घर के उस कोने में बैठी खामोशी

 "जिस पिता ने अपनी आवाज़ दबाकर बेटे की हर ज़िद पूरी की, आज उसी बेटे की ऊँची आवाज़ और बेरुखी ने पिता को गूंगा बना दिया। क्या एक ही छत के नीचे रहते हुए भी मीलों की दूरियां हो सकती हैं?"


---


शाम के सात बज रहे थे। दिल्ली के पॉश इलाके वसंत कुंज के उस आलीशान फ्लैट में सब कुछ अपनी जगह पर एकदम सही था। इटालियन मार्बल चमक रहा था, झूमर की रोशनी आँखों को सुकून दे रही थी। लेकिन 72 साल के विश्वनाथ जी के लिए यह घर, घर कम और एक 'वेटिंग रूम' ज्यादा लगता था।


विश्वनाथ जी बालकनी में अपनी आराम कुर्सी पर बैठे थे। उनकी नज़र गेट पर टिकी थी। यह उनकी रोज़ की दिनचर्या थी। बेटा, समीर, ऑफिस से आने वाला था।


जैसे ही काले रंग की एसयूवी गेट के अंदर दाखिल हुई, विश्वनाथ जी के चेहरे पर एक चमक आ गई। वह अपनी लाठी के सहारे खड़े हुए और धीरे-धीरे अंदर ड्राइंग रूम की तरफ बढ़े। उन्हें पता था कि समीर थका हुआ होगा, शायद पानी मांगेगा, या शायद आज पूछ ले कि "पापा, घुटनों का दर्द कैसा है?"


समीर अंदर आया। कान पर ब्लूटूथ लगा हुआ था।

"हाँ, प्रोजेक्ट रिपोर्ट कल मिल जाएगी। आई एम ऑन इट," वह फ़ोन पर किसी पर चिल्ला रहा था।


उसने जूते उतारे और सोफे पर धप्प से बैठ गया। विश्वनाथ जी उसके पास गए।

"बेटा, पानी ला दूँ?" उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा, जैसे डर रहे हों कि उनकी आवाज़ बेटे की बातचीत में खलल न डाल दे।


समीर ने फ़ोन से नज़र हटाई, एक पल के लिए पिता को देखा, और फिर हाथ से इशारे से मना कर दिया। उसने मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाला। फिर वह उठा और अपने बेडरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया।


विश्वनाथ जी वहीं खड़े रहे। वह हाथ, जो अभी हवा में ही था, धीरे-धीरे नीचे गिर गया। यह कोई नई बात नहीं थी। पिछले दो सालों से यही हो रहा था। न कोई झगड़ा, न कोई गाली-गलौज, बस एक जानलेवा 'चुप्पी'। समीर उनसे बात नहीं करता था। वह बस उन्हें 'सह' रहा था, जैसे घर में पड़ा कोई पुराना फर्नीचर जिसे फेंकने में लोग क्या कहेंगे, इस डर से रखा गया हो।


विश्वनाथ जी वापस अपनी बालकनी में आ गए। उनकी पत्नी, सुधा, को गुज़रे हुए पाँच साल हो चुके थे। जब तक सुधा थीं, घर में आवाज़ें थीं। सुधा समीर से लड़ लेती थीं, उसका हक़ मांग लेती थीं। लेकिन सुधा के जाने के बाद, विश्वनाथ जी एकदम अकेले पड़ गए थे।


उन्हें याद आया वो दिन जब समीर छोटा था। स्कूल से आते ही वह बस्ता फेंककर सीधा उनकी गोद में चढ़ जाता था। "पापा, आज स्कूल में ये हुआ... पापा, मुझे क्रिकेट बैट चाहिए..." उसकी बातें खत्म ही नहीं होती थीं। विश्वनाथ जी अपनी सरकारी नौकरी की थकान भूलकर घंटों उसकी बकवास सुनते थे। और आज? आज उनके पास कहने को बहुत कुछ था, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।


