*जिसे पूरी दुनिया 'रईसी का गुरूर' समझती रही, वो दरअसल 'अकेलेपन का डर' था। क्या एक ननद अपनी भाभी के दिल में छिपे उस डर को पढ़ पाएगी, या गलतफहमी की दीवार रिश्तों को बांट देगी?*
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घर में शादी की रौनक अभी थमी नहीं थी। मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ था। 21 वर्षीय 'काव्या' अपनी नई भाभी 'नैना' को लेकर बहुत उत्साहित थी। नैना शहर के एक बेहद प्रतिष्ठित और अमीर घराने की इकलौती बेटी थी। जब नैना की शादी काव्या के मध्यमवर्गीय भाई 'समीर' से तय हुई थी, तो पूरे मोहल्ले में चर्चा थी कि "लड़के की किस्मत खुल गई, कुबेर के घर की बेटी आ रही है।"
मुंह दिखाई की रस्म चल रही थी। काव्या चहकते हुए अपनी सहेलियों और रिश्तेदारों से नैना का परिचय करवा रही थी।
"अरे देखो, मेरी भाभी की साड़ी तो देखो, शुद्ध बनारसी है। और यह हार? भाभी, यह तो पक्का पाँच तोले का होगा ना?" काव्या अपनी मासूमियत में नैना की रईसी का बखान कर रही थी।
नैना सोफे पर बैठी थी। वह बेहद खूबसूरत थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी थी। कमरे में औरतों के ठहाके, ढोलक की आवाज़ और काव्या की लगातार बातें उसे असहज कर रही थीं। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगी थीं। अचानक, बिना किसी से कुछ कहे, नैना उठी और अपने पल्लू को संभालते हुए तेज़ कदमों से अपने कमरे की ओर चली गई।
महफिल में सन्नाटा छा गया। काव्या का हाथ हवा में ही रह गया।
एक बुआ जी ने तुरंत तंज कसा, "देख लिया? बड़े घर की बेटी है, हम जैसे छोटे लोगों के बीच बैठने में इसकी शान घटती है। नाक पर मक्खी नहीं बैठने देती, अभी से यह हाल है तो आगे क्या होगा?"
काव्या की माँ, सुमित्रा जी, का चेहरा भी उतर गया। उन्होंने काव्या से कहा, "जा, देख तो क्या हुआ उसे? रईसी का नशा है या तबीयत खराब है?"
काव्या मन ही मन बहुत आहत हुई। उसे लगा कि भाभी ने उसका अपमान कर दिया। वह गुस्से में पैर पटकते हुए नैना के कमरे की तरफ गई। वह मन में सोच रही थी कि आज तो भाभी को बता ही देगी कि यह उनका मायका नहीं, ससुराल है, यहाँ सबके साथ मिल-जुलकर रहना पड़ता है।
काव्या ने बिना दस्तक दिए दरवाज़ा धकेला।
"भाभी, यह क्या तरीका था? मेरी सहेलियाँ क्या सोच रही..."
काव्या के शब्द उसके गले में ही अटक गए।
सामने का नज़ारा उसकी सोच से बिल्कुल परे था। नैना पलंग के एक कोने में दुबकी बैठी थी। उसके हाथ-पाँव कांप रहे थे और वह अपनी हथेली से अपना सीना दबाए हुए थी, जैसे उसे सांस लेने में तकलीफ हो रही हो। वह रो नहीं रही थी, बल्कि हांफ रही थी। यह 'घमंड' नहीं, 'पैनिक अटैक' (घबराहट का दौरा) था।
काव्या का गुस्सा तुरंत चिंता में बदल गया। वह दौड़कर नैना के पास गई।
"भाभी? क्या हुआ? मैं पानी लाऊं? भैया को बुलाऊं?"
