"भाई को लगा कि तलाकशुदा बहन घर पर 'बोझ' है और उसे बेघर करने की साजिशें रची जाने लगीं। लेकिन जब माँ ने घर की 'वसीयत' और 'कानून' का सच सबके सामने रखा, तो बेटे और बहू के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। पढ़िए एक माँ के उस फैसले की कहानी जिसने रिश्तों की परिभाषा बदल दी..."
तूं कोई बोझ नहीं है बेटा काव्या, इस घर पर तेरा भी उतना ही अधिकार है जितना बाकी सब का। और हां, यदि किसी को काव्या के यहां रहने से दिक्कत है, तो ये उसकी समस्या है काव्या की नहीं। याद रखो, इसके पिता की सम्पत्ति पर बेटी का भी आधा अधिकार है। और ये मेरा आखिरी फैसला है कि काव्या अब इसी घर में रहेगी, अपने घर में रहेगी।"
रात के खाने की मेज पर सन्नाटा पसरा हुआ था। सिर्फ चम्मच और प्लेट के टकराने की आवाजें आ रही थीं, लेकिन यह सन्नाटा सुकून का नहीं, बल्कि आने वाले तूफान का संकेत था। सुमित्रा देवी अपनी कुर्सी पर बैठीं चुपचाप खाना खा रही थीं, लेकिन उनकी पैनी नज़रें सब कुछ भांप रही थीं। उनके सामने उनका बेटा, प्रशांत, और बहू, राधिका, इशारों-इशारों में कुछ बातें कर रहे थे। मेज के एक कोने पर, सिमटी-सिकुड़ी सी बैठी थी—काव्या।
काव्या, सुमित्रा देवी की बेटी। छह महीने पहले, वह अपने पति के घर से वापस आई थी। उसका विवाह एक बहुत बड़े घर में हुआ था, लेकिन वहां दहेज और मानसिक प्रताड़ना ने उसे तोड़ दिया था। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो उसने वह नर्क छोड़ने का फैसला किया और अपने मायके लौट आई।
राधिका ने जानबूझकर पानी का जग मेज पर जोर से रखा। "प्रशांत, आज फिर बिजली का बिल पांच हजार आया है। समझ नहीं आता, घर में इतने लोग बढ़ गए हैं, तो खर्चा तो बढ़ेगा ही। अब तो राशन भी पंद्रह दिन में खत्म हो जाता है।"
काव्या का हाथ खाने के निवाले पर ही रुक गया। उसने धीरे से अपनी प्लेट आगे खिसका दी और उठने लगी।
"अरे, क्या हुआ दीदी? खाना तो पूरा खा लीजिये," राधिका ने मीठी छुरी चलाते हुए कहा। "वैसे, मैंने सुना है आजकल रेंट पर फ्लैट्स काफी सस्ते मिल रहे हैं शहर के दूसरे कोने में। अगर कोई इंडिपेंडेंटली रहना चाहे, तो अच्छा ऑप्शन है।"
काव्या की आँखों में आंसू आ गए। वह बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गई। सुमित्रा देवी ने खाना छोड़ दिया और हाथ धोकर उठ गईं। प्रशांत और राधिका एक-दूसरे को देख मुस्कुरा दिए। उनका प्लान काम कर रहा था। उन्हें लगता था कि काव्या अब शर्मिंदा होकर खुद ही घर छोड़ देगी।
अगली सुबह रविवार था। प्रशांत ने चाय पीते हुए सुमित्रा देवी से बात छेड़ी।
"माँ, मुझे आपसे कुछ ज़रूरी बात करनी है," प्रशांत ने भूमिका बांधी।
"बोल," सुमित्रा देवी ने अखबार से नज़रें हटाए बिना कहा।
"माँ, काव्या को यहाँ आए छह महीने हो गए हैं। आस-पड़ोस में लोग बातें बनाने लगे हैं। कब तक वह हमारे साथ रहेगी? उसका पति तो उसे वापस लेने से रहा। अब उसकी ज़िंदगी का क्या प्लान है?"
