एक बहू को लगता था कि उसकी सास दुनिया की सबसे कंजूस औरत है, जो खाने के एक-एक निवाले का हिसाब रखती है। लेकिन जब उस बंद अलमारी का राज़ खुला और सास की डायरी सामने आई, तो बहू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जानिये उस कड़वे सच के बारे में जिसने नफरत को आंसुओं में बदल दिया।
रात के नौ बज रहे थे। शर्मा सदन के डाइनिंग टेबल पर सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन हवा में तनाव इतना था कि उसे चाकू से काटा जा सकता था। 26 वर्षीय निशा, जो इस घर की नई बहू थी, अपनी थाली में परोसी गई पतली दाल और सूखी सब्जी को देख रही थी। पिछले छह महीनों से—यानी जब से उसकी शादी हुई थी—यही कहानी थी।
निशा एक खाते-पीते घर की बेटी थी। उसके मायके में घी, दूध और मेवों की नदियाँ बहती थीं। लेकिन यहाँ ससुराल में? यहाँ तो घी का डिब्बा भी ऐसे खुलता था जैसे तिजोरी खोली जा रही हो।
आज निशा को बहुत जोरों की भूख लगी थी। उसने देखा कि डोंगे में थोड़ी सी सब्जी बची है। उसने हाथ बढ़ाया और सब्जी अपनी थाली में डाल ली।
तभी सामने बैठी उसकी सास, गायत्री देवी, ने उसे घूर कर देखा। उनकी आँखों में एक अजीब सी सख्ती थी।
"अरे निशा! सारी सब्जी तू ही ले लेगी तो रोहन क्या खाएगा? तुझे पता है ना कि सब्जी कल सुबह के लिए भी बचानी है? जरा हाथ रोक कर खाया कर। हमारे यहाँ पैसे पेड़ पर नहीं उगते।"
निशा का हाथ रुक गया। चम्मच थाली में ज़ोर से गिरा। सब्र का बांध टूट चुका था। भूख और अपमान ने मिलकर उसके अंदर के गुस्से को ज्वालामुखी बना दिया।
निशा ने झटके से कुर्सी पीछे खिसकाई और खड़ी हो गई। उसकी आवाज़ में कंपन था, लेकिन तेवर सख्त थे।
**"माँ जी, आपके घर में खाने-पीने की इतनी ही कमी थी तो आप लोग बहू लेकर ही क्यों आए? पहले थोड़ा समर्थ बन जाते... कम से कम किसी की बेटी को भूखा तो नहीं मारते!"**
गायत्री देवी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया, लेकिन फिर अचानक पीला पड़ गया। जैसे किसी ने उन्हें थप्पड़ मार दिया हो। रोहन, जो अब तक चुपचाप रोटी के टुकड़े तोड़ रहा था, एकदम से खड़ा हो गया।
"निशा! यह कैसा तरीका है माँ से बात करने का?" रोहन चिल्लाया।
"सही तो कह रही हूँ रोहन! मैं थक गई हूँ इस रोज-रोज की किचकिच से," निशा रो पड़ी। "दाल में पानी ज़्यादा है, सब्जी में तेल कम है, बिजली का बिल न बढ़ जाए इसलिए पंखा बंद रखो... मैं इंसान हूँ या कोई कैदी? मेरे पापा ने शादी में दस लाख रुपये दिए थे, वो कहाँ गए? अगर इतनी ही गरीबी थी तो क्यों की शादी?"
