** एक मशहूर डॉक्टर जिसने अपनी एक गलती छिपाने के लिए अपने ज़मीर का सौदा कर लिया। क्या उसके पिता का एक फैसला उसे बर्बाद होने से बचा पाएगा या उसे सलाखों के पीछे पहुँचा देगा?
बारिश की बूंदें खिड़की के शीशे पर लगातार बज रही थीं, जैसे कोई बार-बार दस्तक देकर अंदर आने की इजाजत मांग रहा हो। लेकिन शहर के सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन, डॉ. समीर मल्होत्रा के आलीशान बंगले के सन्नाटे को यह शोर भी नहीं तोड़ पा रहा था। रात के दो बज चुके थे, पर समीर की आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। वह अपने स्टडी रूम में बैठा था, हाथ में व्हिस्की का गिलास था जो अब खाली हो चुका था। उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं, जबकि कमरे का एसी 18 डिग्री पर चल रहा था।
समीर के सामने टेबल पर एक फाइल पड़ी थी—'मिसेस वर्मा की केस फाइल'। आज सुबह ऑपरेशन टेबल पर मिसेस वर्मा की मौत हो गई थी। दुनिया के लिए यह एक 'सर्जिकल कॉम्प्लिकेशन' था, एक दुर्घटना। लेकिन समीर जानता था, और सिर्फ समीर जानता था कि यह दुर्घटना नहीं, 'हत्या' थी। उसकी लापरवाही से हुई हत्या।
कल रात समीर एक पार्टी में देर तक रुका था। शराब ज्यादा हो गई थी। सुबह जब अस्पताल से कॉल आया, तो उसका नशा पूरी तरह उतरा नहीं था। हाथों में हल्का कंपन था। ऑपरेशन के दौरान एक नन्ही सी नस कट गई… और बस, सब कुछ खत्म। समीर ने अपनी टीम को चुप रहने का इशारा किया था, एनेस्थीसिया की रिपोर्ट में गड़बड़ी दिखाई, और सारा इल्जाम मशीनरी फेलियर पर डाल दिया। मिसेस वर्मा के परिवार वाले रोते-बिलखते रह गए, और समीर ने 'ईश्वर की मर्जी' कहकर पल्ला झाड़ लिया।
तभी दरवाजे पर हल्की सी आहट हुई। समीर चौंका। दरवाजे पर उसके पिता, मास्टर दीनानाथ खड़े थे। 75 साल के दीनानाथ, जो जिंदगी भर एक सरकारी स्कूल के अध्यापक रहे, उन्होंने अपनी पेंशन और सिद्धांतों के दम पर समीर को इतना बड़ा डॉक्टर बनाया था।
"जाग रहे हो बेटा?" दीनानाथ ने शांत स्वर में पूछा।
समीर ने जल्दी से फाइल बंद की और गिलास छिपाने की कोशिश की। "जी बाबूजी, बस कुछ केस स्टडी कर रहा था। आप सोए नहीं?"
दीनानाथ धीरे-धीरे चलते हुए कमरे में आए और समीर के सामने वाली कुर्सी पर बैठ गए। उनकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी, जो समीर के दिल को चीर रही थी।
"समीर, मैं तुम्हें बचपन से जानता हूँ। जब तुम झूठ बोलते हो, तो तुम्हारी बाईं आँख फड़कने लगती है," बाबूजी ने सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा।
समीर सकपका गया। "क्या कह रहे हैं बाबूजी? मैं क्यों झूठ बोलूँगा?"
"मिसेस वर्मा के पति आज शाम को मुझसे मिलने आए थे," दीनानाथ ने धीमे स्वर में कहा। "वो रो रहे थे समीर। कह रहे थे कि उनकी पत्नी बिल्कुल स्वस्थ थी, बस एक छोटा सा ट्यूमर था। उन्होंने अपनी सारी जमीन बेचकर तुम्हारी फीस भरी थी। वो कह रहे थे कि ऑपरेशन थिएटर के बाहर एक नर्स बात कर रही थी कि 'डॉक्टर साहब के हाथ कांप रहे थे'। क्या यह सच है समीर?"