"तो तुझे क्या लगता है, क्या प्लान होना चाहिए?" सुमित्रा देवी ने शांत स्वर में पूछा।
राधिका तुरंत बीच में कूद पड़ी, "मम्मी जी, हमारा मतलब है कि प्रशांत की कमाई सीमित है। हमारे बच्चों का भविष्य भी है। ननद जी पढ़ी-लिखी हैं, अगर वो अलग रहकर नौकरी करें तो उनके लिए भी अच्छा होगा और हमारी 'प्राइवेसी' भी बनी रहेगी। हम कब तक उनका बोझ उठाएंगे?"
"बोझ?" सुमित्रा देवी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा। "तुम्हें काव्या बोझ लगती है?"
"माँ, प्रैक्टिकल बनिए," प्रशांत ने झुंझलाते हुए कहा। "समाज का नियम है कि शादी के बाद लड़कियाँ पराई हो जाती हैं। वो मेहमान बनकर आएं तो ठीक, पर ऐसे परमानेंट रहना... यह मेरे और राधिका के रिश्ते पर असर डाल रहा है। घर छोटा पड़ने लगा है।"
सुमित्रा देवी कुछ बोलने ही वाली थीं कि अंदर से काव्या अपना सूटकेस लेकर बाहर आ गई। उसकी आँखें सूजी हुई थीं।
"भैया, भाभी... आप लोगों को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। मैंने अपनी सहेली से बात कर ली है। मैं आज ही पीजी में शिफ्ट हो रही हूँ। माँ, मुझे माफ़ करना, मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण इस घर में झगड़े हों।"
काव्या ने सुमित्रा देवी के पैर छुए और दरवाजे की तरफ बढ़ी। प्रशांत के चेहरे पर राहत की सांस थी।
"रुक जा काव्या!" सुमित्रा देवी की आवाज़ हॉल में गूंजी। इतनी सख्त और बुलंद कि प्रशांत भी सहम गया।
सुमित्रा देवी उठीं और काव्या के हाथ से सूटकेस छीनकर सोफे पर फेंक दिया। फिर वो पलटीं और प्रशांत और राधिका के सामने आकर खड़ी हो गईं।
"बैठ जाओ तुम दोनों," सुमित्रा देवी ने आदेश दिया।
"माँ, अब क्या ड्रामा है? वो खुद जाना चाहती है," राधिका ने कहा।
"मैंने कहा बैठ जाओ!" सुमित्रा देवी की आवाज़ में वो कड़कपन था जो उन्होंने सालों तक एक स्कूल प्रिंसिपल रहते हुए बनाए रखा था।
सुमित्रा देवी अपनी अलमारी से एक फाइल लेकर आईं और उसे मेज पर पटक दिया।
"प्रशांत, तुझे लगता है कि यह घर तेरा है?" सुमित्रा देवी ने पूछा।
"बिल्कुल माँ। पापा के जाने के बाद तो कानूनन वारिस मैं ही हूँ," प्रशांत ने हक से कहा। "बेटा हूँ मैं इस घर का।"
सुमित्रा देवी ने एक कड़वी मुस्कान के साथ फाइल खोली।
"तुम्हारे पापा बहुत समझदार इंसान थे प्रशांत। उन्हें पता था कि एक दिन ऐसा आ सकता है। यह वसीयत है, जो उन्होंने मरने से एक महीना पहले लिखी थी। और यह घर के कागज़ हैं।"
राधिका की नज़रें फाइल पर गड़ गईं।
"इस वसीयत के मुताबिक," सुमित्रा देवी ने पढ़ना शुरू किया, "स्वर्गीय श्री रामनाथ जी ने अपनी सारी चल और अचल संपत्ति—यानी यह घर, गांव की ज़मीन और बैंक बैलेंस—मेरी यानी अपनी पत्नी सुमित्रा के नाम किया है। और मेरे बाद..."
