रात के सन्नाटे में शहर की सड़कें सो चुकी थीं, मगर ऋतु की आँखों में नींद कोसों दूर थी।
घड़ी ने बारह बजाए थे, और उसके मोबाइल की स्क्रीन बार-बार जल-बुझ रही थी।
उसने फिर से चैट खोली — “ऑनलाइन” का हरा निशान गायब था।
वो मुस्कुराई, फिर आह भरकर बोली — “काश, तू होता अभी…”
वो “तू” था — अमित।
वो उसका दोस्त था — ऐसा दोस्त, जिससे वो सब कह सकती थी जो दुनिया से नहीं कह पाती थी।
ऋतु दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर थी।
लोग उसे देखकर कहते, “वाह! क्या आत्मविश्वास है, क्या मुस्कान है!”
पर कोई नहीं जानता था कि उस मुस्कान के पीछे कितना सन्नाटा था।
माँ-बाप गाँव में रहते थे, और वो अकेली इस शहर में नौकरी करती थी।
ऑफिस से लौटने के बाद उसका कमरा सन्नाटे से भरा होता — दीवारें भी जैसे सुनती नहीं थीं।
उसी दौरान उसकी मुलाकात अमित से हुई थी —
ऑफिस की एक मीटिंग में, जब वो पहली बार किसी के सामने खुलकर हँसी थी।
अमित का स्वभाव बिल्कुल अलग था — शांत, सहज और सबसे बढ़कर, “सुनने वाला”।
एक दिन ऑफिस के बाद दोनों कॉफी पीने गए।
ऋतु ने हँसते हुए कहा, “तुम बहुत कम बोलते हो, अमित।”
वो मुस्कुराया, “क्योंकि मुझे सुनना अच्छा लगता है।”
उस दिन के बाद ऋतु को जैसे कोई सुकून मिल गया।
अब जब वो ऑफिस से लौटती, तो उसकी उँगलियाँ खुद-ब-खुद मोबाइल उठातीं —
“हाय अमित, आज बहुत थक गई।”
और वहाँ से जवाब आता —
“चलो, बताओ क्या हुआ, सुन रहा हूँ।”
सुन रहा हूँ…
ये तीन शब्द ऋतु के लिए किसी मरहम की तरह थे।
धीरे-धीरे वो एक-दूसरे की आदत बन गए।
रात की बातें, सुबह की शुभकामनाएँ, ऑफिस की खीझ, ज़िंदगी के छोटे-छोटे किस्से — सब साझा होने लगा।
ऋतु कहती,
“तुम्हारे बिना दिन पूरा ही नहीं होता।”
अमित हँसकर जवाब देता,
“मैं तो बस सुनता हूँ, बाकी सारा जादू तुम्हारे शब्दों का है।”
ऋतु के लिए अमित वो दोस्त था, जो बिना कहे समझ जाता था।
जब वो परेशान होती, अमित के दो शब्द ही काफी होते —
“सब ठीक हो जाएगा।”
और सच में, सब ठीक लगने लगता।
एक दिन ऑफिस में बहुत बड़ा झगड़ा हुआ।
बॉस ने एक छोटी-सी गलती पर सबके सामने डाँट दिया।
ऋतु की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं कहा।
शाम को वो कमरे में आई और सीधे अमित को कॉल लगाया।
“अमित… आज बहुत बुरा लगा। सबके सामने अपमान किया उसने।”
“अच्छा, पहले गहरी साँस लो।”
“मुझे बस रोना है…”
“ठीक है, रो लो।”
उसने एक शब्द नहीं कहा, बस सुनता रहा।
फोन के उस पार सन्नाटा था, और ऋतु का सिसकना — बस वही आवाज़ थी।
करीब दस मिनट बाद ऋतु बोली,
“अब अच्छा लग रहा है।”
“क्योंकि अब हल्का हो गया मन,” अमित ने कहा।
उस दिन ऋतु को समझ आया — कभी-कभी जवाब की ज़रूरत नहीं होती, बस सुनने वाले कान चाहिए।
समय बीतता गया।
दोनों की दोस्ती सबकी नज़रों में आने लगी।
ऑफिस में लोग फुसफुसाने लगे — “इन दोनों में कुछ चल रहा है।”
पर दोनों जानते थे कि ये रिश्ता किसी नाम का मोहताज नहीं था।
एक दिन ऋतु ने पूछा,
“अमित, तुम कभी अकेला महसूस करते हो?”