समीर का चेहरा सफेद पड़ गया। "बाबूजी, वो नर्स झूठ बोल रही है। लोग तो कुछ भी कहते हैं। मैं शहर का टॉप सर्जन हूँ।"
"मैं डॉक्टर नहीं हूँ समीर, पर मैं तुम्हारा बाप हूँ," दीनानाथ की आवाज़ थोड़ी ऊंची हुई। "मैंने आज सुबह तुम्हें घर आते देखा था। तुम लड़खड़ा रहे थे। तुम्हारे मुंह से बदबू आ रही थी। मैंने सोचा तुम सो जाओगे, अस्पताल नहीं जाओगे। लेकिन तुम गए… पैसे और नाम की भूख में तुम गए।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर की सांसें भारी हो गई थीं। वह जानता था कि अब झूठ बोलने का कोई फायदा नहीं है। वह घुटनों के बल बैठ गया और बाबूजी के पैरों में सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा।
"बाबूजी, मुझसे गलती हो गई! बहुत बड़ी गलती। मैं डर गया था। अगर मैं सच बता देता तो मेरा लाइसेंस रद्द हो जाता। मेरा करियर खत्म हो जाता। लोग मुझे थूकते। मैंने इतनी मेहनत से यह 'मल्होत्रा हॉस्पिटल' खड़ा किया है, सब मिट्टी में मिल जाता। बाबूजी, मुझे माफ़ कर दीजिये!"
दीनानाथ ने समीर के सिर पर हाथ नहीं रखा। उन्होंने अपने पैर पीछे खींच लिए। समीर ने चौंककर ऊपर देखा। बाबूजी की आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरा सख्त था।
"उठो समीर," उन्होंने कड़क आवाज़ में कहा।
समीर खड़ा हो गया, कांपते हुए।
"तुम्हें क्या लगता है समीर? यह आलीशान बंगला, यह मर्सिडीज कार, यह अस्पताल… यह सब सफलता है? नहीं। जिस नींव पर यह सब खड़ा है, आज तुमने उसे ही खोखला कर दिया। तुमने एक औरत को नहीं मारा, तुमने एक पूरे परिवार की उम्मीदों को मारा है। और उससे भी बड़ी बात, तुमने आज उस 'समीर' को मार दिया जिसे मैंने ईमानदारी का पाठ पढ़ाया था।"
"तो मैं क्या करूँ बाबूजी? मैं जेल नहीं जा सकता। मैं बर्बाद हो जाऊँगा!" समीर चिल्लाया।
दीनानाथ ने अपनी लाठी उठाई और खड़े हो गए। "बर्बाद तो तुम उसी पल हो गए थे जब तुमने अपनी गलती छिपाने के लिए झूठ का सहारा लिया। समीर, दंड से मत घबराओ। दंड इंसान को शुद्ध करता है। अगर तुम अभी सच स्वीकार नहीं करोगे, तो जिंदगी भर अपनी ही नज़रों में गिरते रहोगे। तुम दुनिया को धोखा दे सकते हो, मुझे दे सकते हो, लेकिन उस शीशे में दिखने वाले आदमी को कैसे धोखा दोगे?"
समीर चुप रहा। उसका अंतर्मन युद्ध के मैदान जैसा बना हुआ था। एक तरफ उसका रूतबा, उसका नाम, उसका पैसा था। और दूसरी तरफ… बाबूजी के सिद्धांत और वो मरी हुई औरत का चेहरा।
"कल सुबह," दीनानाथ ने फैसला सुनाते हुए कहा, "हम दोनों पुलिस स्टेशन जाएंगे। तुम अपना जुर्म कबूल करोगे और मेडिकल काउंसिल के सामने सच रखोगे।"
"नहीं बाबूजी! आप पागल हो गए हैं?" समीर पीछे हट गया। "मेरी बदनामी होगी। आपका बेटा एक कातिल कहलाएगा। समाज में आप कैसे मुंह दिखाएंगे?"
