नीलिमा जी के चेहरे पर आज बरसों बाद मुस्कान लौट आई थी। उन्हें लग रहा था जैसे उनकी सूनी ज़िंदगी में फिर से रौनक आने वाली है। छोटे बेटे आशीष की शादी उन्होंने बहुत प्यार और मन से की थी। बहू सीमा को देखकर ही उनके दिल को तसल्ली मिली थी — सीधी-सादी, सुशिक्षित और विनम्र लड़की। जैसे-जैसे बारात नजदीक पहुंची, उनके दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं।
ढोल-नगाड़ों की आवाज़ जब कानों में पड़ी तो नीलिमा जी का चेहरा खिल उठा। वह जल्दी से आरती का थाल लेकर दरवाजे पर पहुंचीं। बेटा और बहू जैसे ही दहलीज़ पर पहुंचे, नीलिमा जी ने आरती उतारी, सीमा के माथे पर तिलक लगाया और मुस्कुराते हुए बोलीं —
“आओ बहू, अब इस घर में तुम्हारे कदम से खुशहाली लौटेगी।”
घर के अंदर रिश्तेदारों की भीड़, गीत-संगीत और हंसी-ठिठोली का माहौल था। पर इन सबके बीच नीलिमा जी का मन बस एक ही भावना में डूबा था — अब यह घर फिर से घर लगेगा।
शादी की थकान उतारने के बाद जब सब सो गए, नीलिमा जी आंगन में आईं। चांदनी में चमकता घर उन्हें जैसे मुस्कुराता हुआ लगा। उन्होंने आसमान की ओर देखा — “देखिए जी, आपकी पसंद की बहू आ गई है,” उन्होंने मन ही मन अपने स्वर्गीय पति से कहा।
अगले दिन सीमा ने सुबह-सुबह उठकर पूजा की, सबको नमस्ते किया और रसोई में जाकर हाथ बँटाने लगी। नीलिमा जी ने मन ही मन सोचा — आजकल की लड़कियों जैसी नहीं है यह, संस्कार वाली लगती है।
धीरे-धीरे घर में फिर वही पुराने दिनों की हलचल लौट आई। नीलिमा जी हर दिन सीमा के साथ बैठतीं, बातें करतीं, उसकी पसंद का खाना बनवातीं। कई साल बाद घर में पकवानों की खुशबू और हंसी की आवाज़ें गूंजने लगीं।
लेकिन समय की अपनी चाल होती है। कुछ ही हफ्तों में रिश्तों की परतें खुलने लगीं। आशीष का ऑफिस में काम बढ़ गया था, वह देर रात लौटता। सीमा को घर में अकेलापन सताने लगा। वह फोन पर अपनी सखी रीमा से घंटों बात करती। नीलिमा जी ने कई बार गौर किया, पर कुछ नहीं बोलीं।
एक दिन सीमा ने धीरे से कहा —
“मांजी, मैं सोच रही थी कि हम शहर में शिफ्ट हो जाएं। यहां तो काम की बहुत कमी है, आशीष को भी रोज़ आना-जाना पड़ता है।”
नीलिमा जी का दिल बैठ गया।
“बिटिया, ये घर तुम्हारे ससुर ने अपने हाथों से बनाया था। यही तो हमारी जड़ है।”
सीमा ने नम्रता से कहा, “मांजी, मैं समझती हूं, लेकिन अब ज़माना बदल गया है। वहां सुविधाएं हैं, और आशीष को भी प्रमोशन का मौका मिलेगा।”
आशीष ने भी धीरे से मां का हाथ पकड़कर कहा — “मां, बस कुछ साल के लिए ही सही, वहां से सब संभल जाएगा।”
नीलिमा जी कुछ बोल नहीं पाईं। अंदर से टूट-सी गईं। उन्हें लगा जैसे एक बार फिर कोई उन्हें अकेला छोड़कर जा रहा हो।
दो महीने बाद, आशीष और सीमा शहर चले गए। जाते समय सीमा ने उनके पैर छुए — “आप चिंता मत कीजिए मांजी, हर हफ्ते फोन करूंगी।”
पहले तो फोन आते रहे, वीडियो कॉल भी होती रही। नीलिमा जी मुस्कुरातीं, पर कॉल खत्म होने के बाद घर की दीवारें फिर सन्नाटे में डूब जातीं। धीरे-धीरे कॉल्स कम होने लगीं, त्योहारों पर ही बात होती।
उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, पर किसी को बताती नहीं थीं। गांव की औरतें कहतीं —
“नीलिमा दीदी, अब तो बहू आई थी, रौनक लौट आई होगी?”
वह बस हल्की मुस्कान दे देतीं — “हाँ बहन, बहू बहुत अच्छी है।”
छः महीने बाद, अचानक आशीष का फोन आया —
“मां, हम अगले महीने बच्चे की उम्मीद कर रहे हैं!”
नीलिमा जी की आंखों में चमक आ गई। “सच बेटा? अब तो मैं खुद आऊंगी बहू की सेवा करने!”
पर सीमा ने कहा —
“मांजी, डॉक्टर ने कहा है ज़्यादा लोगों की भीड़ न हो, आप बाद में आना।”
नीलिमा जी का चेहरा उतर गया। उन्होंने धीरे से कहा — “ठीक है बेटी, तुम अपना और बच्चे का ख्याल रखना।”
वक्त गुजरता गया। बच्चे के जन्म की खबर फोन पर ही मिली। तस्वीरें भेजी गईं, पर गोद में लेने की हसरत अधूरी रह गई। नीलिमा जी अब दिनभर बरामदे में बैठी रहतीं — वही जगह, जहाँ उस दिन उन्होंने बहू का स्वागत किया था।
एक शाम पड़ोस की बिटिया भागती हुई आई —
“नीलिमा दीदी, आपके बेटे का फोन आया था, आपने उठाया नहीं।”
नीलिमा जी ने थके स्वर में कहा — “अब आवाज़ भी ठीक से सुनाई नहीं देती बेटी।”
अगले दिन सुबह डाक से एक पार्सल आया। उसमें एक छोटा-सा स्वेटर था और एक चिट्ठी — “मांजी, यह मैंने अपने हाथों से आपके पोते के लिए बुना है। जब भी उसे देखूं, आपकी याद आती है। बस जल्द ही मिलेंगे।”
नीलिमा जी ने वह स्वेटर अपने सीने से लगा लिया। उनकी आंखों से आंसू बह निकले — खुशी के भी, और तन्हाई के भी।
कुछ महीनों बाद जब आशीष और सीमा गांव पहुंचे, तो घर की चौखट पर वही कुर्सी रखी थी, जिस पर नीलिमा जी बैठा करती थीं।
बरामदे में अगरबत्ती की हल्की खुशबू थी। दीवार पर उनकी तस्वीर मुस्कुरा रही थी —
मानो कह रही हो, “देखो, मेरी बहू ने मेरा घर फिर से घर बना दिया।”
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