गायत्री देवी ने एक शब्द नहीं कहा। उन्होंने अपनी थाली उठाई, जिसमें सिर्फ एक रोटी और नमक था, और चुपचाप रसोई में चली गईं। रोहन ने निशा को एक खूनी नज़र से देखा और अपनी माँ के पीछे चला गया।
निशा अपने कमरे में आ गई और दरवाजा बंद करके फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने कहे शब्दों पर पछतावा नहीं था, बस दुख था कि वह कहाँ फंस गई है। उसे लगा कि यह परिवार सिर्फ कंजूस नहीं, बल्कि लालची भी है, जो दहेज लेकर भी उसे भूखा मार रहा है।
अगले दो दिन घर में अघोषित युद्ध चला। निशा ने खाना बनाना छोड़ दिया। वह ऑनलाइन खाना ऑर्डर करती और अपने कमरे में खाती। गायत्री देवी और रोहन चुपचाप जो रूखा-सूखा बनता, खा लेते।
तीसरे दिन की बात है। दोपहर का वक्त था। रोहन ऑफिस जा चुका था। निशा पानी लेने के लिए किचन में आई। उसने देखा कि गायत्री देवी चक्कर खाकर ज़मीन पर गिर पड़ी हैं।
"माँ जी!" निशा की सारी नफरत एक पल के लिए गायब हो गई। वह दौड़कर उनके पास गई। उनका शरीर ठंडा पड़ रहा था।
निशा ने उन्हें पानी पिलाया और सोफे पर लिटाया। डॉक्टर को फोन करने के लिए वह गायत्री देवी का फोन ढूंढने उनके कमरे में गई। वहां बेड के पास वाली मेज पर एक खुली हुई डायरी और बैंक की पासबुक रखी थी।
जल्दी में निशा की नज़र डायरी के पन्ने पर पड़ी। वहां आज की तारीख लिखी थी।
*"आज फिर रोहन को झूठ बोल दिया कि मैंने खाना खा लिया है। घर में आटा खत्म होने वाला है। निशा को पता नहीं चलना चाहिए। वो नई है, घबरा जाएगी। मेरे हिस्से की रोटी उसे मिल जाए, बस यही बहुत है।"*
निशा सन्न रह गई। उसने कांपते हाथों से पासबुक उठाई। उसमें एंट्रीज देखकर उसका दिमाग चकरा गया। खाते में सिर्फ 500 रुपये बचे थे। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि हर महीने की 1 तारीख को एक बड़ी रकम, लगभग 40,000 रुपये, किसी 'लोन अकाउंट' में कट रही थी।
निशा को कुछ समझ नहीं आया। रोहन की सैलरी तो 50,000 थी। अगर 40,000 लोन में जा रहा है, तो घर कैसे चल रहा है? और यह लोन किस लिए?
तभी गायत्री देवी को होश आया। वह लड़खड़ाते हुए कमरे के दरवाजे तक आईं और निशा के हाथ में पासबुक देखकर दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गईं। उनकी आँखों में चोर पकड़े जाने जैसा डर था।
"निशा... वो... वो रख दे," गायत्री देवी की आवाज़ बहुत कमज़ोर थी।
निशा ने पासबुक मेज पर पटकी। "यह क्या है माँ जी? इतना बड़ा लोन? और आप भूखी क्यों रह रही हैं? रोहन तो अच्छी नौकरी करते हैं ना?"
गायत्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले। वह धीरे से बिस्तर पर बैठ गईं।
"रोहन की नौकरी छह महीने पहले छूट गई थी, निशा," उन्होंने जो कहा, उसने निशा के होश उड़ा दिए।
"क्या? लेकिन वो तो रोज ऑफिस जाते हैं..."
"वो नौकरी ढूंढने जाता है। उसे नौकरी से निकाल दिया गया था क्योंकि कंपनी बंद हो गई थी। लेकिन वह तुम्हें बताना नहीं चाहता था। तुम्हारी नई-नई शादी हुई थी। वह नहीं चाहता था कि तुम्हारी नज़रों में उसकी इज्जत कम हो या तुम असुरक्षित महसूस करो।"
निशा का गला सूख गया। "तो... तो घर कैसे चल रहा है?"
"मेरी पेंशन से... और यह जो लोन है..." गायत्री देवी रुकीं, फिर बोलीं, "यह लोन तुम्हारी शादी के लिए लिया था हमने। तुम्हारे पापा ने जो दस लाख दिए थे, वो हमने हाथ भी नहीं लगाए। वो तुम्हारे नाम से फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कर दिए थे उसी दिन, ताकि कल को अगर हमें कुछ हो जाए तो तुम सुरक्षित रहो। लेकिन शादी के खर्चे के लिए रोहन ने पर्सनल लोन लिया था। अब नौकरी नहीं है, तो बैंक वाले घर नीलाम करने की धमकी दे रहे हैं। इसलिए हम... हम पेट काटकर..."
गायत्री देवी का गला भर आया। "मैंने सोचा था कि मैं एक वक्त का खाना छोड़ दूंगी तो महीने के 500 रुपये बचेंगे, उससे बिजली का बिल भर जाएगा। मैंने कभी तुम्हें इसलिए नहीं टोका कि मैं कंजूस हूँ... मैंने इसलिए टोका क्योंकि मुझे डर था कि अगर राशन 25 तारीख को खत्म हो गया, तो अगले 5 दिन तुम क्या खाओगी?"