अगले दिन रविवार था। घर में चहल-पहल थी। समीर की पत्नी, नताशा, घर को सजा रही थी। आज समीर की कंपनी के बॉस डिनर पर आने वाले थे।


"पापा," नताशा ने विश्वनाथ जी के कमरे में आकर कहा, "आज शाम को गेस्ट आ रहे हैं। आप प्लीज अपने कमरे में ही रहिएगा। खाना मैं यहीं भिजवा दूंगी। वो लोग थोड़ा ड्रिंक्स वगैरह लेंगे, तो आपको अनकम्फर्टेबल लगेगा।"


विश्वनाथ जी समझ गए। उन्हें 'अनकम्फर्टेबल' नहीं लगेगा, बल्कि समीर को उन्हें अपने बॉस से मिलवाने में शर्म आएगी। एक साधारण सा, कुर्ता-पाजामा पहनने वाला, हिंदी बोलने वाला बूढ़ा बाप—समीर की 'मॉडर्न कॉर्पोरेट इमेज' में फिट नहीं बैठता था।


"ठीक है बहू," विश्वनाथ जी ने फीकी मुस्कान के साथ कहा। "वैसे भी मेरी तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है।"


शाम हुई। महफ़िल जम गई। बाहर से हंसी-ठिठोली की आवाज़ें आ रही थीं। विश्वनाथ जी अपने कमरे में बंद थे। उन्हें प्यास लगी थी, लेकिन जग खाली था। बाहर जाने की हिम्मत नहीं थी, कहीं समीर को बुरा न लग जाए। उन्होंने अपनी सूखी जीभ होंठों पर फेरी और लेटे रहे।


तभी उन्हें बाहर से समीर की आवाज़ सुनाई दी। शायद वह अपने बॉस से बात कर रहा था।

"अरे सर, मेरे पिता जी तो कब के गुज़र गए। माँ और मैं ही थे, फिर माँ भी चली गईं। मैंने अपनी मेहनत से यह सब खड़ा किया है।"


विश्वनाथ जी के कानों में जैसे पिघला हुआ सीसा डाल दिया गया हो। उनका बेटा... उनका अपना खून... जीते जी उन्हें मार चुका था? सिर्फ़ अपनी झूठी शान के लिए? सिर्फ़ इसलिए ताकि उसे यह न बताना पड़े कि उसका बाप एक साधारण क्लर्क था?


उस रात विश्वनाथ जी सोए नहीं। उनकी आँखों से आंसू भी नहीं निकले। कहते हैं न, जब चोट बहुत गहरी होती है, तो खून नहीं निकलता, बस रूह सुन्न पड़ जाती है।


अगली सुबह, जब समीर सोकर उठा, तो घर में अजीब सी शांति थी। अमूमन इस समय तक पापा के रेडियो पर पुराने गाने बजने लगते थे। समीर ने ध्यान नहीं दिया। वह तैयार होकर ऑफिस जाने लगा।


"नताशा, पापा का नाश्ता दे दिया?" उसने जूते पहनते हुए पूछा।


"कमरे का दरवाज़ा खुला है, पर वो अंदर नहीं हैं," नताशा ने किचन से आवाज़ दी। "शायद पार्क गए होंगे।"


समीर निकल गया। शाम को जब वह लौटा, तब भी विश्वनाथ जी नहीं थे। अब थोड़ी चिंता हुई। उसने उनके फ़ोन पर कॉल किया। फ़ोन कमरे में ही बज रहा था। बिस्तर के पास वाली टेबल पर फ़ोन रखा था, और उसके नीचे एक लिफाफा।


समीर ने कांपते हाथों से लिफाफा उठाया। उसमें एक खत था और घर की चाबियाँ।


*प्रिय समीर,*


*कल रात तुम्हारे बॉस आए थे। माफ़ करना, मुझे प्यास लगी थी तो मैं पानी लेने बाहर आ गया था। मैंने सुन लिया बेटा। तुमने कहा कि तुम्हारे पिता गुज़र चुके हैं।*


