सुबह के पाँच बजे होंगे। रसोई में बर्तनों की हल्की खनक के साथ ही गुनगुना रही थी आरती। दूध उबल रहा था और बगल के कमरे से पति की खाँसी की आवाज़ आ रही थी। तभी दरवाज़े पर बेल बजी — इस वक्त कौन आ गया? आरती ने कपड़े से हाथ पोंछे और दरवाज़ा खोला।
सामने डाकिया खड़ा था — “बहनजी, आपके नाम रजिस्ट्री आई है।”
आरती ने साइन किया और लिफाफा लिया। जैसे ही नाम देखा — “शशि।”
उसके हाथ काँप गए। बारह साल बाद शशि का कोई पत्र आया था।
चूल्हे पर रखी चाय उबलकर गिर गई, लेकिन आरती की नज़रें लिफाफे पर जमी रहीं। उसने धीरे से पत्र खोला —
“दीदी, माँ अब नहीं रहीं। कल रात उन्होंने दम तोड़ दिया। बार-बार आपका नाम ले रही थीं, कह रही थीं — ‘आरती को बता देना, मैंने उसे कभी माफ़ नहीं किया, लेकिन अब उसे दोष भी नहीं देती।’ दीदी, आप ज़रूर आइएगा, माँ का आखिरी दर्शन कर लीजिए।”
आरती के हाथ से पत्र गिर गया। वह वहीं ज़मीन पर बैठ गई, जैसे किसी ने उसके अंदर से सब कुछ खींच लिया हो। पति नरेश दौड़ते हुए आया, “क्या हुआ आरती?”
वो बस इतना कह पाई — “माँ चली गईं।”
नरेश ने समझाया, “चलो, जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं टिकट देखता हूँ।”
ट्रेन की खिड़की से बाहर देखती आरती का मन पुरानी यादों में चला गया। माँ, पिता और छोटी बहन शशि के साथ वो पुराना घर… वही आँगन, जहाँ कभी उसकी हँसी गूँजा करती थी।
आरती की शादी नरेश से अपने माँ-बाप की मर्जी के खिलाफ हुई थी। नरेश गरीब घर से था, और माँ ने साफ़ कह दिया था, “अगर उस लड़के से शादी की तो इस घर का दरवाज़ा तेरे लिए हमेशा बंद रहेगा।”
आरती ने कहा था, “माँ, वो अच्छा है, मेहनती है, मुझे खुश रखेगा।”
पर माँ के दिल में जात-पात और मान-अपमान का डर ज़्यादा गहरा था।
शादी के बाद आरती ने कई बार मायके का रास्ता देखा, लेकिन दरवाज़ा कभी नहीं खुला। शशि बीच-बीच में चुपके से मिलने आती थी, कहती थी — “माँ कहती हैं, तूने उनका सिर झुका दिया।”
समय गुज़रा। आरती के दो बच्चे हुए। गरीबी में भी खुशी ढूँढ़ ली उसने। नरेश ने अपनी मेहनत से सब सँभाला। लेकिन माँ का दिल कभी नहीं पिघला।
अब वही माँ चली गई थी।
गाँव पहुँचते ही सन्नाटा पसरा था। शशि ने आकर गले लगा लिया। दोनों बहनों के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
माँ का चेहरा फूलों के बीच शांत था। आरती ने काँपते हाथों से उनका चेहरा छुआ —
“माँ, मैं तो हमेशा आपका इंतज़ार करती रही… आपने ही मुँह फेर लिया था।”
अंतिम संस्कार के बाद जब सब लोग चले गए, शशि बोली, “दीदी, माँ के जाने के बाद घर तो सूना हो गया है। भाई भी अब शहर में बस गया है। मैं सोच रही हूँ इस घर को बेच दूँ।”
आरती ने धीरे से कहा, “मत बेचो शशि, ये घर सिर्फ दीवारों का नहीं, हमारी यादों का है।”
शशि मुस्कुराई — “यादें तो रहती हैं दीदी, पर पेट भी तो भरना होता है।”
आरती ने पर्स से कुछ पैसे निकाले — “ले, ये रख ले। मैंने थोड़ी-थोड़ी बचत की थी। घर मत बेचना, इसे संजोकर रखना। माँ को यही जगह प्यारी थी।”
शशि की आँखें नम हो गईं — “दीदी, माँ आपको माफ़ करना चाहती थीं, पर बोल नहीं पाईं। आखिरी वक्त में बोलीं — ‘आरती के बिना मैं अधूरी हूँ।’”
आरती की आँखों में आँसू थे। बोली — “माँ का गुस्सा भी तो प्यार था शशि। मुझे अब कोई शिकवा नहीं।”
तीन दिन बाद आरती वापस लौट रही थी। स्टेशन पर ट्रेन आने में देर थी। तभी शशि ने हाथ पकड़कर कहा,
“दीदी, अब अक्सर आना। अब तो कोई रोकने वाला नहीं है।”
आरती ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “अब कोई रोक भी नहीं पाएगा।”
ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से बाहर देखते हुए आरती ने मन ही मन कहा —
“माँ, आपने देर से सही, पर मुझे अपने आशीर्वाद में समेट ही लिया। मैंने हमेशा आपको प्यार किया था, और अब भी करती रहूँगी।”
घर पहुँचकर आरती ने अपने पति से कहा, “नरेश, मैं माँ का आशीर्वाद लेकर आई हूँ।”
नरेश ने पूछा, “इतने सालों बाद आखिर आपको सुकून मिला?”
आरती ने सिर हिलाया, “हाँ, सुकून भी मिला और एक सीख भी।”
“क्या?”
आरती बोली,
“रिश्ते गुस्से से नहीं, माफ़ करने से बचे रहते हैं। माँ ने देर से समझा, पर मैंने समय रहते समझ लिया।”
वो बोली, “अब से मैं किसी से नफरत नहीं रखूँगी, चाहे वो मुझसे कितनी भी दूर क्यों न चला जाए।”
आँगन में उसके बेटे खेल रहे थे। आरती ने उन्हें देख मुस्कुराया —
“ये ही तो जीवन है — टूटकर भी फिर से जुड़ जाने का नाम।”
उस रात पहली बार उसने माँ की तस्वीर के आगे दिया जलाया और कहा —
“माँ, अब तुम मुझमें ही हो। अब कभी कोई शिकायत नहीं।”
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