"दुनिया के लिए वो 'मिस्टर परफेक्ट' थे, जिनकी जुबान से शहद टपकता था। लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर वो किसी तानाशाह से कम नहीं थे। आखिर क्यों हम गैरों को अपना सबसे बेहतरीन रूप दिखाते हैं और अपनों को सिर्फ अपनी थकान और झुंझलाहट? पढ़िये शेखर की कहानी जो शायद हम में से कई लोगों का आईना है, और पूछिये खुद से—क्या आप भी दो जिंदगियां जी रहे हैं?"
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शाम के सात बज रहे थे। शहर के मशहूर 'रॉयल कैफे' में ठहाके गूंज रहे थे। शेखर अपनी कंपनी के कुछ क्लाइंट्स और सहकर्मियों के साथ बैठा था। उसने अभी-अभी एक बेहतरीन चुटकुला सुनाया था, जिस पर सब लोट-पोट हो रहे थे।
"अरे शेखर सर! कमाल हैं आप," सामने बैठी मिसेस खन्ना ने हंसते हुए कहा। "आपसे बात करके तो दिन भर की थकान मिट जाती है। आपकी पत्नी कितनी खुशकिस्मत होंगी, उन्हें तो घर में एंटरटेनमेंट के लिए टीवी की जरूरत ही नहीं पड़ती होगी। आप इतना अच्छा बोलते हैं, इतना सम्मान देते हैं।"
शेखर ने एक विनीत मुस्कान के साथ सिर झुकाया। "धन्यवाद मैम। बस, मैं मानता हूं कि वाणी ही इंसान का असली गहना है। अगर हम मीठा नहीं बोल सकते, तो चुप रहना बेहतर है।"
वहां मौजूद हर शख्स शेखर की तारीफ कर रहा था। वह वाकई बहुत मृदुभाषी, मिलनसार और 'जेंटलमैन' था। उसने वेटर को भी 'बेटा' कहकर बुलाया था और बिल देते वक्त उसे अच्छी टिप के साथ-साथ दुआएं भी दी थीं।
घड़ी की सुई आठ पर पहुंची। पार्टी खत्म हुई। शेखर ने सबको अलविदा कहा, अपनी कार में बैठा और घर की ओर चल पड़ा।
जैसे-जैसे कार घर के करीब पहुंच रही थी, शेखर के चेहरे का भूगोल बदल रहा था। वो चमकती हुई आंखें अब बुझ चुकी थीं, होंठों पर सजी मुस्कान गायब हो गई थी और माथे पर एक स्थायी शिकन आ गई थी। कार का दरवाजा खुलने तक, वह 'रॉयल कैफे' वाला शेखर नहीं रहा था।
उसने घर की घंटी बजाई। दरवाजा उसकी पत्नी, निशा ने खोला। निशा के चेहरे पर एक थकी हुई लेकिन उम्मीद भरी मुस्कान थी।
"आ गए आप? पानी लाऊं?" निशा ने पूछा।
शेखर ने बिना उसकी तरफ देखे अपने जूते उतारे और सोफे पर फेंक दिए। "हटो सामने से। आते ही शुरू हो गई—पानी लाऊं, चाय लाऊं। अरे भाई, सांस तो लेने दो। दिन भर बाहर मगजमारी करके आता हूं, घर में घुसते ही नौकरानी की तरह सिर पर मत चढ़ा करो।"
निशा की मुस्कान मुरझा गई। वह चुपचाप रसोई में पानी लेने चली गई।
तभी अंदर के कमरे से शेखर की बूढ़ी माँ, कावेरी देवी, अपनी लाठी टेकते हुए बाहर आईं। उनके घुटनों में बहुत दर्द रहता था, फिर भी बेटे की आहट सुनकर वे रुक न सकीं।
"बेटा, आ गया? आज डॉक्टर के पास गई थी, उन्होंने कहा है कि वो वाली दवा बदलनी पड़ेगी..."
शेखर ने अपना फोन निकालते हुए झुंझलाकर जवाब दिया, "माँ, प्लीज! अभी मैं ऑफिस के ईमेल चेक कर रहा हूं। आपकी बीमारियों का पुराण सुनने का वक्त नहीं है मेरे पास। टेबल पर पर्चा रख देना, मंगवा दूंगा। अब शांति से बैठने दोगी या मैं वापस बाहर चला जाऊं?"
कावेरी देवी का चेहरा उतर गया। उन्होंने धीरे से कहा, "नहीं बेटा, तू काम कर ले।" और वे वापस अपने कमरे में मुड़ गईं।
यह इस घर की रोज की कहानी थी। शेखर, जो बाहर दुनिया के लिए फरिश्ता था, घर में पत्थर बन जाता था। अगर पड़ोसी की बीवी बीमार हो, तो शेखर फलों की टोकरी लेकर सबसे पहले पहुंचता और पूछता, "भाभी जी, कोई भी जरूरत हो तो बताइएगा, मैं हूँ न।" लेकिन अगर अपनी पत्नी निशा को बुखार हो, तो उसका ताना होता, "तुम्हें तो रोज कोई न कोई बीमारी लगी रहती है। अब खाना कौन बनाएगा?"
