जिस बेटे की दौलत के गुमान में एक माँ ने अपने सेवा करने वाले बेटे को ‘नौकर’ समझ लिया, उसी दौलत ने अस्पताल के बिस्तर पर उसे ऐसी लात मारी कि ममता लहूलुहान हो गई। पढ़िए, एक ऐसी माँ की कहानी जिसकी आँखें तब खुलीं जब बहुत देर हो चुकी थी।
काशी के एक पुराने, सीलन भरे मकान में सुमित्रा देवी की खाँसी गूंज रही थी। सत्तर वर्षीय सुमित्रा देवी पिछले छह महीने से बिस्तर पर थीं। घर की हालत खस्ता थी, बिल्कुल उनके बड़े बेटे राघव की आर्थिक स्थिति की तरह। राघव एक प्राइवेट स्कूल में क्लर्क था, जिसकी तनख्वाह इतनी थी कि बस दो वक्त की रोटी और माँ की दवाइयों का खर्च किसी तरह चल सके।
रसोई में दाल छौंक रही राघव की पत्नी, वंदना, पसीने से लथपथ थी। तभी सुमित्रा देवी की कड़क आवाज़ आई।
“अरे ओ वंदना! ये कैसा पानी दिया है? इसमें वो स्वाद नहीं है जो मिनरल वाटर में होता है। मेरा बेटा विक्की जब पिछले साल आया था, तो वो बड़ी-बड़ी बोतलों वाला पानी लाया था। तुम लोग तो मुझे नाली का पानी पिलाकर मारना चाहते हो!”
वंदना दौड़कर कमरे में आई। “माँ जी, यह पानी उबालकर ठंडा किया हुआ है। डॉक्टर ने यही कहा था। मिनरल वाटर की बोतल रोज खरीदना हमारे बस की बात नहीं है।”
सुमित्रा देवी ने मुँह बिचकाया। “बस की बात कैसे होगी? तुम्हारे पति ने जीवन में किया ही क्या है? बस कलम घिसना जानता है। अरे, देखो मेरे विक्की को! अमेरिका में है। नोट छापता है नोट! उसकी पत्नी देखो, महारानी की तरह रहती है। और एक तुम हो, दिन भर खट-खट करती रहती हो।”
तभी राघव कमरे में दाखिल हुआ। उसके हाथ में एक छोटा सा लिफाफा था—दवाइयों का। उसका चेहरा उतरा हुआ था।
“माँ, डॉक्टर ने कहा है कि ऑपरेशन करना पड़ेगा। घुटने का दर्द अब दवाइयों से नहीं जाएगा,” राघव ने धीरे से कहा।
सुमित्रा देवी ने उसे हिकारत से देखा। “तो करवा दो ऑपरेशन। इसमें मुंह लटकाने वाली क्या बात है?”
