"एक माँ को अपनी ही संतान की असलियत देखने के लिए कभी-कभी बहू की 'बदतमीजी' का चश्मा पहनना पड़ता है। क्या एक बहू का कड़वा सच, बेटे के मीठे झूठ से ज्यादा पवित्र हो सकता है? पढ़िए एक ऐसी कहानी जो आपकी रूह को झकझोर देगी..."
"ये क्या बोल रही हो बहू... आज तो तुमने बदतमीजी की हद कर दी.... कैसी बेतुकी बातें कर रही हो..??" सुमित्रा जी गुस्से से कांपते हुए बोलीं। उनका चेहरा तमतमाया हुआ था और आँखों में अविश्वास था। जिस बहू को उन्होंने हमेशा अपनी बेटी माना, आज वही उनके सामने ऐसी शर्त रख रही थी जिसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी थी।
सामने खड़ी रश्मि की आँखों में भी आंसू थे, लेकिन उसका चेहरा सख्त था। उसने अपनी सास की आँखों में आँखें डालकर कहा, "हाँ माँ जी, आप इसे बदतमीजी समझें या बेहूदगी, लेकिन मेरा फैसला अटल है। अगर आप इस घर की रजिस्ट्री मेरे नाम नहीं करेंगी, तो मैं आज ही यह घर छोड़कर चली जाऊंगी, और वो भी हमेशा के लिए।"
सुमित्रा जी को लगा जैसे किसी ने उनके सीने पर पत्थर मार दिया हो। पास ही सोफे पर बैठा उनका बेटा, विकास, भी हैरान था। "रश्मि, पागल हो गई हो क्या? माँ से कैसे बात कर रही हो? और तुम्हें घर अपने नाम क्यों चाहिए? माँ तो वैसे भी हमारे साथ ही रहती हैं," विकास ने पत्नी को समझाने की कोशिश की।
रश्मि ने विकास की तरफ देखा तक नहीं। वह सीधे सुमित्रा जी से मुखातिब थी। "माँ जी, मुझे आज ही फैसला चाहिए। या तो घर मेरे नाम होगा, या फिर मैं जा रही हूँ।"
सुमित्रा जी सोफे पर धम्म से बैठ गईं। "मैंने तो सुना था कि कलयुग में बहुएँ सेवा नहीं करतीं, लेकिन तू तो मेरे जीते जी मुझे बेघर करने पर तुली है? अरे, मैंने तेरे लिए क्या नहीं किया? अपनी बीमारी में भी तुझे सुबह की चाय बनाकर दी, तेरे बच्चों को पाला, और आज तू जायदाद के लिए इतनी गिर गई?" सुमित्रा जी का गला रुंध गया।
विकास गुस्से में खड़ा हो गया। "रश्मि, अपनी जुबान पर लगाम लगाओ। माँ ने इस घर को मंदिर की तरह पूजा है। यह घर पिताजी की आखिरी निशानी है। मैं जीते जी इसे किसी के नाम नहीं होने दूंगा, और तुम... तुम इतनी लालची कब से हो गईं?"
रश्मि ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसी। "लालची? हाँ, हूँ मैं लालची। माँ जी, बोलिए... क्या आप साइन करेंगी?"
सुमित्रा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछीं और रश्मि की ओर घृणा से देखा। "ले जा... ले जा ये घर भी। जब औलाद ही पराई हो जाए, तो ईंट-पत्थरों का क्या मोह? बुलाओ वकील को, मैं अभी अंगूठा लगा देती हूँ। लेकिन याद रखना रश्मि, इस घर की दीवारों में मेरी आत्मा बसती है, तू कभी सुकून से नहीं रह पाएगी।"
महौल में सन्नाटा छा गया। रश्मि ने अपनी अलमारी से पहले से तैयार कुछ कागजात निकाले और सुमित्रा जी के सामने रख दिए। सुमित्रा जी के हाथ कांप रहे थे, लेकिन गुस्से और अपमान की आग में उन्होंने बिना पढ़े उन कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए।
"खुश है अब तू?" सुमित्रा जी ने रोते हुए कहा, "अब तो मिल गया तुझे तेरा महल? अब निकल जा मेरी नज़रों से।"
रश्मि ने वो कागज उठाए, उन्हें अपने सीने से लगाया और अचानक फफक-फफक कर रो पड़ी। उसका यह रूप देखकर विकास और सुमित्रा जी दोनों सन्न रह गए। अभी दो पल पहले जो औरत चट्टान की तरह खड़ी थी, अब वो बच्चे की तरह रो रही थी।
रश्मि ने कांपते हाथों से वो कागजात सुमित्रा जी की गोद में वापस रख दिए। "माँ जी... जरा पढ़िए तो सही कि मैंने आपसे साइन किस चीज पर करवाए हैं।"
सुमित्रा जी ने चश्मा ठीक किया और धुंधली आँखों से कागज देखे। वह कोई प्रॉपर्टी ट्रांसफर के कागज नहीं थे। वह "वृद्धाश्रम" (Old Age Home) का एक फॉर्म था, जिसे रश्मि ने भर रखा था—लेकिन उसमें सुमित्रा जी का नाम नहीं था।
सुमित्रा जी हड़बड़ा गईं। "ये... ये क्या है बहू?"