अगर ऑफिस में किसी जूनियर से गलती हो जाए, तो शेखर उसे समझाता, "कोई बात नहीं, गलतियों से ही इंसान सीखता है।" लेकिन अगर घर में उसके आठ साल के बेटे, आरव, से पानी का गिलास गिर जाए, तो घर में कोहराम मच जाता। "अंधा है क्या? दिखाई नहीं देता? सब के सब जाहिल भरे पड़े हैं इस घर में।"
निशा अक्सर सोचती थी कि क्या यह वही आदमी है जिससे उसकी शादी हुई थी? या फिर शेखर के अंदर दो लोग रहते हैं? एक वो जो दुनिया को दिखाने के लिए है, और एक वो जो असलियत में है।
एक रविवार, शेखर के बचपन का दोस्त, विनीत, अपनी पत्नी मेघा के साथ उनके शहर आया हुआ था। शेखर ने उन्हें लंच पर बुलाया। शेखर अपनी 'सोशल इमेज' को लेकर बहुत सतर्क था, इसलिए उसने निशा को सख्त हिदायत दी थी कि खाना एकदम फाइव स्टार जैसा होना चाहिए और घर चमकना चाहिए।
दोपहर को विनीत और मेघा आए। शेखर का व्यवहार फिर बदल गया। वह दरवाजे पर ही बाहें फैलाकर मिला।
"अरे भाभी! आप तो दिन-ब-दिन और जवान होती जा रही हैं," शेखर ने मेघा से चहकते हुए कहा। "विनीत यार, तू कितना लकी है।"
निशा ट्रे में शरबत लेकर आई। शेखर ने लपक कर ट्रे निशा के हाथ से ले ली और बड़े प्यार से मेघा को ग्लास थमाया। "लीजिए भाभी, निशा ने खास आपके लिए बनाया है।"
बातों-बातों में मेघा ने कहा, "भैया, पानी थोड़ा और मिलेगा?"
शेखर तुरंत खड़ा हो गया। "अरे आप बैठिए, मैं लाता हूं।" वह रसोई में गया। निशा वहां रोटियां सेक रही थी।
शेखर ने दबी लेकिन गुस्से भरी आवाज में कहा, "तुम्हें अकल नहीं है? टेबल पर जग खाली पड़ा है। मेहमानों के सामने मेरी बेइज्जती करानी है क्या? एक काम ढंग से नहीं होता तुमसे।"
निशा की आँखों में आंसू आ गए, लेकिन उसने पल्लू से पोंछ लिए और जग भरकर बाहर भिजवा दिया।
खाना खाते वक्त शेखर ने मेघा की साड़ी की तारीफ की। "भाभी, यह रंग आप पर बहुत जंचता है। बहुत सोबर चॉइस है आपकी।"
निशा ने वही साड़ी पहनी थी जो शेखर ने पिछले साल दीवाली पर दिलवाई थी और तब कहा था कि "यह तुम पर बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही, तुम इसमें और मोटी लग रही हो।" आज वही निशा, उसी साड़ी में चुपचाप सबको खाना परोस रही थी, और शेखर की नजर उस पर एक बार भी प्रशंसा के भाव से नहीं पड़ी।
विनीत, जो शेखर को बचपन से जानता था, एक बहुत ही सुलझा हुआ इंसान था। वह पिछले दो घंटों से शेखर के व्यवहार को बहुत बारीकी से देख रहा था। उसे शेखर की 'ओवर-एक्टिंग' और निशा की 'खामोशी' के बीच का विरोधाभास साफ दिखाई दे रहा था।
खाना खाने के बाद, सब ड्राइंग रूम में बैठे थे। आरव अपना स्कूल का प्रोजेक्ट लेकर आया।
"पापा, देखो मैंने रोबोट बनाया," आरव ने उत्साह से कहा।
शेखर ने मेघा और विनीत के सामने अपनी 'बाप' वाली छवि चमकाने के लिए आरव को पास बुलाया। "अरे वाह! मेरा बेटा तो जीनियस है। बहुत बढ़िया बेटा!" उसने आरव के गाल चूमे।
आरव हैरान था। आमतौर पर जब वह पापा को कुछ दिखाता था, तो उसे डांट पड़ती थी कि "पढ़ाई छोड़ कर इन फालतू चीजों में समय बर्बाद मत करो।" बच्चा समझ नहीं पा रहा था कि आज पापा इतने अच्छे क्यों हैं।
शाम को जब विनीत और मेघा जाने लगे, तो शेखर उन्हें कार तक छोड़ने आया।
विनीत ने कार का दरवाजा खोला, फिर रुका और शेखर के कंधे पर हाथ रखा।
"शेखर, यार एक बात बोलूं? बुरा तो नहीं मानेगा?"
