**"पिता की खामोशी में समंदर सा शोर होता है, बस सुनने वाला बेटा चाहिए। एक लफ़्ज़ जो उन्हें राजा बना सकता है और एक लफ़्ज़ जो उन्हें फकीर कर देता है—फैसला औलाद की जुबान पर होता है।"**
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शहर के पुराने बाजार के बीचोबीच, 'त्रिवेदी टेक्सटाइल्स' की दुकान पिछले पचास सालों से शान से खड़ी थी। दुकान की गद्दी पर बैठे 68 वर्षीय दीनदयाल त्रिवेदी जी सिर्फ कपड़ा नहीं बेचते थे, वे रिश्ते कमाते थे। उनकी सफेद धोती और माथे पर लगा चंदन का टीका उनकी पहचान था। वे अक्सर कहते थे, "व्यापार मुनाफे से नहीं, भरोसे से चलता है।"
लेकिन वक्त बदल रहा था। दीनदयाल जी का इकलौता बेटा, समीर, एमबीए करके शहर लौटा था। समीर की आँखों में बड़े सपने थे। उसे लगता था कि पिताजी का व्यापार करने का तरीका 'पुराना' और 'पिछड़ा' है। वह दुकान को एक आधुनिक शोरूम में बदलना चाहता था, जहाँ शीशे के दरवाजे हों, एसी की हवा हो और सेल्समैन टाई लगाकर खड़े हों।
एक रात खाने की मेज पर सन्नाटा पसरा हुआ था। समीर ने पानी का गिलास रखते हुए बात शुरू की।
"पापा, मैंने आज मेहता बिल्डर्स से बात की है। वो हमारी दुकान की जगह पर कॉम्प्लेक्स बनाना चाहते हैं। हमें ग्राउंड फ्लोर पर डबल जगह मिलेगी और ऊपर से दो करोड़ रुपये कैश। यह डील हमें छोड़नी नहीं चाहिए।"
दीनदयाल जी ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए धीरे से कहा, "बेटा समीर, यह दुकान नहीं, तुम्हारे दादाजी की निशानी है। यहाँ हमारे पुराने ग्राहक आते हैं, जो मोल-भाव नहीं करते, बस 'त्रिवेदी जी' के नाम पर कपड़ा ले जाते हैं। शोरूम बनने के बाद वो गरीब और मध्यम वर्गीय ग्राहक कहाँ जाएंगे जिनसे हमारा घर चला है?"
समीर का चेहरा लाल हो गया। उसने झल्लाहट में कहा, "यही तो दिक्कत है आपकी। आप इमोशन में जीते हैं, और दुनिया प्रैक्टिकल हो गई है। वो फटे-पुराने नोटों वाले ग्राहकों से हम कभी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। हमें ब्रांड बनना है, पापा! ब्रांड!"
दीनदयाल जी ने समझाने की कोशिश की, "बेटा, ब्रांड नाम से नहीं, काम से बनता है। मुझे इस बाजार की नब्ज पता है। यहाँ शोरूम नहीं, संबंध चलते हैं।"
तभी समीर ने वह बात कह दी, जिसने उस रात दीनदयाल जी के अस्तित्व को हिलाकर रख दिया। उसने मेज पर हाथ पटकते हुए ऊंची आवाज में कहा—
**"पापा, प्लीज! आप अब बस घर पर आराम कीजिये। आपको मार्किट के नए ट्रेंड्स और बिजनेस की स्ट्रैटेजी का कुछ नहीं पता। (Papa, you don't know anything regarding modern trends.) आपका जमाना गया। मुझे अपने हिसाब से फैसले लेने दीजिये।"**
दीनदयाल जी का हाथ हवा में ही रुक गया। वह रोटी का निवाला, जो मुंह तक जा रहा था, वापस थाली में गिर गया। कमरे में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो किसी तूफ़ान से ज्यादा भयानक था। समीर की माँ, सुमित्रा जी, सहम गईं।
दीनदयाल जी ने समीर की आँखों में देखा। उन आँखों में आज बेटे का प्यार नहीं, एक युवा व्यापारी का अहंकार था। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस चुपचाप उठे, बेसिन में हाथ धोए और बिना कुछ खाए अपने कमरे में चले गए।
उस एक वाक्य—*"पापा, आपको कुछ नहीं पता"*—ने दीनदयाल जी को एक ही पल में दस साल बूढ़ा कर दिया था। उनकी चाल धीमी हो गई, कंधे झुक गए। जो पिता सुबह पूरे जोश के साथ दुकान जाता था, अगले दिन वह अपने बिस्तर से नहीं उठा। उन्होंने बस इतना कहा, "सुमित्रा, मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही। चाबियां समीर को दे दो। उसे सब पता है, वो संभाल लेगा।"