नैना ने काव्या का हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी पकड़ इतनी मज़बूत थी कि काव्या को दर्द होने लगा।
"नहीं... किसी को मत बुलाना," नैना ने मुश्किल से कहा। "बस दरवाज़ा बंद कर दो। बहुत शोर है बाहर।"
काव्या ने दरवाज़ा बंद किया और नैना के पास बैठ गई। उसने नैना को पानी पिलाया और उसकी पीठ सहलाने लगी। थोड़ी देर बाद जब नैना की साँसें सामान्य हुईं, तो काव्या ने पूछा, "भाभी, अगर तबीयत खराब थी तो बता देतीं, यूँ उठकर आने से सब आपको घमंडी समझ रहे हैं।"
नैना ने फीकी मुस्कान के साथ काव्या को देखा। "काव्या, तुम्हें लगता है यह घमंड है? मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी उस बड़े से बंगले में अकेले काटी है। मेरे मम्मी-पापा बिज़नेस के सिलसिले में हमेशा विदेश रहते थे। मैं नैनी (आया) और नौकरों के बीच पली-बढ़ी हूँ। मुझे सन्नाटे की आदत है। मैंने कभी एक साथ इतने लोग, इतना शोर, इतना अपनापन... नहीं देखा। मुझे भीड़ से डर लगता है। मुझे नहीं पता कि जब सब हंस रहे हों तो क्या बात करनी चाहिए। मुझे लगा मेरा दम घुट जाएगा वहां।"
काव्या सन्न रह गई। वह जिसे 'सोने की चिड़िया' समझ रही थी, वह असल में 'सोने के पिंजरे' में कैद एक डरी हुई पक्षी थी। नैना के पास दौलत तो थी, पर 'परिवार' नाम का वो शोर नहीं था, जिसके लिए काव्या कभी-कभी चिढ़ जाती थी।
"मुझे लगा तुम सब मुझे जज कर रहे हो। मुझे लगा मैं कोई गलती कर दूंगी," नैना की आँखों से आंसू बह निकले। "मैं घमंडी नहीं हूँ काव्या, मैं बस 'अकेली' हूँ।"
काव्या की आँखों में भी नमी आ गई। उसने अपनी नई भाभी को गले लगा लिया।
"आप अब अकेली नहीं हैं भाभी। और रही बात भीड़ की, तो मैं हूँ ना आपकी ढाल। मैं आपको सिखाऊंगी कि इस शोर में सुकून कैसे ढूंढा जाता है। पर खबरदार जो आपने खुद को कमरे में बंद किया। हम मिडिल क्लास लोग हैं भाभी, हमारे पास बैंक बैलेंस कम हो सकता है, पर दिल का बैलेंस बहुत बड़ा होता है।"
नैना मुस्कुरा दी। यह इस घर में उसकी पहली सच्ची मुस्कान थी।
काव्या नैना का हाथ पकड़कर वापस बाहर लाई।
"मम्मी जी," काव्या ने तेज़ आवाज़ में कहा, ताकि बुआ जी भी सुन लें, "भाभी को एसी की आदत है ना, तो अचानक गर्मी और भीड़ से उनका सिर चकरा गया था। इसमें कोई घमंड की बात नहीं है। आखिर वो हमारे घर की लक्ष्मी हैं, और लक्ष्मी का ख्याल रखना हमारा फर्ज़ है, है ना?"
नैना ने काव्या की तरफ कृतज्ञता भरी नज़रों से देखा। उस दिन नैना समझ गई कि उसे इस घर में दौलत नहीं, बल्कि वो 'दोस्त' मिल गई है जिसकी तलाश उसे बचपन से थी। काव्या ने न सिर्फ़ नैना का भ्रम तोड़ा, बल्कि दुनिया के उस चश्मे को भी उतार फेंका जो अमीरी को हमेशा बदतमीजी का नाम देता है।
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**कहानी का संदेश:**
हर बार चुप्पी का मतलब अहंकार नहीं होता। कभी-कभी इंसान अपने अंदर एक ऐसी जंग लड़ रहा होता है, जिसकी खबर बाहर की दुनिया को नहीं होती। किसी को जज करने से पहले, उसके जूतों में पाँव डालकर देखना ज़रूरी है। रिश्ते दौलत से नहीं, दिल को समझने से बनते हैं।
**अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या काव्या ने झूठ बोलकर सही किया? क्या हमें भी अपने परिवार के सदस्यों की कमियों को ढककर उनका साथ देना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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