शेखर मुस्कुराया, "अरे बोल न यार, अपन तो भाई हैं।"
विनीत ने गंभीर होकर कहा, "यार, तू दुनिया का सबसे बेहतरीन दोस्त है, सबसे अच्छा होस्ट है, और शायद ऑफिस में सबसे अच्छा बॉस भी होगा। लेकिन..."
"लेकिन क्या?" शेखर ने पूछा।
"लेकिन तू एक बहुत बुरा पति और एक बहुत कमजोर पिता है," विनीत ने सीधे आंखों में देखकर कहा।
शेखर के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। "यह क्या कह रहा है तू?"
विनीत ने समझाया, "देख भाई, मैंने देखा कि तूने मेघा से कितनी तमीज से बात की। तूने उसे पानी तक खुद उठकर दिया। उसकी साड़ी की तारीफ की। लेकिन अंदर... जब निशा भाभी से सब्जी में नमक थोड़ा ज्यादा हो गया था, तो तूने उन्हें जिस तरह घूरा था, वो मैंने देख लिया था। तूने मेघा से कहा 'प्लीज बैठिए', लेकिन निशा भाभी को तूने एक बार भी साथ बैठने को नहीं कहा। वो बस परोसती रहीं।"
शेखर कुछ बोलने लगा, लेकिन विनीत ने रोक दिया।
"सुन, हम गैरों से अच्छा व्यवहार इसलिए करते हैं क्योंकि हमें उनकी 'गुड बुक्स' में रहना होता है, हमें अपनी इमेज बनानी होती है। हम जानते हैं कि अगर पड़ोसी से बदतमीजी करेंगे तो वो हमें छोड़ देगा, बुरा भला कहेगा। लेकिन हमें लगता है कि घर वाले तो 'फिक्स्ड डिपॉजिट' हैं। वो कहां जाएंगे? मां है, बीवी है, बच्चे हैं... ये तो अपने हैं, इनसे कैसा भी व्यवहार करो, ये तो सहेंगे ही।"
विनीत की बातें शेखर को चुभ रही थीं।
"शेखर, जिस दिन तूने निशा भाभी से वैसे ही बात कर ली जैसे तू आज मेघा से कर रहा था... कसम से कहता हूँ, तेरे घर के ये मुरझाए हुए पौधे फिर से खिल जाएंगे। बाहर वालों की तालियां बटोर कर क्या करेगा जब घर लौटने पर तुझे सिर्फ खामोशी और डर मिले? तूने आरव को गले लगाया तो वो सहम गया था, क्योंकि उसे तेरे प्यार की आदत नहीं है। सोच इस बारे में।"
विनीत गाड़ी में बैठकर चला गया। शेखर सड़क पर अकेला खड़ा रह गया। शाम का अंधेरा घिर आया था।
वह बहुत देर तक गेट पर खड़ा रहा। उसे याद आया कि आज उसने मिसेस खन्ना की तारीफ की थी, वेटर को दुआएं दी थीं, मेघा को रानी की तरह ट्रीट किया था। और निशा? निशा को उसने सिर्फ आदेश दिए थे। माँ को उसने झिड़क दिया था।
क्या वाकई वह दोहरी जिंदगी जी रहा था? क्या उसका असली चेहरा वह क्रूर इंसान था जो घर के अंदर रहता है, और बाहर वाला चेहरा सिर्फ एक मुखौटा था?
भारी कदमों से वह अंदर आया। घर में सन्नाटा था। निशा डाइनिंग टेबल साफ कर रही थी। आरव अपने कमरे में जा चुका था। माँ टीवी के सामने बैठी थीं, लेकिन आवाज म्यूट थी। उसे देखकर सब सतर्क हो गए, जैसे कोई खतरा आ गया हो। यह डर... यह डर ही तो उसकी कमाई थी आज तक की।
शेखर धीरे से रसोई में गया। निशा बर्तन धो रही थी। उसकी कमर उनकी तरफ थी।
शेखर ने गला साफ किया। "निशा..."