सुमित्रा देवी रुकीं और प्रशांत की आँखों में देखा। "...मेरे बाद यह संपत्ति मेरे दोनों बच्चों, प्रशांत और काव्या, में बराबर बंटेगी।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। राधिका का मुंह खुला का खुला रह गया।
"बराबर?" प्रशांत चिल्लाया। "माँ, यह कैसे हो सकता है? काव्या की शादी में हमने 20 लाख खर्च किए थे। वो उसका हिस्सा था। अब इस घर में उसका क्या काम?"
"वो शादी का खर्च था, उसकी खुशी के लिए किया गया दान था, संपत्ति का बंटवारा नहीं," सुमित्रा देवी ने डपटकर कहा। "और सुन प्रशांत, तू 'खर्चे' की बात करता है? चल आज हिसाब कर ही लेते हैं।"
सुमित्रा देवी ने डायरी का एक पन्ना पलटा।
"काव्या की शादी से पहले, जब तुम्हारे पापा को हार्ट अटैक आया था और बायपास सर्जरी हुई थी, उसमें 5 लाख रुपये लगे थे। तब तू अपनी एमबीए की पढ़ाई कर रहा था और एक पैसा नहीं कमाता था। वो 5 लाख रुपये काव्या ने अपनी नौकरी की सेविंग्स और अपना पीएफ तुड़वाकर दिए थे। याद है तुझे?"
प्रशांत की नज़रें झुक गईं।
"और सुन," सुमित्रा देवी ने राधिका की तरफ देखा। "जब तुम इस घर में नई-नई आई थीं राधिका, और तुम्हें अपनी बुटीक खोलनी थी, तो प्रशांत के पास पैसे नहीं थे। काव्या ने अपनी शादी में मिले सोने के कंगन बेचकर तुम्हें 2 लाख रुपये दिए थे। क्या वो 'बोझ' था?"
राधिका पसीने-पसीने हो गई।
"तुम दोनों की याददाश्त कमज़ोर हो सकती है, पर मेरी नहीं," सुमित्रा देवी का स्वर अब और भी गंभीर हो गया। "तुम लोगों को लगता है कि काव्या यहाँ मुफ्त की रोटियां तोड़ रही है? पिछले छह महीने से घर का राशन, बिजली का बिल और मेरी दवाइयों का आधा खर्च काव्या अपनी फ्रीलांसिंग की कमाई से चुपचाप मेरे अकाउंट में डाल रही है। उसने मुझे कसम दी थी कि मैं तुम्हें न बताऊं ताकि तुम्हें शर्मिंदगी न हो। और तुम... तुम उसे 'बोझ' कह रहे हो?"
काव्या रो रही थी। "माँ, रहने दो..."