दीनानाथ ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "मुझे उस बेटे का पिता कहलाने में शर्म आएगी जो कायर और झूठा है। लेकिन अगर मेरा बेटा अपनी गलती मानकर सजा भुगतता है, तो मैं गर्व से सिर उठा कर कहूँगा कि हाँ, उसने गलती की, पर उसमें सच बोलने की हिम्मत थी। चुनाव तुम्हारा है समीर—या तो तुम एक 'अमीर कायर' बनकर जी लो, या फिर एक 'साधारण बहादुर' इंसान बनकर।"
दीनानाथ कमरे से बाहर चले गए। समीर पूरी रात कुर्सी पर बैठा रहा। वह सोचता रहा, डरता रहा, रोता रहा। सुबह की पहली किरण के साथ, उसका नशा और उसका डर, दोनों उतर चुके थे।
अगले दिन सुबह 10 बजे, शहर के पुलिस स्टेशन में हलचल मच गई। शहर का सबसे बड़ा डॉक्टर खुद को सरेंडर करने आया था। उसके साथ एक बूढ़ा आदमी था, जो लाठी के सहारे चल रहा था, लेकिन जिसकी चाल में एक राजा जैसी शान थी।
समीर ने अपना गुनाह कबूल किया। मीडिया में भूचाल आ गया। ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगी— *"मशहूर सर्जन की लापरवाही ने ली जान, कबूलनामा सामने आया।"* जिन लोगों ने कल तक समीर को भगवान माना था, आज वे उसे गालियां दे रहे थे। समीर का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। उसे पाँच साल की सजा हुई। उसका अस्पताल सील हो गया। उसकी पत्नी बच्चों को लेकर मायके चली गई। सब कुछ… सब कुछ बिखर गया।
कोर्ट में जब सजा सुनाई गई, तो समीर कठघरे में खड़ा था। उसने पीछे मुड़कर देखा। पूरा कोर्ट रूम उसे हिकारत से देख रहा था। सिर्फ एक चेहरा था जिस पर सुकून था—दीनानाथ। उन्होंने दूर से ही समीर को सिर हिलाकर आश्वासन दिया। उस पल समीर को महसूस हुआ कि उसके कंधों से मनों भारी बोझ उतर गया है। हथकड़ी पहनते वक्त उसे दर्द नहीं हुआ, बल्कि एक अजीब सी आज़ादी महसूस हुई—झूठ के पिंजरे से आज़ादी।
पाँच साल बाद।
जेल के बड़े लोहे के गेट खुले। समीर बाहर आया। उसके बाल आधे सफेद हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रियां आ गई थीं। वह अब वो डैशिंग डॉ. समीर नहीं था। उसके पास न गाड़ी थी, न बंगला, न परिवार। उसके हाथ में सिर्फ एक कपड़ों का थैला था।
सामने एक छोटा सा ऑटो खड़ा था। उसमें से दीनानाथ उतरे। वे अब और भी बूढ़े हो चुके थे, कमर झुक गई थी। समीर दौड़कर उनके पास गया और उनके पैरों में गिर पड़ा। इस बार बाबूजी ने पैर पीछे नहीं खींचे। उन्होंने समीर को उठाया और कसकर गले लगा लिया।
"घर चलें?" बाबूजी ने पूछा।
"घर? कौन सा घर बाबूजी? वो बंगला तो कब का नीलाम हो गया," समीर ने नम आँखों से कहा।
"वो मकान था समीर, घर तो अब बनेगा," दीनानाथ मुस्कुराए।
वे दोनों शहर के एक छोटे से, पुराने इलाके में किराए के मकान में रहने लगे। समीर अब ऑपरेशन नहीं कर सकता था, उसका लाइसेंस छिन चुका था। लेकिन उसके हाथों में अभी भी सेवा का हुनर बाकी था। उसने अपने घर के बाहर एक छोटा सा बोर्ड लगाया— *"प्राथमिक चिकित्सा और परामर्श - निःशुल्क"*।