समीर खुश था। उसे लगा पापा मान गए। उसने दुकान का नक्शा बदल दिया। पुराने मुनीम जी को हटाकर नए लड़के रख लिए। शीशे के दरवाजे लग गए। 'त्रिवेदी टेक्सटाइल्स' अब 'टी-स्क्वायर फैशन हब' बन गया था।
शुरुआत में भीड़ आई, लेकिन वो बस देखने वाले थे। पुराने ग्राहक, जो दीनदयाल जी के साथ बैठकर चाय पीते थे और सुख-दुख साझा करते थे, उन्होंने आना बंद कर दिया। नए सेल्समैन को ग्राहकों से बात करने की तमीज नहीं थी। वे मोल-भाव करने वालों को हिकारत से देखते।
छह महीने बीत गए। मुनाफा तो दूर, दुकान का खर्चा निकालना मुश्किल हो गया। समीर परेशान रहने लगा। जिस "मॉडर्न स्ट्रैटेजी" पर उसे घमंड था, वह मुंह के बल गिर रही थी। बाजार में खबर फैल गई कि त्रिवेदी जी के बेटे ने दुकान का सत्यानाश कर दिया है।
इसी बीच, दिवाली का सीजन आया। यह वही समय था जब दीनदयाल जी की दुकान पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी। लेकिन इस बार, 'टी-स्क्वायर' खाली पड़ा था। समीर काउंटर पर सिर पकड़े बैठा था। तभी एक पुराना ग्राहक, रामशरण काका, दुकान के बाहर से गुजरे। समीर ने उन्हें आवाज दी।
"काका, अंदर आइये न! नये कपड़े आए हैं।"
रामशरण काका रुके, उन्होंने शीशे के शोरूम को देखा और फिर समीर को। उन्होंने कड़वी सच्चाई बोली, "बेटा, हम यहाँ कपड़ा खरीदने नहीं, दीनदयाल बाबू के भरोसे पर आते थे। वो हमें कपड़ा नहीं, सम्मान देते थे। यह कांच के दरवाजे हमें डराते हैं, और तुम्हारी यह चमक-दमक हमारे जैसे साधारण लोगों के लिए नहीं है। तुम्हारे पिता को 'सब पता' था, बस तुम्हें ही यह 'पता' नहीं चला।"
समीर सन्न रह गया। उसे अपने कहे वो शब्द याद आए—*"पापा, आपको कुछ नहीं पता।"*
उसे महसूस हुआ कि उसने ईंट-पत्थर का शोरूम तो बना लिया, लेकिन उस 'नींव' को ही तोड़ दिया जिस पर यह इमारत टिकी थी। वह अनुभव, वह व्यवहार, वह अपनापन—यही तो असली बिजनेस था।
उस शाम समीर घर लौटा। घर में वही सन्नाटा था जो छह महीने पहले उस रात छाया था। दीनदयाल जी बालकनी में बैठे थे, आँखों में एक सूनापन लिए। वे अब बहुत कम बोलते थे, जैसे उन्हें लगता हो कि उनकी बात का कोई मोल नहीं है।
समीर धीरे से उनके पास गया और उनके पैरों के पास जमीन पर बैठ गया। दीनदयाल जी ने चौंककर नीचे देखा।
"क्या हुआ बेटा? दुकान कैसी चल रही है?" उन्होंने औपचारिक सा सवाल पूछा, जिसमें अब कोई उत्सुकता नहीं थी।
समीर ने अपना सिर पिता की गोद में रख दिया। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे और वह धोती गीली होने लगी। समीर का अहंकार आंसुओं में बह रहा था।
"पापा, दुकान खाली पड़ी है। और दुकान ही नहीं, मैं भी खाली हो गया हूँ," समीर सुबक रहा था। "मैंने शीशे लगवा दिए, एसी लगवा दिया, लेकिन वो 'बरकत' चली गई जो आपके गल्ले पर बैठने से आती थी। मुझे माफ कर दीजिये पापा। मुझे कुछ नहीं पता। मैं बस किताबों का रट्टा मार के आया था, असली पढ़ाई तो आपके पास थी।"
दीनदयाल जी का हाथ कांपते हुए समीर के सिर पर गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी पीठ सहलाई।
समीर ने सिर उठाया, उसकी आँखें लाल थीं। उसने अपनी जेब से दुकान की चाबियां निकालीं और दीनदयाल जी की हथेली पर रख दीं।
"पापा, कल से दुकान आप संभालेंगे। वो पुराने मुनीम काका को मैंने बुला लिया है। वो शीशे के दरवाजे हट रहे हैं। नाम फिर से 'त्रिवेदी टेक्सटाइल्स' होगा।"
दीनदयाल जी ने पूछा, "लेकिन बेटा, तुम्हारा मॉडर्न बिजनेस? तुम्हारा वो दो करोड़ का सपना?"
