरा उतर गया।
“ये कैसी तैयारी है? गहने नहीं हैं क्या? जाकर ढंग से तैयार होकर आ।”

नीलिमा ने शांत पर ठोस स्वर में कहा—
“मम्मीजी, मैं तो अपनी हैसियत के हिसाब से तैयार हुई हूं। आखिर मेरे माता-पिता गरीब घर के हैं न। मैंने अपने घर में गहने-कपड़े ज्यादा देखे नहीं, तो अब क्यों दिखावा करूं?”

संध्या देवी हड़बड़ा गईं।
“रजत, देख तो… कैसी बातें कर रही है। अगर ऐसे गई तो मेरी नाक कट जाएगी।”

अजय ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“मम्मी, आप ही तो हमेशा कहती हैं—‘इंसान को अपनी औकात नहीं भूलनी चाहिए।’ नीलिमा अपनी औकात याद कर रही है। जब सज-धज कर जाती है, तो आप मायके की औकात याद दिलाती हैं। अब सादगी में है तो आपको ये भी मंजूर नहीं?”

संध्या देवी का चेहरा लाल हो गया।
“गलती हो गई मुझसे। अब कुछ मत कहो। फोन पर फोन आ रहे हैं। जल्दी से तैयार होकर आओ। आइंदा कभी ताने नहीं मारूंगी।”

अजय ने गहरी सांस ली।
“मम्मी, बहू अगर गहनों से सजी होती है तो वो सिर्फ उसकी नहीं, आपके परिवार की भी इज्जत होती है। और जब सादी रहती है तो भी आपके संस्कार झलकते हैं। अब उसकी पहचान उसके पति और ससुराल से जुड़ी है। उसकी बेइज्जती, आपके घर की बेइज्जती है।”

संध्या देवी की आंखें झुक गईं।

उस दिन के बाद संध्या देवी ने कभी ताना नहीं मारा। धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि बहू घर की लाज है, औक़ात का पैमाना नहीं।

माधवी भी समझने लगी कि बहन जैसी बहू की इज्जत करना ही असली बड़प्पन है।

नीलिमा को पहली बार लगा कि उसकी चुप्पी का जवाब मिल गया है।

यह कहानी सिर्फ नीलिमा की नहीं, बल्कि उन तमाम बहुओं की है जिन्हें मायके की गरीबी का ताना देकर हरदम औकात याद दिलाई जाती है।


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