वारिस

 "वारिस? खून? खानदान?" कावेरी देवी बुआ के करीब जाकर खड़ी हो गईं. "आप तो रामायण और महाभारत का पाठ रोज़ करती हैं न दीदी? तो बताइए, क्या यशोदा मैया ने कान्हा को जन्म दिया था? नहीं न? पर दुनिया आज भी कान्हा को देवकी-नंदन से ज़्यादा यशोदा-नंदन के नाम से जानती है. जब भगवान ने ही भेद नहीं किया, तो हम इंसान कौन होते हैं खून का हिसाब लगाने वाले?"

"पर कावेरी, वो भगवान थे, यह कलयुग है..." बुआ ने तर्क देने की कोशिश की.

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आईने में अपना अक्स देखते हुए सिमरन ने अपने बालों में एक आखिरी पिन लगाई और एक गहरी साँस ली. आज उसका 'प्रोजेक्ट हेड' के रूप में प्रमोशन हुआ था. यह दिन उसके लिए बहुत बड़ा था, लेकिन उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सी घबराहट भी थी. वह जानती थी कि ऑफिस में उसकी फाइलें जितनी भारी थीं, घर पर रिश्तों की उम्मीदें उससे कहीं ज़्यादा भारी थीं.

सिमरन की शादी को सात साल हो चुके थे. उसके पति, आशुतोष, एक समझदार और सुलझे हुए इंसान थे. दोनों ने लव मैरिज की थी, लेकिन परिवार की रजामंदी के साथ. सिमरन की सास, कावेरी देवी, शहर के एक पुराने और रसूखदार परिवार की matriarch (मुखिया) थीं. वे नियमों की पक्की थीं. सुबह की पूजा से लेकर रात के खाने तक, हर चीज़ का एक वक़्त मुकर्रर था. शुरुआत में सिमरन को इस अनुशासन में ढलने में वक़्त लगा, लेकिन धीरे-धीरे उसने घर और ऑफिस के बीच एक संतुलन बना लिया था.

सिमरन सीढ़ियां उतरकर नीचे आई. डाइनिंग टेबल पर कावेरी देवी और आशुतोष पहले से बैठे थे.

"गुड मॉर्निंग माँ जी," सिमरन ने झुककर पैर छुए.

"जीती रहो बहू. आज तुम्हारा बड़ा दिन है न? दही-चीनी खाकर निकलना," कावेरी देवी ने बिना उसकी तरफ देखे, अपनी चाय की चुस्की लेते हुए कहा.

सिमरन के चेहरे पर मुस्कान आ गई. कावेरी देवी का प्यार जताने का तरीका अलग था—वे शब्दों से कम और व्यवहार से ज़्यादा बोलती थीं.

लेकिन, इस घर की चारदीवारी में एक खामोशी भी गूंजती थी. वह खामोशी थी—एक बच्चे की किलकारी की कमी.

सात साल. रिश्तेदारों के लिए यह सिर्फ़ एक संख्या नहीं थी, बल्कि ताने मारने का एक लाइसेंस था. शुरुआत के दो साल तो "अभी करियर बनाना है" कहकर निकल गए. अगले तीन साल डॉक्टर के चक्कर काटने, आईवीएफ (IVF) के असफल प्रयास और निराशा में बीते. और अब... अब सिमरन और आशुतोष ने एक ऐसा फैसला लिया था, जो शायद इस पुराने ख्यालात वाले परिवार में भूचाल ला सकता था.

शाम को घर लौटते वक़्त सिमरन और आशुतोष कार में खामोश थे.

"आशु, क्या हमें आज ही माँ जी से बात करनी चाहिए?" सिमरन ने हिचकिचाते हुए पूछा.

आशुतोष ने उसका हाथ थाम लिया. "सिमी, हम छह महीने से इस प्रोसेस में लगे हैं. अब जब अनाथालय से कन्फर्मेशन आ गया है, तो हमें बताना ही होगा. हम कब तक छिपाएंगे?"

घर पहुँचते ही उन्हें पता चला कि कावेरी देवी की बड़ी ननद, सुमित्रा बुआ, आई हुई हैं. सुमित्रा बुआ वह शख्सियत थीं, जिनके आने से घर का तापमान अपने आप बढ़ जाता था. उनकी जुबान कैंची से तेज़ चलती थी और निशाना हमेशा सिमरन होती थी.

ड्राइंग रूम में घुसते ही सुमित्रा बुआ की आवाज़ कानों में पड़ी, "अरे कावेरी, अब तो हद हो गई. सात साल हो गए. कब तक इस सूने आंगन को देखोगी? मैंने तो पहले ही कहा था, पढ़ी-लिखी लड़कियों को करियर का नशा होता है, कोख का सुख उन्हें क्या पता."