“माँ… खर्चा दो लाख रुपये है। मेरे पास अभी…”
सुमित्रा देवी की हंसी व्यंग्य से भरी थी। “अरे, मुझे पता था! तेरे पास तो कफन के पैसे भी नहीं होंगे। बड़ी बहू ठीक ही कहती थी, तू जलता है विक्की से। मेरे छोटे बेटे के पास पैसा है तो वो तो गुरूर करेगा ही!! तुम्हारे पति को क्या जरूरत थी जलन के मारे उससे रिश्ते खराब करने की? खुद जीवन में ढंग का कुछ कर नहीं पाया इसीलिए उसे भाई की सफलता चुभती है। अरे, मैं विक्की को एक बार फोन कर दूं तो अभी मुझे अपने पास ले जाकर मेरा इलाज करवा देगा। वो तुम लोगों की तरह कंगाल नहीं जो उधार मांगकर मुझे फल खिला रहे हो।”
राघव का सिर झुक गया। वंदना की आँखों में आंसू आ गए।
“माँ जी,” वंदना ने सिसकते हुए कहा, “राघव ने अपनी घड़ी बेच दी कल, ताकि आपके लिए वो सेब ला सकें जो आप मांग रही थीं। हम अपनी पेट काट सकते हैं, पर आपकी सेवा में…”
“रहने दे ये मगरमच्छ के आंसू!” सुमित्रा देवी ने हाथ झटक दिया। “मेरे विक्की को फोन लगाओ। अभी लगाओ! स्पीकर पर डालो। मैं उसे कहूँगी कि मुझे यहाँ से ले जाए। मैं तुम भिखारियों के साथ नहीं रहूँगी।”
राघव ने कांपते हाथों से अपना पुराना, टूटा हुआ स्मार्टफोन निकाला। उसने विक्की का नंबर डायल किया। घंटी बजती रही। सुमित्रा देवी के चेहरे पर एक चमक थी, एक अभिमान था।
दूसरी बार में फोन उठा।
“हेलो? विक्की बेटा?” सुमित्रा देवी की आवाज़ में मिसरी घुल गई।
“हाँ मॉम, बोलो। जल्दी बोलो, मैं मीटिंग में हूँ,” विक्की की आवाज़ में रूखापन था, अमेरिका का नहीं, अहंकार का लहज़ा था।
“बेटा, मेरी तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर कह रहा है ऑपरेशन होगा। दो लाख रुपये लगेंगे। राघव के पास तो कुछ है नहीं, तू तो जानता है। तू पैसे भेज दे या मुझे वहां बुला ले बेटा। यहाँ बहुत तकलीफ में हूँ,” सुमित्रा देवी ने एक सांस में कह दिया।
उधर से कुछ पल की खामोशी रही। फिर विक्की की आवाज़ आई, जो अब और भी सख्त हो गई थी।
“मॉम, आर यू सीरियस? दो लाख रुपये? अभी पिछले महीने ही तो मैंने नया विला बुक किया है। मेरी ईएमआई (EMI) बहुत हाई है। और रही बात बुलाने की, तो यहाँ का वीज़ा और मेडिकल इंश्योरेंस बहुत महंगा है। आप वहां राघव भैया के पास हो तो सही। सरकारी अस्पताल में करवा लो न इलाज, जरूरी है क्या फाइव स्टार हॉस्पिटल में जाना?”
सुमित्रा देवी सन्न रह गईं। “पर बेटा… तू तो कहता था कि तेरे पास बहुत पैसा है? तू तो कहता था कि माँ तेरे लिए भगवान है?”
विक्की हंस पड़ा। “मॉम, इमोशनल ड्रामा बंद करो। प्रैक्टिकल बनो। पैसा पेड़ पर नहीं उगता। और सुनो, अभी मुझे डिस्टर्ब मत करना। राघव भैया को बोलो वो संभालें, आखिर प्रॉपर्टी (वह पुराना मकान) तो उन्हीं को मिलेगी ना? मैं फोन रख रहा हूँ।”
फोन कट गया। ‘टू-टू-टू’ की आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी।
सुमित्रा देवी का चेहरा पीला पड़ गया था। जिस बेटे के ‘गुरूर’ की वो कसमें खाती थीं, उसने एक झटके में उन्हें ‘बोझ’ बता दिया था। जिस बेटे को वो ‘सफल’ कहती थीं, उसने अपनी सफलता के दरवाजे अपनी ही माँ के लिए बंद कर लिए थे।
राघव चुपचाप खड़ा था। उसने एक शब्द नहीं कहा। न ताना मारा, न विक्की को बुरा-भला कहा।
उसने वंदना की तरफ देखा और अपनी जेब से एक कागज निकाला।
“वंदना, ये लो,” राघव ने कहा।
“ये क्या है?” वंदना ने कागज खोला। वह मकान के गिरवी रखने के कागजात थे।