रश्मि ने अपने आंसू पोंछे और विकास की तरफ उंगली उठाई। "माँ जी, ये फॉर्म विकास ने मंगाया था। पिछले हफ्ते मैंने इसकी कार के डैशबोर्ड में यह ब्रोशर देखा था। इसने वहाँ बात भी कर ली थी। यह आपको दीवाली के बाद 'तीर्थ यात्रा' का बहाना बनाकर वहाँ छोड़ने वाला था। यह घर... जिसे आप मंदिर कहती हैं, विकास इसे गिरवी रखकर 'क्रिप्टो करेंसी' में पैसा लगाना चाहता है। उसे लगता है कि आप उसके रास्ते का काँटा हैं क्योंकि आप घर के कागज उसे नहीं दे रही थीं।"
कमरे में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी की गर्दन धीरे-धीरे विकास की तरफ घूमी। विकास की नजरें झुकी हुई थीं, उसके माथे पर पसीना चमक रहा था। उसकी चोरी पकड़ी गई थी।
रश्मि सुमित्रा जी के घुटनों के पास बैठ गई और उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। "माँ जी, मैंने आपसे बदतमीजी की, मैंने आपको लालची बहू बनकर डराया, क्योंकि मैं जानती थी कि आप प्यार से कभी मेरी बात नहीं मानतीं। अगर मैं कहती कि आपका बेटा आपको धोखा दे रहा है, तो आप 'ममता' में आकर उसे ही घर सौंप देतीं। आप कहतीं—'मेरा मुन्ना ऐसा नहीं कर सकता'। मुझे आपको गुस्सा दिलाना पड़ा ताकि आप डर के मारे या गुस्से में ही सही, किसी कागज पर साइन करें। लेकिन वो कागज घर के नहीं, बल्कि एक 'वसीयत' के थे जिसे मैंने वकील से छिपकर बदलवा दिया था।"
सुमित्रा जी ने कागज पलटकर देखा। नीचे के पन्नों पर एक वसीयत थी जिस पर लिखा था कि "यह घर सुमित्रा देवी के जीवनकाल में न तो बेचा जा सकता है और न ही किसी को उपहार में दिया जा सकता है। उनकी मृत्यु के बाद यह घर 'अनाथालय' को दान कर दिया जाएगा।"
रश्मि ने सिसकते हुए कहा, "मैंने यह शर्त इसलिए लिखवाई माँ जी, ताकि न यह घर मेरा हो, न विकास का। जब तक आप हैं, यह छत आपकी है। मैं नहीं चाहती थी कि कल को मेरा पति आपको बेघर कर दे। मुझे माफ कर दीजिए माँ जी... मुझे 'कुलक्षणी' और 'बदतमीज़' बनना मंजूर था, लेकिन अपनी आँखों के सामने आपको अनाथ होते देखना मंजूर नहीं था।"
सुमित्रा जी सन्न रह गईं। जिस बेटे को उन्होंने अपनी छाती का दूध पिलाकर बड़ा किया, वह उन्हें घर से निकालने की साजिश रच रहा था? और जिस बहू को वह अभी 'पराया' और 'लालची' कह रही थीं, उसने अपनी इज्जत दांव पर लगाकर उनकी छत बचाई थी?
विकास शर्म के मारे कुछ बोल नहीं पा रहा था। वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया।
सुमित्रा जी ने रश्मि को खींचकर अपने गले लगा लिया। दोनों सास-बहू लिपटकर रोने लगीं। सुमित्रा जी के आंसू पश्चाताप के थे, और रश्मि के आंसू सुकून के।
"पगली..." सुमित्रा जी ने रश्मि का सिर सहलाते हुए कहा, "तूने तो आज मुझे हरा दिया। मैं सोचती थी कि मैंने एक बेटा और एक बेटी (बहू) पाई है। पर आज पता चला कि बेटा तो कब का 'व्यापारी' बन गया, और जिसे मैं 'बहू' समझती रही, वो तो मेरी 'माँ' बनकर मेरी रक्षा कर रही थी। तूने बदतमीजी नहीं की रश्मि... तूने आज मेरा बुढ़ापा सँवार दिया।"
रश्मि ने मुस्कुराते हुए सास के आंसू पोंछे। "माँ जी, कड़वी दवाई ही बीमारी काटती है। मुझे पता था आप मुझसे नफरत करेंगी, पर आपकी सुरक्षा के लिए मैं पूरी दुनिया से बुरा बनने को तैयार हूँ।"
उस रात घर में खाना नहीं बना, लेकिन रिश्तों की जो नई खिचड़ी पकी थी, उसने परिवार की नींव को पहले से ज्यादा मजबूत कर दिया था। विकास को अपनी गलती का अहसास हुआ या नहीं, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन सुमित्रा जी को यह समझ आ गया था कि खून के रिश्ते से बड़ा 'दिल' का रिश्ता होता है। और कभी-कभी अपनों को बचाने के लिए 'बुरा' बनना पड़ता है।
कहानी का मर्म:
अक्सर हम मीठा बोलने वालों पर भरोसा कर लेते हैं और कड़वा बोलने वालों को गलत समझ लेते हैं। लेकिन जो व्यक्ति आपके हित के लिए अपनी छवि खराब करने को तैयार हो जाए, उससे ज्यादा सगा आपका कोई नहीं हो सकता। रिश्तों में 'मर्यादा' जरूरी है, लेकिन 'अंधापन' नहीं। एक जागरूक बहू या बेटी ही घर को टूटने से बचा सकती है, चाहे इसके लिए उसे बागी ही क्यों न बनना पड़े।
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