निशा का हाथ कांप गया। शायद उसे लगा कि कोई और गलती निकल आई है। वह पलटी, उसकी नजरें झुकी हुई थीं। "जी? वो... वो नमक ज्यादा था न, अगली बार ध्यान रखूंगी।"
शेखर का दिल बैठ गया। उसकी पत्नी उससे बात नहीं कर रही थी, वह अपनी सफाई पेश कर रही थी।
शेखर ने हिम्मत जुटाई। वह शब्द जो वह दिन भर में पचास बार अजनबियों से बोलता था, आज अपनों से बोलने में उसका गला सूख रहा था।
"निशा, वो... आज खाना बहुत अच्छा बना था। खासकर वो पनीर की सब्जी। मेघा भी तारीफ कर रही थी।"
निशा के हाथ से जूना (scrubber) छूट गया। उसने आश्चर्य से सर उठाकर शेखर को देखा। क्या उसने सही सुना? पिछले पांच सालों में शायद पहली बार शेखर ने उसके खाने की तारीफ की थी।
"और सुनो," शेखर ने आगे कहा, "तुम थक गई होगी। रहने दो ये बर्तन, सुबह बाई कर लेगी। आओ, बैठकर चाय पीते हैं। मैंने आज माँ से भी ठीक से बात नहीं की।"
निशा की आँखों में अविश्वास था, लेकिन धीरे-धीरे उस अविश्वास की जगह एक हल्की सी चमक ने ले ली। वह चमक जो किसी महंगे हीरे से ज्यादा कीमती थी।
शेखर बाहर आया और माँ के पास बैठ गया। उसने माँ के पैरों को दबाना शुरू किया।
माँ हड़बड़ा गईं। "अरे! अरे! रहने दे बेटा, तू थक गया होगा।"
"दबाने दो माँ," शेखर ने माँ के घुटने पर सिर रख दिया। "मैं बाहर दुनिया जीतने की कोशिश कर रहा था, और यह भूल गया कि मेरी असली दुनिया तो इस घर में है। अगर मैं बाहर वालों के लिए 'देवता' और तुम्हारे लिए 'राक्षस' हूँ, तो मैं एक असफल इंसान हूँ माँ।"
उस रात उस घर में कोई पार्टी नहीं थी, कोई संगीत नहीं था। लेकिन सालों बाद उस घर की दीवारों ने हंसी की आवाज सुनी। शेखर ने आरव को पास बिठाकर उसके रोबोट की कहानी सुनी। उसने निशा से पूछा कि उसे दीवाली पर क्या चाहिए। उसने माँ की दवाइयों का पूरा हाल जाना।
शेखर को महसूस हुआ कि विनीत सही कह रहा था। जब उसने अपनी 'बाहरी' मिठास का इस्तेमाल 'घर' में किया, तो उसे जो सुकून मिला, वह किसी भी क्लाइंट की तारीफ से बड़ा था।
स्वर्ग आसमान में नहीं होता। स्वर्ग वहां होता है जहां हम अपनों से सम्मान और प्रेम से बात करते हैं। हम अक्सर सोचते हैं कि पैसा और तोहफे रिश्तों को सुधार देंगे, लेकिन सच तो यह है कि बीवी को हीरे का हार नहीं, पति के दो मीठे बोल चाहिए होते हैं। माँ को बड़ा अस्पताल नहीं, बेटे के पास बैठकर दो घड़ी बतियाना चाहिए होता है।
अगली सुबह जब शेखर ऑफिस के लिए निकला, तो निशा ने उसे टिफिन दिया। आज निशा की मुस्कान में थकान नहीं थी, एक ताज़गी थी। शेखर ने जाते-जाते कहा, "शाम को जल्दी आऊंगा, आरव को पार्क ले जाना है।"
घर का दरवाजा बंद हुआ, तो शेखर ने महसूस किया कि आज उसका 'नकाब' उतर चुका है। आज वह एक ही चेहरा लेकर जा रहा है, और वह चेहरा खुश है।
रिश्ते कांच के नहीं होते जो पत्थर मारने पर ही टूटें; कभी-कभी कड़वी जुबान और बेरुखी का तेजाब भी उन्हें धीरे-धीरे गला देता है। और मीठी वाणी वो मरहम है जो गहरे से गहरे घाव भर सकती है।
शुरुआत आज से ही करें। जो "थैंक यू", "प्लीज" और "आप बहुत अच्छे हैं" हम बाहर बांटते फिरते हैं, उसे आज घर लेकर आएं। देखियेगा, घर सचमुच मंदिर बन जाएगा।
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**लेखक का संदेश:**
यह कहानी उन सभी के लिए एक सवाल है—आपकी सबसे अच्छी मुस्कान का हकदार कौन है? वो बॉस जो कल आपको निकाल सकता है, या वो जीवनसाथी जो बुढ़ापे तक आपका साथ निभाएगा? वो पड़ोसी जो सिर्फ तमाशा देखते हैं, या वो माँ-बाप जिन्होंने आपको बोलना सिखाया? अपनी प्राथमिकताएं तय करें। बाहर अच्छा बनना एक 'कला' हो सकती है, लेकिन घर में अच्छा होना ही असली 'चरित्र' है।
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