शुरुआत में लोग आने से कतराते थे। "ये वही खूनी डॉक्टर है," लोग ताना मारते। समीर सिर झुकाकर सुन लेता। वह जानता था यह उसका प्रायश्चित है। लेकिन धीरे-धीरे, उसकी सेवा और उसके सही निदान ने लोगों का दिल जीतना शुरू किया। वह अब पैसे के लिए नहीं, प्रायश्चित के लिए इलाज करता था। जो मरीज बड़े अस्पतालों से धक्के खाकर आते, समीर उनकी मरहम-पट्टी करता, उन्हें सही सलाह देता।
एक शाम, वही मिसेस वर्मा के पति, जो अब अकेले थे, समीर के क्लीनिक पर आए। समीर उन्हें देखकर खड़ा हो गया। उसे लगा आज वो उसे मारने आए हैं।
"डॉक्टर साहब," वर्मा जी ने हाथ जोड़े। "मेरी पोती को बहुत तेज बुखार है। सरकारी अस्पताल में डॉक्टर नहीं हैं। क्या आप देख लेंगे?"
समीर की आँखों से आंसू बह निकले। जिस आदमी की पत्नी को उसने अपनी लापरवाही से खोया था, आज वही आदमी अपनी पोती की जान उसके हाथों में सौंप रहा था।
"लाइए, मुझे दीजिये," समीर ने बच्ची को गोद में लिया।
इलाज के बाद जब बच्ची का बुखार उतरा, तो वर्मा जी ने समीर के हाथ पकड़ लिए। "डॉक्टर साहब, उस दिन मुझे आप पर बहुत गुस्सा था। लेकिन जिस दिन आपने कोर्ट में सच कबूला और सजा स्वीकार की, उसी दिन मैंने आपको माफ कर दिया था। गलती इंसान से होती है, पर उसे मानकर सजा भुगतने की ताकत फरिश्तों में होती है।"
उस रात समीर जब अपने छोटे से कमरे में सोने गया, तो उसे वैसी नींद आई जैसी मर्सिडीज और बंगले में कभी नहीं आई थी। बाबूजी बगल वाली चारपाई पर सो रहे थे। समीर ने मन ही मन सोचा— *"सच ने मेरा सब कुछ छीन लिया, लेकिन मुझे 'मैं' लौटा दिया।"*
दंड कठिन था, अपमानजनक था। पाँच साल जेल की कालकोठरी और बदनामी आसान नहीं थी। लेकिन उस दंड ने उसे वह सुकून दिया जो झूठ का महल कभी नहीं दे सकता था। उसने सीखा कि जीवन में गिरना हार नहीं है, गिरकर झूठ का सहारा लेना हार है।
आज समीर के पास दौलत नहीं है, पर इज्जत है। एक ऐसी इज्जत जिसमें डर की मिलावट नहीं है।
**समापन:**
दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि हम सब इंसान हैं और हमसे गलतियां होना स्वाभाविक है। लेकिन जब हम उस गलती को छिपाने के लिए झूठ बोलते हैं, तो हम एक गलती को गुनाह में बदल देते हैं। सच बोलना और अपनी गलती की सजा भुगतना थोड़े समय के लिए कड़वा जरूर लगता है, पर यह भविष्य को जहर बनने से बचा लेता है। दीनानाथ जैसे पिता और समीर जैसे बेटे हमें याद दिलाते हैं कि चरित्र की कमाई बैंक बैलेंस से कहीं ज्यादा कीमती होती है।
**एक सवाल आपके लिए:** अगर आप समीर की जगह होते, तो क्या आप अपना सब कुछ दांव पर लगाकर सच बोलने की हिम्मत जुटा पाते? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।
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