मुहल्ले के कोने वाले घर में सब लोग सविता दीदी का नाम इज्जत से लेते थे। पढ़ी-लिखी, समझदार और आत्मनिर्भर। नौकरी भी अच्छी थी, पति सरकारी अफसर, और दोनों बच्चे नामी स्कूल में पढ़ते थे। समाज में उनका रुतबा देखकर लोग अक्सर कहा करते — “देखो, सविता जैसी बेटियाँ अगर हों तो घर का नाम रोशन हो जाता है।”
पर जो लोग उन्हें करीब से जानते थे, वो जानते थे कि सविता दीदी अपने माता-पिता के लिए वही बेटी नहीं रहीं, जो कभी अपने पिता के कंधों पर बैठकर पूरे मोहल्ले में घूमती थी।
उनके माता-पिता अब बूढ़े हो चले थे। पिता जी की आँखों की रोशनी कम हो गई थी और माँ के घुटनों में इतना दर्द कि चलना मुश्किल था। सविता के छोटे भाई मोहन ने ही दोनों की देखभाल का जिम्मा उठा रखा था। उसकी आय सीमित थी, लेकिन फिर भी उसने अपने माता-पिता को कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया।
सविता सालों में बस दो-तीन बार ही आती। त्योहारों पर या किसी खास मौके पर। और हर बार आते हुए कुछ मिठाई, कपड़े या पैसे रख देती — “माँ, आजकल बहुत व्यस्त रहती हूँ, ऑफिस का इतना काम है कि साँस लेने की फुर्सत नहीं।”
माँ बस मुस्कुरा देतीं, “कोई बात नहीं बेटी, तू खुश रहना, यही बहुत है।”
पर जब वो चली जाती, तब पिता जी घंटों खिड़की के पास बैठकर बाहर देखते रहते — “देखो, मेरी बिटिया आई थी आज।”
मोहन यह सब चुपचाप देखता। उसे कभी शिकायत नहीं हुई, लेकिन जब सविता जाती तो वह कई दिनों तक चुप रहता। माँ समझ जातीं कि उसका मन भारी है।
समय बीतता गया। एक दिन अचानक पिता जी की तबियत बहुत बिगड़ गई। मोहन रातभर अस्पताल में उनके पास बैठा रहा। माँ के आँसू थम नहीं रहे थे। सविता को फोन किया गया, पर उसने कहा — “कल मेरी मीटिंग है, दो दिन में आती हूँ।”
पर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। पिता जी अगले दिन ही चले गए।
जब सविता पहुँची, तब तक सब रस्में पूरी हो चुकी थीं। उसने माँ को गले लगाया, और रोते हुए कहा, “माँ, मुझसे गलती हो गई, मैं वक्त पर नहीं आ पाई।”
माँ ने बस इतना कहा, “अब क्या कहूँ बेटी, तेरा फोन भी तो देर से आया।”
कुछ महीने बीते। माँ अब अकेली रह गई थीं। मोहन का घर छोटा था, लेकिन उसने माँ को अपने साथ ही रख लिया। सविता ने कहा, “माँ, आप मेरे पास शहर में आ जाओ, आपको सारी सुविधाएँ मिलेंगी।”
माँ ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, सुविधा तो बहुत मिल जाएगी, लेकिन तेरे शहर में मुझे तेरी व्यस्तता मिलेगी। यहाँ कम से कम मोहन दिन में दो बार पूछ तो लेता है कि ‘माँ, दवा ली कि नहीं?’”
सविता चुप हो गई।
कुछ साल बाद, माँ भी चल बसीं। इस बार सविता सबसे पहले पहुँची। उसने सब इंतजाम किए — फूल, पंडित, श्राद्ध का भोजन — सब कुछ बहुत व्यवस्थित। सब लोग तारीफ़ कर रहे थे कि “सविता दीदी ने माँ का काम कितना अच्छे से किया।”
श्राद्ध के बाद जब संपत्ति का बंटवारा होना था, तो सविता बोली, “माँ की जमीन में मेरा भी हक है, आखिर मैं भी उनकी बेटी हूँ।”
मोहन ने कोई जवाब नहीं दिया। दस्तावेज़ में उसका नाम था, इसलिए कानून की नज़र में वह पूरी तरह सही थी।
लेकिन जब वकील ने कागज़ आगे बढ़ाया, मोहन ने उसे साइड में रख दिया और बोला —
“दीदी, हक़ तो है तेरा, इसमें कौन-सी दो राय। पर एक बात पूछूँ — जब माँ-पापा ज़िंदा थे, तब उनका दर्द बाँटने का हक़ क्यों नहीं लिया तूने? जब रात में बुखार में माँ कराहती थीं, तब एक गिलास पानी देने का हक़ क्यों नहीं जताया? जब पापा का चश्मा टूटा था, तब उनके आँसुओं को पोंछने का हक़ कहाँ गया?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सविता की आँखों से आँसू गिरने लगे। वह कुछ कह नहीं पा रही थी।
उस रात उसने वही घर देखा, जहाँ कभी उसने बचपन बिताया था। वही दीवारें, वही आँगन, जहाँ माँ की आवाज़ गूँजती थी — “सविता, दूध पी ले, देर हो जाएगी स्कूल के लिए।”
वो दीवारें अब सूनी थीं। पर सविता को लग रहा था जैसे माँ वहीं हैं, कह रही हों —
“बेटी, संपत्ति का हक़ तो दस्तावेज़ में लिखा है, पर ममता का हक़ दिल से निभाना पड़ता है।”
अगले दिन जब सब लोग कोर्ट जाने की तैयारी में थे, सविता ने मोहन के हाथ में दस्तावेज़ रख दिए —
“भाई, ये सब तुम्हारा है। मैंने माँ-पापा के लिए कुछ नहीं किया। अब ये मेरा हक नहीं बनता। बस इतना वादा कर कि उनकी यादों को हमेशा ज़िंदा रखेगा।”
मोहन की आँखों से आँसू बह निकले। उसने कहा, “दीदी, तूने देर से सही, पर समझ तो लिया। यही सबसे बड़ी संपत्ति है।”
सविता ने माँ की तस्वीर के आगे दीपक जलाया और बोली —
“माँ, अब मुझे समझ आया कि हक़ लेना आसान है, पर हक़ निभाना बहुत मुश्किल। मैंने बहुत देर कर दी, पर अब हर बेटी को यही बताऊँगी कि संपत्ति नहीं, सेवा ही असली विरासत है।”
उस दिन से सविता हर रविवार अनाथालय में जाकर बच्चों को पढ़ाने लगी। कोई नहीं जानता था कि वो ऐसा क्यों करती है, लेकिन जो उसे समझते थे, वो जानते थे —
वो अपनी खोई हुई जिम्मेदारी को अब समाज के बच्चों के माध्यम से पूरा कर रही थी।
मुहल्ले के लोग अब जब सविता दीदी का नाम लेते, तो कहते —
“अब वो सिर्फ समझदार नहीं, संवेदनशील भी हो गई हैं।”
और सविता हर बार मन ही मन कहती —
“असली हक़ वो नहीं जो कागज़ में लिखा हो,
असली हक़ वो है जो अपनेपन और सेवा से कमाया जाए।”
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