"नहीं काव्या, आज नहीं," सुमित्रा देवी ने उसे चुप कराया। फिर उन्होंने प्रशांत के पास जाकर उसका कॉलर ठीक किया, जैसे बचपन में स्कूल भेजते वक्त करती थीं, लेकिन आज उस स्पर्श में प्यार नहीं, चेतावनी थी।
"बेटा प्रशांत, और बहू राधिका... अच्छे से सुन लो। तूं कोई बोझ नहीं है बेटा काव्या, इस घर पर तेरा भी उतना ही अधिकार है जितना बाकी सब का। और हां, यदि किसी को काव्या के यहां रहने से दिक्कत है, तो ये उसकी समस्या है काव्या की नहीं। याद रखो, इसके पिता की सम्पत्ति पर बेटी का भी आधा अधिकार है। और ये मेरा आखिरी फैसला है कि काव्या अब इसी घर में रहेगी, अपने घर में रहेगी।"
सुमित्रा देवी ने एक पल रुका और फिर वो ब्रह्मास्त्र चलाया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।
"और अगर तुम दोनों को लगता है कि 'प्राइवेसी' की कमी है या घर छोटा है, तो मैंने वकीलों से बात कर ली है। हम इस घर का बंटवारा अभी कर सकते हैं। घर बिकेगा, आधा पैसा काव्या का, आधा मेरा। तुम अपना हिस्सा लेकर जहाँ चाहे महल बना लो। मुझे और काव्या को एक छोटा फ्लैट काफी होगा।"
यह सुनते ही प्रशांत और राधिका के होश उड़ गए। यह घर शहर के पॉश इलाके में था, जिसकी कीमत करोड़ों में थी। अगर यह हाथ से गया, तो वे किराए के मकान में आ जाएंगे। उनकी सारी अकड़ एक पल में हवा हो गई।
प्रशांत तुरंत काव्या के पास गया और उसका हाथ पकड़ लिया। "न... नहीं माँ। बंटवारे की क्या ज़रूरत है? काव्या मेरी बहन है। वो कहीं नहीं जाएगी। मुझसे गलती हो गई। मैं... मैं बस थोड़ा तनाव में था।"
राधिका भी रंग बदलते हुए बोली, "हाँ मम्मी जी, आप तो नाराज़ हो गईं। काव्या दीदी तो घर की रौनक हैं। वो क्यों जाएंगी? हम सब मिलजुल कर रहेंगे।"
सुमित्रा देवी जानती थीं कि यह बदलाव प्रेम का नहीं, बल्कि 'डर' और 'लालच' का है। लेकिन उन्हें यह भी पता था कि कभी-कभी अपनों को लाइन पर लाने के लिए कानून का डंडा दिखाना ज़रूरी होता है।
उन्होंने काव्या को गले लगाया। "देख लिया बेटा? जब तक तू अपनी नज़रों में कमज़ोर रहेगी, दुनिया तुझे दबाएगी। जिस दिन तुझे अपने 'अधिकार' और अपनी 'कीमत' पता चल जाएगी, उस दिन कोई तुझे घर से निकालने की जुर्रत नहीं करेगा। यह घर तेरा है, किसी की खैरात नहीं।"
काव्या ने उस दिन अपने आँसू पोंछे। उसे समझ आ गया कि माँ ने उसे सिर्फ घर में पनाह नहीं दी, बल्कि उसका खोया हुआ आत्मसम्मान लौटाया है। उसने अपना सूटकेस उठाया और वापस अपने कमरे में ले गई—इस बार मेहमान बनकर नहीं, बल्कि इस घर की मालकिन बनकर।
उस रात के बाद घर का माहौल बदल गया। राधिका और प्रशांत की आवाज़ें नीची हो गईं। काव्या ने अपनी नौकरी फिर से शुरू की और शान से रहने लगी। सुमित्रा देवी ने साबित कर दिया कि एक माँ अगर 'ममता' की मूरत है, तो ज़रूरत पड़ने पर 'न्याय' की देवी भी बन सकती है।
कहानी का सार:
हमारे समाज में अक्सर लड़कियों को सिखाया जाता है कि शादी के बाद पिता का घर उनका नहीं रहता। लेकिन कानून और मानवता, दोनों यही कहते हैं कि बेटी चाहे कुंवारी हो, शादीशुदा हो या तलाकशुदा—पिता के घर पर उसका अधिकार बेटे के बराबर ही होता है। मुसीबत के समय अगर भाई साथ न दे, तो लड़कियों को खुद अपने हकों के लिए खड़ा होना चाहिए। और माताओं को भी सुमित्रा देवी की तरह निष्पक्ष होकर अपनी बेटी की ढाल बनना चाहिए।
सवाल आपके लिए:
क्या आपको लगता है कि समाज की सोच अब बदल रही है? क्या आज भी बेटियों को अपने ही घर में रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है? अगर आप सुमित्रा देवी की जगह होते, तो क्या करते? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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