सिमरन दरवाज़े पर ही ठिठक गई. आशुतोष को गुस्सा आया, लेकिन सिमरन ने उसे रोक दिया. वे अंदर गए.

"नमस्ते बुआ जी," सिमरन ने शिष्टाचार निभाया.

"आओ, आओ कलेक्टर साहिबा. सुना है आज तरक्की मिली है? पर असली तरक्की तो तब है जब गोद में लाल हो. वरना यह दौलत-शोहरत किस काम की, जब वारिस ही न हो," बुआ ने जले पर नमक छिड़कते हुए कहा.

कावेरी देवी चुपचाप माला जप रही थीं. उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. सिमरन का दिल भारी हो गया. वह अपने कमरे में चली गई.

रात को खाने के बाद, जब सब बैठे थे, आशुतोष ने हिम्मत जुटाई.

"माँ, बुआ जी... हमें आप सबसे कुछ ज़रूरी बात करनी है."

कावेरी देवी ने प्रश्नवाचक नज़रों से देखा.

"माँ, आप जानती हैं कि हम पिछले कुछ सालों से बच्चे के लिए कितनी कोशिश कर रहे थे. डॉक्टर्स ने जवाब दे दिया है. लेकिन... हम माता-पिता बनना चाहते हैं. इसलिए, हमने और सिमरन ने मिलकर एक फैसला लिया है."

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. सुमित्रा बुआ की आँखों में चमक आ गई, जैसे उन्हें लगा हो कि आशुतोष शायद दूसरी शादी की बात करेगा या किसी बड़े डॉक्टर की.

"हम एक बच्ची गोद ले रहे हैं," आशुतोष ने एक सांस में कह दिया. "उसका नाम पीहू है. वह डेढ़ साल की है. अगले हफ़्ते हम उसे घर ला रहे हैं."

यह सुनते ही जैसे कमरे में बम फट गया हो. सुमित्रा बुआ के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा.

"क्या? गोद लोगे? अनाथालय से?" बुआ चिल्लाईं. "आशु, तेरा दिमाग तो ठिकाने पर है? तुझे पता भी है कि उसका खून किसका है? उसकी जात क्या है? उसका खानदान क्या है? हमारे 'रघुवंशी' खानदान में आज तक किसी ने बाहर का खून नहीं मिलाया."

सिमरन ने आशुतोष का हाथ कसकर पकड़ लिया. उसे इसी विरोध का डर था.

"बुआ जी, खून का क्या है? वह एक मासूम बच्ची है," सिमरन ने दबी आवाज़ में कहा.

"तू तो चुप ही रह!" बुआ ने सिमरन को डांटा. "तुझमें कमी है, इसलिए तू यह रास्ता निकाल रही है. पर हम अपने कुल का नाश नहीं होने देंगे. कावेरी! तू कुछ बोलती क्यों नहीं? तेरा बेटा इतना बड़ा अनर्थ करने जा रहा है और तू मौन व्रत धारण किए बैठी है?"

कावेरी देवी ने अपनी माला मेज पर रखी. उनका चेहरा भावशून्य था. सिमरन की धड़कनें रुक गई थीं. उसे लगा कि आज सास भी बुआ का ही साथ देंगी. आखिर परंपरा और कुल की बात थी.

कावेरी देवी ने आशुतोष की आँखों में देखा. "तूने कागज़ी कार्यवाही पूरी कर ली?"

"जी माँ," आशुतोष ने सिर झुकाकर कहा.

"बच्ची स्वस्थ तो है?"

"जी माँ, बिल्कुल स्वस्थ है."

"कावेरी! तू यह क्या पूछ रही है? तुझे रोकना चाहिए इसे!" बुआ ने फिर हस्तक्षेप किया. "अरे, कल को समाज क्या कहेगा? कि रघुवंशी खानदान को अपना वारिस बाज़ार से लाना पड़ा? अरे, अगर इस औरत से बच्चा नहीं हो रहा, तो आशु की दूसरी शादी करवा दे. अभी भी वक़्त है."

यह शब्द सिमरन के सीने में तीर की तरह चुभे. उसकी आँखों से आंसू बह निकले. दूसरी शादी? क्या उसका अस्तित्व सिर्फ एक बच्चा पैदा करने की मशीन तक सीमित था?

तभी कावेरी देवी अपनी जगह से उठीं. उनकी कद-काठी और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि बुआ भी एक पल के लिए सहम गईं.

"दीदी," कावेरी देवी की आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें चट्टान जैसी मज़बूती थी. "संभलकर बोलिए. आप मेरे घर में बैठी हैं और मेरी बहू के बारे में बात कर रही हैं."