वो मुस्कुराया, “अब नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि अब मैं जानता हूँ, जब मन भारी होता है, तो किसी को सुनना होता है — और अब मेरे पास वो कोई है।”
ऋतु की आँखें भर आईं।
“काश, सबको ऐसा कोई दोस्त मिले।”
अमित बोला,
“हर किसी को मिल भी जाता है, लेकिन लोग अब सुनते नहीं। सब बोलना चाहते हैं।”
फिर एक दिन अचानक अमित का ट्रांसफर दूसरे शहर हो गया।
विदाई के दिन ऋतु ने कहा,
“अब किसे सुनाओगे मेरी बातें?”
“फोन है ना, और यादें भी।”
उस दिन पहली बार ऋतु ने महसूस किया कि दोस्ती दूरी नहीं जानती।
अमित के जाने के बाद ज़िंदगी फिर वही हो गई — ऑफिस, कमरे की दीवारें, और सन्नाटा।
पर फर्क ये था कि अब वो सन्नाटा भारी नहीं लगता था।
क्योंकि अब उसके भीतर एक आवाज़ थी — “सुन रहा हूँ।”
कभी रात को जब वो अकेली महसूस करती, तो कॉल लगा देती —
“अमित, क्या कर रहे हो?”
“कुछ नहीं, बस तुम्हारी बातें सुनने की तैयारी।”
दोनों हँस पड़ते।
एक दिन ऑफिस में ऋतु की नई सहकर्मी, रीना, बहुत उदास थी।
वो रोते हुए बोली, “सब मुझे बेकार समझते हैं, मेरी बात कोई नहीं सुनता।”
ऋतु मुस्कुराई और बोली,
“मैं सुन रही हूँ, बताओ।”
उस दिन ऋतु ने कई घंटे रीना की बातें सुनीं — बिना टोके, बिना सलाह दिए।
शाम को रीना बोली,
“आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा, अब मन हल्का है।”
ऋतु ने हँसते हुए फोन उठाया और अमित को मैसेज किया —
“आज मैंने तुम्हारा काम किया।”
अमित ने जवाब दिया,
“मतलब?”
“आज मैंने किसी को सुना — जैसे तुम मुझे सुनते थे।”
थोड़ी देर बाद रिप्लाई आया —
“तब तो अब तुम भी सच्ची दोस्त बन गई।”
कई साल बाद, जब ऋतु ने अपनी डायरी खोली, तो पहले पन्ने पर लिखा था —
“ज़िंदगी में अगर एक ऐसा दोस्त मिल जाए
जो बिना बोले समझ जाए,
बिना सलाह दिए सुने,
बिना शर्त प्यार करे,
तो समझना कि भगवान ने तुम्हें अपनी सबसे बड़ी दुआ भेजी है।”
उसने मुस्कुराते हुए लिखा —
“और अगर ऐसा दोस्त नहीं है,
तो खुद किसी का ऐसा दोस्त बन जाओ।”
आज ऋतु और अमित दोनों अपने-अपने शहरों में व्यस्त हैं।
पर जब भी मोबाइल की स्क्रीन पर “ऑनलाइन” का हरा निशान जलता है,
एक पुरानी आदत फिर लौट आती है —
“हाय अमित, सुनो न…”
और उधर से वही पुराना जवाब आता है —
“हाँ, सुन रहा हूँ…”
क्योंकि असली दोस्ती वही होती है —
जहाँ शब्दों की नहीं, सुनने की कीमत होती है।
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