“मैंने सेठ दीनानाथ से बात कर ली है। इस मकान को गिरवी रखकर वो तीन लाख रुपये देने को तैयार हैं। माँ का ऑपरेशन बेस्ट हॉस्पिटल में होगा,” राघव ने वंदना से कहा, फिर माँ की तरफ मुड़ा, “माँ, तुम चिंता मत करो। विक्की की अपनी मजबूरियां होंगी। मैं हूँ ना। मैं भले ही जीवन में ‘बड़ा आदमी’ नहीं बन पाया, लेकिन इतना छोटा भी नहीं हूँ कि अपनी माँ का इलाज न करवा सकूं।”
सुमित्रा देवी की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह अब तक जिस बेटे को ‘नालायक’ और ‘कंगाल’ समझती थीं, उसने अपनी छत गिरवी रख दी थी—सिर्फ उनकी जान बचाने के लिए। और जिसे वो ‘हीरा’ समझती थीं, वो पत्थर निकला।
सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से राघव का हाथ पकड़ लिया।
“राघव… मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं अंधी हो गई थी। पैसे की चमक ने मेरी ममता को अंधा कर दिया था। तू कंगाल नहीं है रे, तू तो सबसे बड़ा धनवान है। असली राजा तो तू है। विक्की के पास नोट हैं, पर तेरे पास नीयत है।”
उन्होंने वंदना को पास बुलाया। “बड़ी बहू, तू ठीक कहती थी। मैं छोटी बहू की गलतियों पर नहीं, बल्कि अपने छोटे बेटे के पापों पर पर्दा डाल रही थी। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है। पर आज समझ आया कि बुढ़ापे की लाठी बेटा होता है, उसका बैंक बैलेंस नहीं।”
राघव ने माँ के आंसू पोंछे। “माँ, रो मत। बीपी बढ़ जाएगा। चलो, तैयारी करो, शाम को अस्पताल चलना है।”
उस रात सुमित्रा देवी अस्पताल के जनरल वार्ड में थीं, लेकिन उन्हें लगा जैसे वो दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह पर हैं। उनके सिरहाने राघव बैठा दबा रहा था और वंदना उनके लिए घर से बनी खिचड़ी खिला रही थी।
उन्होंने मन ही मन विक्की को धन्यवाद दिया। अगर उसने आज फोन पर वो बात न कही होती, तो शायद सुमित्रा देवी ताउम्र कांच के टुकड़ों को हीरा और असली हीरे को पत्थर समझती रहतीं। उन्हें समझ आ गया था कि बेटा वो नहीं जो विदेश से ‘महंगे तोहफे’ भेजे, बेटा वो है जो पास रहकर ‘दुख’ बांटे।
उस दिन के बाद सुमित्रा देवी के मुँह से कभी विक्की का नाम नहीं निकला। जब कोई पड़ोसी पूछता कि छोटा बेटा कैसा है, तो वो गर्व से राघव की तरफ इशारा करतीं और कहतीं—
“मेरा एक ही बेटा है—राघव। दूसरा तो बस एक भ्रम था, जो वक्त की आंधी में उड़ गया।”
**समापन:**
दोस्तों, यह कहानी घर-घर की सच्चाई है। हम अक्सर अपने उन बच्चों को कम आंकते हैं जो हमारे पास रहकर हमारी सेवा करते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे ज्यादा कमाते नहीं। और उन बच्चों की झूठी तारीफों के पुल बांधते हैं जो दूर रहकर सिर्फ फोन पर हालचाल पूछते हैं। याद रखिये, माता-पिता को ‘डॉलर’ नहीं, ‘दाने’ और ‘दवा’ चाहिए जो वक्त पर मिल सके। श्रवण कुमार के पास कोई बैंक बैलेंस नहीं था, फिर भी इतिहास उसे याद रखता है। अपनी ‘लाठी’ की कद्र कीजिये, इससे पहले कि वक्त आपको बेसहारा कर दे।
**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके परिवार में भी कभी ऐसा हुआ है कि पैसे वाले रिश्तेदार को ज्यादा इज्जत दी गई हो, चाहे उसका व्यवहार कैसा भी हो? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।
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