सिमरन और आशुतोष ने हैरानी से कावेरी देवी को देखा.

"वारिस? खून? खानदान?" कावेरी देवी बुआ के करीब जाकर खड़ी हो गईं. "आप तो रामायण और महाभारत का पाठ रोज़ करती हैं न दीदी? तो बताइए, क्या यशोदा मैया ने कान्हा को जन्म दिया था? नहीं न? पर दुनिया आज भी कान्हा को देवकी-नंदन से ज़्यादा यशोदा-नंदन के नाम से जानती है. जब भगवान ने ही भेद नहीं किया, तो हम इंसान कौन होते हैं खून का हिसाब लगाने वाले?"

"पर कावेरी, वो भगवान थे, यह कलयुग है..." बुआ ने तर्क देने की कोशिश की.

"कलयुग इंसानों के दिमाग में है दीदी," कावेरी देवी ने सिमरन के पास जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा. सिमरन को लगा जैसे उसे दुनिया का सबसे मज़बूत सहारा मिल गया हो. "मेरी बहू में कोई कमी नहीं है. कमी हमारी सोच में है. अगर भगवान ने इसे जन्म देने का माध्यम नहीं बनाया, तो क्या हुआ? इसे एक अनाथ बच्ची को जीवन देने का माध्यम तो बना दिया. यह तो और भी पुण्य का काम है."

"और रही बात दूसरी शादी की," कावेरी देवी की आँखों में अंगारे थे, "तो खबरदार जो दोबारा मेरे बेटे या बहू के सामने यह शब्द भी निकाला. सिमरन मेरी बहू बाद में है, पहले इस घर की बेटी है. और बेटी बदली नहीं जाती."

सिमरन अब सिसक रही थी, लेकिन यह आंसू दुख के नहीं, बल्कि राहत और सम्मान के थे.

"पर समाज..." बुआ की आवाज़ अब धीमी पड़ गई थी.

"समाज?" कावेरी देवी हँसी, एक व्यंग्यात्मक हँसी. "जब सिमरन का मिसकैरेज हुआ था, तब समाज आंसू पोंछने आया था? जब यह डिप्रेशन में थी, तब समाज ने सहारा दिया था? नहीं. तब सिर्फ मेरा बेटा और मैं इसके साथ थे. तो आज जब खुशियाँ हमारे घर आ रही हैं, तो समाज से पूछने की ज़रूरत क्या है?"

कावेरी देवी ने आशुतोष की तरफ मुड़कर कहा, "जाओ, तैयारी करो. अगले हफ़्ते मेरी पोती आएगी. घर में हवन होगा, पूरे धूमधाम से स्वागत होगा. मैं देखना चाहती हूँ कि कौन मेरे फैसले पर उंगली उठाता है."

उस रात, घर का माहौल बदल गया. जो तनाव सालों से जमा था, वह कावेरी देवी के एक फैसले ने धो दिया था.

हफ़्ते भर बाद, जब सिमरन और आशुतोष नन्ही पीहू को लेकर घर आए, तो घर फूलों से सजा था. प्रवेश द्वार पर कावेरी देवी आरती की थाली लेकर खड़ी थीं. वही बुआ जी, जो कल तक विरोध कर रही थीं, अब कोने में मुंह फुलाए बैठी थीं, लेकिन कावेरी देवी के डर से कुछ बोल नहीं पा रही थीं.

सिमरन गोद में पीहू को लिए हुए कार से उतरी. बच्ची नई जगह और भीड़ देखकर सहम गई और रोने लगी. सिमरन उसे चुप कराने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह चुप नहीं हो रही थी.

कावेरी देवी आगे बढ़ीं. उन्होंने आरती की थाली आशुतोष को थमाई और पीहू को अपनी गोद में ले लिया.

"अरे-अरे, मेरी गुड़िया रानी. दादी के पास आओगी?"

आश्चर्यजनक रूप से, कावेरी देवी की गोद में जाते ही पीहू चुप हो गई और उनकी माला के मोतियों से खेलने लगी.

"देखो, खून नहीं पहचानता, पर रूह पहचानती है," कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा. "इसने अपनी दादी को चुन लिया है."

शाम को घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी गई थी. पास-पड़ोस की औरतें और रिश्तेदार आए हुए थे. कानाफूसी का दौर जारी था.

"गोद ली हुई है..."

"पता नहीं कैसी निकलेगी..."

"बेचारी कावेरी, अपना खून तो अपना ही होता है..."

सिमरन ने पीहू को एक सुंदर सी गुलाबी फ्रॉक पहनाई थी. वह उसे लेकर मेहमानों के बीच आई. कुछ औरतों ने नाक-भौं सिकोड़ी.