*मैं उस वक़्त बहुत रोना चाहता था, तुम पर चिल्लाना चाहता था। लेकिन फिर मैंने सोचा, गलती तुम्हारी नहीं है। गलती मेरी है। मैं शायद अब तुम्हारे जीवन में एक 'ज़रूरत' नहीं, बल्कि एक 'रुकावट' बन गया हूँ। माँ-बाप को सबसे गहरा ज़ख्म तब नहीं मिलता जब बच्चे उन्हें घर से निकाल देते हैं, बल्कि तब मिलता है जब बच्चे दुनिया के सामने उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैं।*


*तुम्हारी वो बात सुनकर मुझे लगा कि मैं सच में मर ही जाऊं तो अच्छा है, कम से कम तुम्हारा झूठ तो सच हो जाएगा। मैं जा रहा हूँ बेटा। हरिद्वार। वहां एक वृद्धाश्रम है, मेरे मित्र वहां रहते हैं। मैंने अपनी पेंशन का इंतज़ाम कर लिया है, तुम्हें बोझ नहीं डालूँगा।*


*बस एक विनती है, जिस तरह तुमने दुनिया के सामने मुझे मार दिया, अपने दिल से भी निकाल देना। क्योंकि अगर कभी तुम्हें मेरी याद आई और तुम मुझे ढूँढने आए, तो शायद मैं अपनी उन आँखों से तुम्हें नहीं देख पाऊँगा जिनमें अब सिर्फ़ शर्मिंदगी नहीं, परायापन बस गया है।*


*खुश रहना।*

*- तुम्हारा (अब मृत) पिता।*


समीर के हाथ से चिट्ठी छूट कर गिर गई। वह वहीं फर्श पर बैठ गया। "पापा..." उसके मुंह से एक चीख निकली।


वह भागा। नताशा घबरा कर आई। "क्या हुआ समीर?"


"पापा चले गए नताशा! उन्होंने सब सुन लिया था!" समीर पागलों की तरह रो रहा था। "मैंने क्या कर दिया? मैंने अपनी झूठी इमेज के लिए अपने भगवान जैसे बाप को..."


समीर ने तुरंत अपनी गाड़ी निकाली। उसे नहीं पता था कि पापा किस बस से गए हैं, या ट्रेन से। वह पागलों की तरह कश्मीरी गेट बस अड्डे की तरफ भागा। उसकी आँखों के सामने बचपन की वो तस्वीरें घूम रही थीं जब पापा उसे कंधों पर बिठाकर मेला दिखाने ले जाते थे। वही पापा, जिन्हें उसने कल रात 'मरा हुआ' बता दिया था।


बस अड्डे पर भारी भीड़ थी। समीर हर बूढ़े चेहरे में अपने पिता को तलाश रहा था। "पापा! पापा!" वह चिल्ला रहा था। लोग उसे पागल समझ रहे थे।


तभी उसे एक बेंच पर, कोने में, एक परिचित आकृति दिखाई दी। विश्वनाथ जी अपना छोटा सा बैग गोद में रखे, सिर झुकाए बैठे थे। उनकी बस आने में अभी वक़्त था।


समीर दौड़कर उनके पास गया और उनके पैरों में गिर पड़ा।


"पापा!"