निशा पत्थर की मूरत बनी खड़ी थी। जिन शब्दों को उसने 'ताना' समझा था, वो असल में 'फिक्र' थी। जिस सास को उसने 'कंजूस' कहा, वो असल में 'त्याग की देवी' थी। और वो दस लाख... जिन्हें वह सोच रही थी कि ससुराल वालों ने हड़प लिए, वो तो सुरक्षित थे।
"आपने मुझे बताया क्यों नहीं माँ जी? मैंने आपको क्या-क्या नहीं कहा... 'समर्थ बन जाते'... हे भगवान!" निशा जमीन पर बैठ गई और गायत्री देवी के घुटनों पर सिर रखकर रोने लगी। "मुझे माफ़ कर दीजिये माँ जी। मैं बहुत बुरी हूँ।"
गायत्री देवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा। "नहीं बेटा, गलती हमारी है। हमने तुझसे सच छिपाया। रिश्तों में पर्दा नहीं होना चाहिए। रोहन को लगा कि गरीबी देखकर तुम छोड़ जाओगी।"
"मैं ऐसी नहीं हूँ माँ जी," निशा ने सिसकते हुए कहा।
उसी शाम, जब रोहन घर (यानी पार्क से समय बिताकर) लौटा, तो उसने देखा कि डाइनिंग टेबल पर खाना लगा है। लेकिन माहौल बदला हुआ था।
निशा ने दरवाजा खोला। रोहन डर गया कि कहीं फिर झगड़ा न हो।
"हाथ-मुंह धो लो रोहन, खाना तैयार है," निशा ने शांत आवाज़ में कहा।
टेबल पर बैठते ही रोहन ने देखा कि आज फिर दाल पतली है, लेकिन साथ में गर्मागर्म पकोड़े रखे हैं।
"यह... पकोड़े? आज क्या खास है?" रोहन ने डरते हुए पूछा।
"खास यह है कि आज से इस घर में कोई झूठ नहीं बोलेगा," निशा ने गायत्री देवी की तरफ देखा, जो मुस्कुरा रही थीं।
निशा ने अपनी FD के कागज़ात लाकर टेबल पर रख दिए।
"यह तुड़वा लीजिये रोहन। इससे लोन का बड़ा हिस्सा चुकता हो जाएगा।"
रोहन और गायत्री देवी चौंक गए। "निशा, यह तुम्हारे पापा के पैसे हैं, तुम्हारी सुरक्षा के लिए..." रोहन ने कहा।
"मेरी सुरक्षा मेरे परिवार से है, बैंक बैलेंस से नहीं," निशा ने दृढ़ता से कहा। "और सुनिए, कल से आपको झूठ बोलकर पार्क में बैठने की ज़रूरत नहीं है। मैंने अपनी पुरानी कंपनी में बात की है, वर्क फ्रॉम होम मिल रहा है। जब तक आपको नई नौकरी नहीं मिलती, घर मैं संभालूंगी। और माँ जी..."
निशा ने सास की थाली में एक बड़ा पकोड़ा रखा। "खबरदार जो आज के बाद आपने अपना खाना कम किया। हम सूखी रोटी खाएंगे, तो तीनों मिलकर खाएंगे, और पनीर खाएंगे तो भी तीनों। यह घर 'मेरा' नहीं, 'हमारा' है।"
उस रात उस घर में फिर से वही पतली दाल बनी थी, लेकिन उसका स्वाद किसी शाही दावत से कम नहीं था, क्योंकि उसमें प्यार और विश्वास का तड़का लगा था। निशा समझ गई थी कि गरीबी खाने की थाली में नहीं, बल्कि उन विचारों में होती है जो अपनों पर भरोसा नहीं करते।
उस दिन के बाद, शर्मा परिवार ने मिलकर संघर्ष किया। तीन महीने बाद रोहन को नई नौकरी मिल गई, लेकिन उन तीन महीनों ने उन्हें एक ऐसा सबक सिखाया जो दौलत कभी नहीं सिखा सकती थी—कि मुसीबत में परिवार का साथ ही सबसे बड़ी संपत्ति है।
**समापन:**
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी जो हमें 'कंजूसी' या 'ताना' लगता है, उसके पीछे कोई बहुत बड़ी मजबूरी या त्याग छिपा हो सकता है। सास-बहू का रिश्ता सिर्फ नोक-झोंक का नहीं होता, अगर संवाद और विश्वास हो, तो यह माँ-बेटी से भी गहरा हो सकता है। और पतियों को भी समझना चाहिए कि पत्नी सिर्फ सुख की साथी नहीं होती, वह अर्धांगिनी है—दुख में भी बराबर की हिस्सेदार। सच छिपाइए मत, साझा कीजिये।
**एक सवाल आपके लिए:** अगर आप निशा की जगह होते और आपको पता चलता कि ससुराल वालों ने आपसे इतनी बड़ी बात छिपाई है, तो आपका रिएक्शन क्या होता? क्या आप उनका साथ देते या धोखा मानकर अलग हो जाते? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें।
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