मिसेज खन्ना, जो पड़ोस में रहती थीं, ने कावेरी देवी से धीरे से कहा, "कावेरी, बच्ची तो प्यारी है, पर देखो न, रंग थोड़ा सांवला है. तुम्हारे परिवार में तो सब गोरे हैं. अलग ही दिखेगी यह तो."

सिमरन का दिल बैठ गया. उसे लगा कि अब उसे जवाब देना होगा. लेकिन उससे पहले ही कावेरी देवी की आवाज़ गूंजी.

"मिसेज खन्ना," कावेरी देवी ने पीहू को गोद में उठाकर सबके सामने खड़ा कर दिया. "रंग-रूप तो धूप-छांव है. बदलता रहता है. पर संस्कार और नसीब, यह इंसान खुद गढ़ता है. यह बच्ची सांवली है या गोरी, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता. फर्क इससे पड़ता है कि यह अब 'रघुवंशी' है. और सुन लीजिए आप सब..."

उन्होंने पूरे हॉल में नज़र घुमाई. "आज के बाद अगर किसी ने मेरी पोती के रंग, रूप या उसके जन्म को लेकर कोई भी टिप्पणी की, तो समझ लीजिएगा कि उसने सीधे मुझसे बैर मोल लिया है. यह बच्ची इस घर का भविष्य है, और इसे वही प्यार और हक मिलेगा जो एक सगे वारिस को मिलता है. बल्कि उससे ज़्यादा, क्योंकि इसे हमने दिल से चुना है, मजबूरी में नहीं."

सन्नाटा छा गया. मिसेज खन्ना की बोलती बंद हो गई. सिमरन ने अपनी सास को देखा. वह औरत जो कल तक परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ी नज़र आती थी, आज परंपराओं से ऊपर उठकर मानवता की मिसाल बन गई थी.

पार्टी के बाद, जब सब चले गए, सिमरन कावेरी देवी के कमरे में दूध का गिलास लेकर गई. कावेरी देवी पीहू को सुला रही थीं. पीहू उनकी साड़ी का पल्लू मुट्ठी में भींचे सो रही थी.

"माँ जी," सिमरन ने धीरे से कहा.

कावेरी देवी ने इशारे से उसे पास बुलाया.

"बैठो."

सिमरन बिस्तर के किनारे बैठ गई. "थैंक यू माँ जी. आज आपने जो किया... मुझे लगा था कि आप..."

"तुझे लगा था कि मैं पुरानी सोच वाली सास हूँ जो कुल के दीपक के लिए रोएगी?" कावेरी देवी ने मुस्कुराते हुए कहा. "बहू, मैं पुरानी ज़रूर हूँ, पर पत्थर नहीं हूँ. मैंने देखा है कि तूने इस घर के लिए क्या कुछ नहीं किया. तूने मेरे बेटे को संभाला, इस घर को संभाला. एक बच्चे की कमी तुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी. मैं वो नहीं चाहती थी."

उन्होंने सिमरन के हाथ पर अपना हाथ रखा. "जानती है, 'यशोदा' बनना आसान नहीं होता. देवकी सिर्फ जन्म देती है, पर यशोदा को उस बच्चे को पालना होता है जो उसका होकर भी, दुनिया की नज़रों में उसका नहीं होता. तुझे बहुत बातें सुननी पड़ेंगी, बहुत ताने सहने पड़ेंगे. पर याद रखना, जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उंगली तेरी तरफ नहीं उठेगी. तू बस मेरी पोती को एक अच्छा इंसान बनाना."

सिमरन ने झुककर अपनी सास के घुटनों पर सिर रख दिया. उसकी आँखों से बहते आंसू कावेरी देवी की साड़ी को भिगो रहे थे. आज उसे एहसास हुआ कि उसने एक बेटी नहीं गोद ली, बल्कि उसने खुद एक माँ पा ली है.

कमरे में मंद रोशनी थी. पीहू नींद में मुस्कुरा रही थी. उसे नहीं पता था कि उसे कैसा परिवार मिला है, लेकिन उसे यह ज़रूर पता था कि वह सुरक्षित है—दो माओं की छत्रछाया में. एक वो जिसने उसे दिल से अपनाया था, और दूसरी वो जिसने ढाल बनकर उसे ज़माने की नज़रों से बचाया था.

उस रात, उस घर की दीवारों ने एक नई कहानी लिखी—एक ऐसी कहानी जहाँ खून के रिश्ते हार गए थे और दिल के रिश्ते जीत गए थे.

मूल लेखिका : किरण विश्वकर्मा 


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