विश्वनाथ जी ने चौंका कर देखा। समीर उनके पैरों पर अपना सिर रखकर फूट-फूट कर रो रहा था। महंगे सूट वाला, बड़ी कंपनी का वीपी, आज बस अड्डे के गंदे फर्श पर एक बच्चे की तरह बिलख रहा था।


"मुझे माफ़ कर दीजिये पापा। मैं अंधा हो गया था। मुझे मार दीजिये, मुझे गालियां दीजिये, लेकिन मुझे छोड़कर मत जाइये। मैं मर जाऊंगा आपके बिना।"


विश्वनाथ जी ने उसे देखा। उनकी आँखों में अभी भी वो दर्द था, वो ज़ख्म था जो समीर के शब्दों ने दिया था। लेकिन पिता का दिल... वो तो मोम का होता है। चाहे औलाद उसे पत्थर से कुचल दे, वो पिघल ही जाता है।


विश्वनाथ जी ने कांपते हाथों से समीर के सिर पर हाथ रखा।


"उठो समीर," उनकी आवाज़ भर्राई हुई थी।


समीर उठा और उसने पिता को इतनी जोर से गले लगाया कि जैसे छोड़ेगा तो वो गायब हो जाएंगे। "घर चलिए पापा। प्लीज। मैं बॉस को, दुनिया को, सबको बताऊंगा कि आप मेरे पिता हैं। आप ही मेरी पहचान हैं। आपके बिना मैं कुछ नहीं हूँ।"


विश्वनाथ जी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने समीर की पीठ थपथपाई। उस एक स्पर्श ने, उस खामोशी को तोड़ दिया जो सालों से उनके बीच जमी हुई थी।


घर लौटते वक़्त गाड़ी में खामोशी थी, लेकिन यह खामोशी चुभने वाली नहीं थी। यह सुकून की खामोशी थी। समीर ने अपना एक हाथ ड्राइविंग व्हील पर रखा था और दूसरे हाथ से पिता का हाथ कसकर पकड़ा हुआ था, जैसे बचपन में विश्वनाथ जी उसका हाथ पकड़ते थे।


उस रात, घर पहुँचकर समीर ने सबसे पहले वो नाम प्लेट उखाड़ कर फेंकी जिस पर सिर्फ़ "समीर एंड नताशा" लिखा था। अगले दिन नई नेम प्लेट लगी— **"विश्वनाथ विला"**।


उस शाम जब समीर ऑफिस से आया, तो वह सीधा बालकनी में गया।

"पापा, चाय?"

विश्वनाथ जी मुस्कुराए। "हाँ बेटा, अदरक वाली।"


वो ज़ख्म अभी भरा नहीं था, क्योंकि शब्दों के घाव भरने में वक़्त लगता है। लेकिन अब उस पर मरहम लग चुका था। समीर समझ गया था कि दुनिया की सारी शोहरत एक तरफ, और घर के उस कोने में बैठे पिता की मुस्कान एक तरफ। क्योंकि जब माँ-बाप मुंह फेर लेते हैं, तो ईश्वर भी दुआएं कुबूल करना बंद कर देता है।


---


**कहानी का सार:**

हम अक्सर अपनी प्रोफेशनल लाइफ और सोशल स्टेटस की दौड़ में उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जिन्होंने हमें चलना सिखाया। हमें लगता है कि उन्हें हमारी ज़रूरत है, जबकि सच यह है कि हमें, हमारे वजूद को, उनकी ज़रूरत होती है। माँ-बाप का दिल कांच जैसा होता है, उसेड़ने के लिए पत्थर मारने की ज़रूरत नहीं होती, बस आपकी बेरुखी ही काफी है।


**सवाल:**

क्या आप भी अपने माता-पिता के साथ पर्याप्त समय बिताते हैं? या आप भी उसी "कल" का इंतज़ार कर रहे हैं जो शायद कभी नहीं आएगा? अपने दिल पर हाथ रखकर सोचियेगा ज़रूर।


**अगर इस कहानी ने आपकी आँखों को नम किया है और दिल को छुआ है, तो इसे लाइक करें और अपने दोस्तों के साथ शेयर ज़रूर करें। शायद आपकी एक शेयर किसी सोए हुए बेटे या बेटी को जगा दे। अगर आप इस पेज पर पहली बार आए हैं, तो ऐसी ही दिल को छू लेने वाली कहानियों के लिए पेज को फ़ॉलो करना न भूलें। धन्यवाद!**


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