पाषाण हृदय

 जब नफरत की दीवारें इतनी ऊँची हो जाएं कि आने वाली नई जान की आहट भी बोझ लगने लगे, तब क्या एक मां की कोख घर की खुशियाँ वापस ला पाएगी या यह किसी बड़े तूफान का संकेत है?

हवेली की ऊंची छतों और नक्काशीदार खंभों के बीच पसरा सन्नाटा आज किसी गहरी साजिश जैसा लग रहा था। देवकी जी डाइनिंग टेबल पर बैठी चांदी की थाली में भोजन कर रही थीं, लेकिन उनकी नजरें बार-बार सीढ़ियों की तरफ जा रही थीं। तभी ऊपर के कमरे का दरवाजा खुला और काव्या धीरे-धीरे कदम बढ़ाती हुई बाहर निकली। काव्या ने अपने उभरे हुए पेट को एक हाथ से सहारा दे रखा था। उसके चेहरे पर मातृत्व की वह चमक गायब थी जिसे लोग 'प्रेगनेंसी ग्लो' कहते हैं, बल्कि वहां तो केवल पीलापन और गहरी उदासी की लकीरें थीं।

काव्या के पेट के उभार पर नजर पड़ते ही भोजन कर रही देवकी जी का मन क्रोध और घृणा से भर उठा। उन्होंने जोर से अपना चम्मच थाली पर पटका, जिसकी गूँज पूरे हॉल में फैल गई। काव्या सहम कर वहीं रुक गई। देवकी जी ने तीखी नजरों से पास खड़े अपने बेटे, आकाश को देखा और कड़कती आवाज में पूछा, "बेटा तू तो बहू से नफरत करता था न, फिर ये प्रेग्नेंट कैसे हो गई? तू तो कहता था कि इस लड़की से तेरा कोई रिश्ता नहीं है, फिर यह सब क्या नाटक है?"

आकाश, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहा था, उसकी उंगलियां कांप गईं। उसने नजरें ऊपर नहीं उठाईं। घर का यह कड़वा सच था कि आकाश और काव्या की शादी एक व्यापारिक समझौते की तरह हुई थी। आकाश किसी और से प्यार करता था और उसने पहले दिन से ही काव्या को यह बता दिया था कि वह उसे कभी पत्नी का दर्जा नहीं दे पाएगा। पिछले दो सालों से वे एक ही कमरे में दो अजनबियों की तरह रह रहे थे। देवकी जी भी काव्या को उसके साधारण परिवार की वजह से पसंद नहीं करती थीं।

आकाश ने धीमी आवाज में कहा, "माँ, यह सच है कि हमारे बीच कुछ नहीं था, लेकिन..."

"लेकिन क्या?" देवकी जी चिल्लाईं। "यह बच्चा किसका है? क्या तूने इसे स्वीकार कर लिया है? कल तक तो तू इसे तलाक देने की बात कर रहा था।"

काव्या की आँखों से आंसू बहने लगे। वह बिना कुछ बोले धीरे-धीरे चलकर डाइनिंग टेबल के कोने पर बैठ गई। उसने अपने लिए सूखी रोटी उठाई, लेकिन गले से नीचे निवाला उतारना मुश्किल था। उसे याद आया वह दिन जब डॉक्टर ने यह खबर दी थी। आकाश और उसके बीच वह एक रात महज एक गलती थी, एक कमजोरी का पल, जिसे दोनों ही भूल जाना चाहते थे। लेकिन नियति ने अपना खेल खेल दिया था।

महीने बीतते गए। घर में उत्सव की जगह मातम सा माहौल रहता। देवकी जी अक्सर ताना मारतीं, "पता नहीं यह कुलदीपक होगा या कुलकलंक।" काव्या सब सहती रही। वह अपनी कोख में पल रहे बच्चे से बातें करती, "नन्हे मुन्ने, तू इस नफरत भरी दुनिया में मत आना, यहाँ कोई तेरा इंतजार नहीं कर रहा।"

एक रात, काव्या की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। उसे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा कि स्थिति बहुत गंभीर है, या तो माँ बचेगी या बच्चा। आकाश अस्पताल के कॉरिडोर में बदहवास घूम रहा था। देवकी जी वहाँ भी अपनी कठोरता नहीं छोड़ पा रही थीं, "आकाश, देख लेना, अगर वारिस नहीं बचा तो इस लड़की का इस घर में कोई काम नहीं है।"

तभी ऑपरेशन थिएटर से बच्चे के रोने की आवाज आई। नर्स बाहर आई और उसने एक छोटी सी बच्ची आकाश के हाथों में थमा दी। नर्स ने दुखी मन से कहा, "बच्ची तो ठीक है, लेकिन माँ की हालत बहुत नाजुक है। उन्होंने बहुत संघर्ष किया है।"

उस नन्ही सी जान को अपनी गोद में लेते ही आकाश के अंदर का पत्थर पिघल गया। उसने देखा कि वह बच्ची बिल्कुल काव्या जैसी दिखती थी—वही मासूमियत और वही खामोशी। पहली बार उसे अपनी नफरत पर शर्मिंदगी महसूस हुई। वह दौड़कर काव्या के पास गया, जो होश खो रही थी। उसने उसका हाथ थामा और कहा, "काव्या, मुझे माफ कर दो। मैं हार गया, हमारी बेटी जीत गई। प्लीज वापस आ जाओ।"

काव्या ने धुंधली आँखों से अपनी बेटी को देखा और उसके होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आई। उसने धीरे से आकाश का हाथ दबाया। यह नफरत की हार और ममता की जीत थी। देवकी जी, जो बाहर खड़ी थीं, अपनी पोती की छोटी उंगलियों को छूते ही फफक कर रो पड़ीं। उन्हें अहसास हुआ कि कोख का सच नफरत से कहीं ज्यादा बड़ा और पवित्र होता है।

आज उस हवेली में सन्नाटा नहीं है। अब वहां एक बच्ची की किलकारियां गूँजती हैं। काव्या अब उस घर की 'बेसहारा बहू' नहीं, बल्कि उस घर की धड़कन है। रिश्तों की जो गांठ नफरत ने बांधी थी, उसे एक छोटी सी जान ने प्रेम से खोल दिया था।


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