समीर ने उनके हाथ को अपने गाल से लगाया और वह जादुई वाक्य कहा—
**"पापा, अब से सब वैसा होगा, 'जैसे आपकी मर्जी' (As you wish)। आप ही मालिक हैं, मैं तो बस आपका मुनीम बनकर सीखना चाहता हूँ।"**
जैसे ही दीनदयाल जी ने यह सुना, एक चमत्कार हुआ। उनकी झुकी हुई कमर सीधी हो गई। आँखों में छाई धुंध छंट गई और चेहरे पर वही पुराना तेज लौट आया। जो इंसान पिछले छह महीने से बीमार था, अचानक उसमें दस हाथियों का बल आ गया।
उन्होंने मुस्कुराते हुए चाबियां अपनी जेब में डालीं और कड़क आवाज में बोले, "सुमित्रा! मेरा कुर्ता निकालो और सुबह जल्दी चाय बनाना। कल दुकान जल्दी खोलनी है, दिवाली का सीजन है, ऐसे हाथ पर हाथ रखकर बैठने से धंधा नहीं होगा।"
समीर देखता रह गया। उसका पिता, जो कल तक एक बूढ़ा और लाचार व्यक्ति लग रहा था, एक ही पल में फिर से घर का 'सुपरहीरो' बन गया था। सिर्फ तीन शब्दों ने—"जैसे आपकी मर्जी"—उन्हें पुनर्जीवित कर दिया था।
अगले दिन जब दीनदयाल जी गल्ले पर बैठे, तो बाजार ने देखा कि शेर वापस आ गया है। दुकान फिर से ग्राहकों से भर गई। समीर अब काउंटर के पीछे खड़ा होकर देख रहा था कि पिता जी कैसे हर ग्राहक के नाम, उसके गांव और उसके घर के हाल-चाल पूछकर व्यापार कर रहे थे।
समीर को समझ आ गया था कि डिग्रियां तो कागज के टुकड़े हैं, असली तजुर्बा तो पिता की उन झुर्रियों में लिखा होता है जिन्हें हम अक्सर 'पुराना जमाना' कहकर नजरअंदाज कर देते हैं।
उस रात घर में फिर से हंसी गूंजी। दीनदयाल जी ने समीर से कहा, "बेटा, बदलाव जरूरी है, लेकिन जड़ों को काटकर पेड़ कभी हरा नहीं रहता।"
समीर मुस्कुराया, "जी पापा, जैसे आपकी मर्जी।"
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**सच ही कहा है, बुजुर्ग घर की छत होते हैं। हम अक्सर आधुनिकता की धूप में उस छत को हटा देते हैं, लेकिन जब बारिश और तूफान आते हैं, तब हमें उसी साये की याद आती है। अपने माता-पिता के अनुभव को कभी कम मत आंकिए, क्योंकि उन्होंने वो दुनिया देखी है जो आपने अभी गूगल पर सर्च भी नहीं की है।**
**क्या आप भी मानते हैं कि पिता का अनुभव किसी भी एमबीए डिग्री से बड़ा होता है? क्या समीर ने सही समय पर अपनी गलती सुधार ली? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें।**
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